लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४६ ) लीलावती ।
फैलाघ-उपरोक्त रीति के अनुसार क्षेत्रफल जानने
के लिये सब भुजों ९ । १२ । १४ । १३ के योग
४८ को आधा २४ किया फिर इनको चार स्थानमें
लिखा; फिर एक एक स्थानमें क्रमसे भुजोंको
घटाया तब जो शेष रहा १५ । १२ । १० । ११ उनका परस्पर घात
किया तब १९८०० हुए; इसका मूल क्षेत्रफल है; परन्तु इसका पूरा पूरा मूल
मिल नहीं सकता, इस कारण यह करणीगत फल | योगार्द्ध. | भुज. | शेष. |
कहाता है; और इसका आसन्न मूल लिया तब | २४ | ९ | १५ |
कुछ कम १४१ मिला; परन्तु यह क्षेत्रफल | २४ | १२ | १२ |
ठीक नहीं है पर आगे जो सम- | २४ | १४ | १० |
लम्बचतुर्भुजक्षेत्रके फल लानेकी रीति लिखेंगे; | २४ | १३ | ११ |
"भूमि और मुखका योगकर आधा कर ले; और लम्बसे गुणा कर दे" उसी
रीतिके अनुसार यहां भी भूमि १४ और मुख ९ का योग कर आधा किया तब २३/२
हुए; इनको लंब १२ से गुणा किया तब १३८ हुए; यह ठीक क्षेत्रफल है ॥
उसी क्षेत्रके दो खण्ड करके और रीतिसे क्षेत्रफल लाते हैं
उपरोक्त चतुर्भुजक्षेत्रमें लम्ब डालनेसे समचतुर्भुज बनता है और एक
त्रिभुज बन जाता है और चतुर्भुजके सम होनेसे
मुख ९ के समान ही भूमि ९ हो जाती है, शेष ५
त्रिभुजकी भूमि हो जाता है; तब त्रिभुजमें भुज ५
कोटि १२ कर्ण १३ होता है; यही भुज और
कोटि ५ । १२ का घात किया तब ६०
हुए इनका आधा किया तब ३० हुए; यही त्रिभुजका फल हुआ; फिर चतुर्भुजके
भुज ९ और कोटि १२ का घात किया तब १०८ हुए; इन दोनोंका योग किया
तब वही १३८ ठीक फल हुआ ॥