लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२) लीलावती ।
अर्थः-जो स्मरण करते ही विघ्नोंको नाश करके अपने भक्तोंकी प्रीतिको उत्पन्न
करते हैं; देवताओंके समूहों करके अभिवादन किये गये हैं चरण जिनके; उन ऐसे
हस्तीका ही मुखवाले श्रीगणेशजीको नमस्कार करके मैं भास्कराचार्य अत्यन्त
स्फुट गणित आदि शास्त्रके जाननेवाले पुरुषोंको प्रसन्नता देनेवाली, बहुत अर्थ-
प्रतिपादक थोडे अक्षर और शुद्धपदोंके सौंदर्य्यसे भरी हुई लीलावती नामवाली
गणितकी पाटीको प्रकाशित करता हूं ॥ १ ॥
वराटकानां दशकद्वयं यत्सा काकिणी ताश्च पणश्चतस्रः ॥
ते षोडश द्रम्म इहावगम्यो द्रम्मैस्तथा षोडशभिश्च निष्कः ॥२॥
अन्वयः-यत् वराटकानां दशकद्वयं सा काकिणी । ताः च चतस्रः पणः । ते
षोडश द्रम्मः । तथा इह षोडशभिः द्रम्मैः निष्कः अवगम्यः ॥ २ ॥
अर्थः-बीस २० वराटक (कौडी) को १ काकिणी कहते हैं, तिन ४ चार
काकिणियोंका एक पण होता है, तिन हीं १६ सोलह पणोंका एक द्रम्म होता
है तथा इस गणितशास्त्रमें १६ सोलह द्रम्मका एक निष्क होता है ॥ २ ॥
तुल्या यवाभ्यां कथितात्र गुञ्जा वल्लस्त्रिगुञ्जो धरणं च तेऽष्टौ ॥
गद्याणकस्तद्वयमिंद्रतुल्यै १४र्वल्लैस्तथैको घटकः प्रदिष्टः ॥ ३ ॥
अन्वयः-अत्र यवाभ्यां तुल्या गुंजा कथिता । त्रिगुंजः वल्लः कथितः । ते अष्टौ
च धरणं कथितम् । तद्वयं गद्याणकः कथितः । तथा इंद्रतुल्यैः वल्लैः एकः घटकः
प्रदिष्टः ॥ ३ ॥
अर्थः-इस गणितशास्त्रमें दो २ यव (जौ) के समान एक १ गुंजा (रत्ती)
होती है, ३ रत्तीका १ एक वल्ल होता है, ८ आठ वल्लका १ धरण होता है, २ दो
धरणका एक गद्याणक कहाता है, १४ चौदह वल्लका १ घटक कहाता है ॥ ३ ॥
दशार्द्धगुंजं प्रवदंति माषं माषाह्वयैः षोडशभिश्च कर्षम् ॥
कर्षैश्चतुर्भिश्च पलं तुलाज्ञाः कर्षं सुवर्णस्य सुवर्णसंज्ञम् ॥ ४॥
अन्वयः-तुलाज्ञाः दशार्द्धगुंजं माषम् प्रवदंति । माषाह्वयैः षोडशभिः
च कर्ष प्रवदन्ति । चतुर्भिः कर्षैः च पलं प्रवदंति । सुवर्णस्य कर्ष सुवर्णसंज्ञं
प्रवदंति ॥ ४ ॥
अर्थः-तोलके जाननेवाले ५ पांच रत्तीका १ एक माषा कहते हैं, १६ सोलह
माषोंका १ कर्ष कहते हैं, ४ कर्षका १ एक पल कहते हैं और कर्षभर सुवर्णको
सुवर्ण ही कहते हैं ॥ ४ ॥