लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
३. सुबन्त एवं कारक प्रकरण (सप्त विभक्ति विचार व कारक-सिद्धांत)
होगी। यदि प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो जाती तो औत्सर्गिक 'सुं' हो कर अनिष्ट हो जाता।
यद्यपि यहां 'घु, टि, घि' की भान्ति कोई छोटी सञ्ज्ञा भी की जा सकती
थी तथापि पाणिनि ने पूर्वाचार्यों के अनुरोध से यह बड़ी सञ्ज्ञा की है। पाणिनि से
पूर्ववर्त्ती आचार्य चूंकि प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करते चले आये हैं अतः पाणिनि ने भी उन
का अनुसरण किया है। पदं पदं प्रति प्रतिपदम्, तदहंत्तीति प्रातिपदिकम् ।
शब्दों के विषय में विद्वानों में दो मत प्रचलित हैं। १ व्युत्पत्तिपक्ष, २ अव्यु-
त्पत्तिपक्ष। अव्युत्पत्तिपक्षीय विद्वानों का कथन है कि किसी वस्तु की सञ्ज्ञा अपने
सञ्ज्ञी को समुदाय-शक्ति से ही जनाती है उस में अवयवार्थ की कल्पना नहीं करनी
चाहिये। अर्थात् 'राम' यह सञ्ज्ञा समुदायशक्ति से ही दशरथ-पुत्र रूप सञ्ज्ञी को
प्रकट करती है इसमें अवयवार्थ की कल्पना नहीं करनी चाहिये—यही अव्युत्पत्तिपक्ष
है। व्युत्पत्तिपक्षीय विद्वानों का कथन है कि प्रत्येक वस्तु की सञ्ज्ञा का कोई न कोई
अर्थ—जो उस के अवयवों से निष्पन्न होता है—ज़रूर हुआ करता है। यथा—'राम'
शब्द में 'रम्' (भ्वा० आ०) धातु से 'घञ्' प्रत्यय हुआ है। 'रम्' का अर्थ 'खेलना'
और 'घञ्' प्रत्यय अधिकरण को प्रकट करता है। रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति रामः ।
अर्थात् जिस में (योगी जन) रमण करते हैं वह 'राम' है। यही व्युत्पत्तिपक्ष है।
अवयवों द्वारा शब्दों के अर्थ करने की रीति बहुत प्राचीन है। वेद में इस पक्ष
का बहुत आदर किया जाता है। परन्तु लोक में व्युत्पत्ति अव्युत्पत्ति दोनों पक्ष चलते
हैं। अव्युत्पत्तिपक्ष में— जिस में न कोई धातु और न कोई प्रत्यय माना जाता है—
अर्थवदधातुर० (११६) सूत्र प्रातिपदिक सञ्ज्ञा करता है और व्युत्पत्तिपक्ष—जहां धातु
आदि से परे कृत् या तद्धित प्रत्यय की कल्पना होती है—के लिये दूसरा प्रातिपदिक
सञ्ज्ञा करने वाला सूत्र लिखते हैं—
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(११७) कृत्तद्धितसमासाश्च ।१।२।४६॥
कृत्तद्धितान्तौ समासाश्च तथा [प्रातिपदिक-सञ्ज्ञकाः] स्युः ॥
अर्थः—कृदन्त, तद्धितान्त तथा समास भी पूर्ववत् प्रातिपदिकसञ्ज्ञक हों।
व्याख्या—कृत्तद्धितसमासाः ।१।३। च इत्यव्ययपदम् । प्रातिपदिकानि ।१।३।
(यहां पूर्व-सूत्र से आ रहे 'प्रातिपदिकम्' पद का बहुवचन में विपरिणाम हो जाता
है)। समासः—कृच्च तद्धितश्च समासाश्च = कृत्तद्धितसमासाः। इतरेतरद्वन्द्वः । इस
सूत्र में पूर्वसूत्र से 'अर्थवत्' पद की अनुवृत्ति होती है। कृत् और तद्धित अकेले अर्थवाले
नहीं होते किन्तु जब प्रकृति (जिससे प्रत्यय किया जाता है उसे 'प्रकृति' कहते हैं।
प्रत्ययात् पूर्वं क्रियत इति प्रकृतिः) से युक्त होते हैं तभी अर्थवाले होते हैं। तो इसलिये
यहां कृत् से कृदन्त तथा तद्धित से तद्धितान्त लिया जायेगा। अर्थः—(कृत्तद्धित-
समासाः) कृदन्त, तद्धितान्त तथा समास (च) भी (प्रातिपदिकानि) प्रातिपदिक-
[सञ्ज्ञक होते हैं।]
ल० प्र० (११)
१६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अष्टाध्यायी के तृतीयाध्याय में कृदतिङ् (३०२) के अधिकार में कृत्-प्रत्यय
तथा चतुर्थाध्याय के तद्धिताः (६१६) के अधिकार में तद्धित-प्रत्यय पढ़े गये हैं।
जिज्ञासुओं को वे अष्टाध्यायी में देखने चाहिये। ये प्रत्यय जिस के अन्त में होंगे उस
समुदाय अर्थात् इन के सहित प्रकृति की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होगी। पूर्वसूत्र से प्रत्ययान्तों
की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करने का निषेध किया गया था, अब इस के द्वारा कृदन्तों तथा
तद्धितप्रत्ययान्तों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा की जाती है। व्युत्पत्तिपक्ष में—राम, कर्तृ,
पितृ, कारक आदि कृदन्त तथा औपगव, पाणिनीय, शालीय, मालीय आदि तद्धितान्त
शब्द इस के उदाहरण हैं।
समास भी प्रातिपदिकसञ्ज्ञक होते हैं। यहां प्रश्न उत्पन्न होता है कि समास
की तो पूर्वसूत्र से ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञा सिद्ध है। क्योंकि न तो वह धातु है न प्रत्यय
है और न प्रत्ययान्त है किन्तु अर्थवाला अवयव होता है। अतः इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा
करने के लिये पुनः प्रयास किस लिए किया गया है? न हि, पिष्टस्य पेषणम् अर्थात्
पिसे का पुनः पीसना उचित नहीं होता!
इस का उत्तर वैयाकरण यह देते हैं कि यहां समासग्रहण नियम के लिये है—
यदि अनेक पदों का समूह जो कि सार्थक हो, प्रातिपदिकसञ्ज्ञक किया जाये तो समास
ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञक हो अन्य समूह प्रातिपदिकसञ्ज्ञक न हो। इस नियम से यह
लाभ हुआ कि 'देवदत्तो भुङ्क्ते' इत्यादि सार्थक वाक्य जो पहले अर्थवदधातुर० (११६)
सूत्र से प्रातिपदिकसञ्ज्ञक होते थे अब न होंगे। इस विषय का विस्तार सिद्धान्त-
कौमुदी की व्याख्या में देखना चाहिये।
१ प्रश्न—यहां तद्धितान्त शब्दों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा की गई है परन्तु कुछ तद्धित
ऐसे भी हैं जो अन्त में न होकर शब्द के मध्य में या आदि में होते हैं। यथा—
अव्ययसर्वनाम्नाकच् प्राक्टे (१२२६) से अकच् प्रत्यय टि से पूर्व होता है (जैसे
उच्चकैः)। इसी प्रकार विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात् (१२२७) सूत्र से विधान
किया जाने वाला बहुच् प्रत्यय, शब्द से पूर्व प्रयुक्त होता है (जैसे—ईषदूनः पटुः
—बहुपटुः)। तो भला अन्त में तद्धित न होने के कारण इन शब्दों की कैसे
प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो सकेगी?
उत्तर—जो तद्धित-प्रत्यय शब्द के मध्य में होते हैं उन के आने से शब्द वही
शब्द माना जाता है कोई अन्य नहीं हो जाता, जैसाकि कहा है—तन्मध्यपतित-
स्तद्ग्रहणेन गृह्यते। अतः ऐसे शब्दों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा उन को तद्धितान्त
माने बिना भी पूर्वसूत्र से सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार शब्द के आदि में आने
वाले बहुच् प्रत्यय के विषय में भी शब्द के अर्थवत् होने के कारण पूर्वोक्त अर्थ-
वदधातु० (११६) सूत्र से ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञा निर्बाध सिद्ध हो जाती है।
२ जहां २ समास में समासान्त 'टच्' आदि प्रत्यय होते हैं, वहां २ उन समासान्त
प्रत्ययों के तद्धित होने से तद्धितान्तत्वेन ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६३
राजपुरुष, चित्रग्रीव, रामकृष्ण आदि समास हैं, इनकी प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होती
है। तो अब हम इन दो सूत्रों से प्रत्येक सार्थक शब्द की प्रातिपदिक-सञ्ज्ञा कर सकते हैं।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(११८) स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिँ-
भ्याम्भ्यस्ङसोसांङ्योस्सुप् ।४।१।२।।
सुँ, औ, जस् इति प्रथमा। अम्, औट्, शस् इति द्वितीया। टा, भ्याम्,
भिस् इति तृतीया। ङे, भ्याम्, भ्यस् इति चतुर्थी। ङसिँ, भ्याम्, भ्यस् इति
पञ्चमी। ङस्, ओस्, आम् इति षष्ठी। ङि, ओस्, सुप् इति सप्तमी ॥
अर्थः—'सुँ, औ, जस्' यह प्रथमा विभक्ति; 'अम्, औट्, शस्' यह द्वितीया
विभक्ति; 'टा, भ्याम्, भिस्' यह तृतीया विभक्ति; 'ङे, भ्याम्, भ्यस्' यह चतुर्थी वि-
भक्ति; 'ङसिँ, भ्याम्, भ्यस्' यह पञ्चमी विभक्ति; 'ङस्, ओस्, आम्' यह षष्ठी
विभक्ति; 'ङि, ओस्, सुप्' यह सप्तमी विभक्ति (ङ्यन्त, आवन्त तथा प्रातिपदिक से
परे हो)।
व्याख्या—स्वौजसमौट्—सुप् ।१।१। समासः—सुँश्च औश्च जश्च अम् च औट्
च शश्च टाश्च भ्याञ्च भिश्च ङेश्च भ्याञ्च भ्यश्च ङसिँश्च भ्याञ्च भ्यश्च ङश्च
ओश्च आम् च ङिश्च ओश्च सुप् च एषां समाहारः = स्वौजसमौट्—सुप्। इस सूत्र
में सुँ, औ, जस्, अम्, औट्, शस्, टा, भ्याम्, भिस्, ङे, भ्याम्, भ्यस्, ङसिँ, भ्याम्,
भ्यस्, ङस्, ओस्, आम्, ङि, ओस्, सुप् इन इक्कीस प्रत्ययों का उल्लेख है। इन को
सुँप् कहा जाता है। सुँ से लेकर सुप् के प् तक सुँप् प्रत्याहार बनता है। इस सूत्र का
सम्पूर्ण अर्थ तभी हो सकता है जब हमें यह ज्ञात हो कि यह सूत्र किस २ के अधिकार
में पढ़ा गया है। अब उन अधिकारों को बताते हैं—
[लघु०] अधिकार-सूत्रम्—(११९) ङ्याप्प्रातिपदिकात् ।४।१।१।।
अधिकार-सूत्रम्—(१२०) प्रत्ययः ।३।१।१।।
अधिकार-सूत्रम्—(१२१) परश्च ।३।१।२।।
इत्यधिकृत्य। ङ्यन्तादावन्तात् प्रातिपदिकाच्च परे स्वादयः प्रत्ययाः
स्युः ॥
अर्थः—(१) ङ्याप्प्रातिपदिकात्, (२) प्रत्ययः, (३) परश्च—इन तीन सूत्रों
का अधिकार करके उपर्युक्त स्वौजसमौट्० सूत्र का यह अर्थ निष्पन्न हुआ—ङ्यन्त,
आवन्त और प्रातिपदिक से परे 'सुँ' आदि इक्कीस प्रत्यय हों।
व्याख्या—हम 'ग्रन्थकार' के इस सूत्रविन्यासक्रम से सहमत नहीं। हमारी
सम्मति में एक तो स्वौजसमौट्० सूत्र से पूर्व इन अधिकारसूत्रों को रखना उचित था,
दूसरा इन अधिकार-सूत्रों का क्रम प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात् ऐसा होना
चाहिये था। स्वौजसमौट्० सूत्र इन तीन अधिकारों के अन्तर्गत है अतः पहले तीनों
अधिकार दर्शाने योग्य थे। ङ्याप्प्रातिपदिकात् यह अधिकार प्रत्ययः, परश्च इन
दोनों अधिकारों के अन्दर आ जाता है। अतः प्रत्ययः, परश्च सूत्र लिखने के पश्चात्
१६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
ङ्याप्प्रातिपदिकात् सूत्र लिखना उचित था। हम इन सूत्रों की अपने क्रम से ही
व्याख्या करेंगे।
प्रत्ययः ।३।१।१। यह अष्टाध्यायी के तृतीयाध्याय के प्रथमपाद का प्रथम तथा
अधिकार-सूत्र है। अष्टाध्यायी में सब से बडा यही अधिकार है। इस का अधिकार
पाञ्चवें अध्याय की समाप्ति तक जाता है। तीसरे, चौथे तथा पाञ्चवें अध्याय मे
जो प्रकृति से विधान किये जाए उन की प्रत्यय सञ्ज्ञा हो यह इस सूत्र का अर्थ है।
जहा २ प्रकृति से प्रत्यय विधान किया जाता है वहा २ सर्वत्र प्रकृति पञ्च-
म्यन्त होती है। यथा — अचो यत् (७७३)। अच ।३।१।१। यत् ।१।१।१। स्वप्नो नन्
(८६१)। स्वप् ।३।१।१। नन् ।१।१। इन स्थानो पर पञ्चमी दिग्योग में होती है।
इस दिग्योगपञ्चमी में यह शङ्का उत्पन्न होती है कि क्या प्रत्यय प्रकृति से परे किया
जाये या प्रकृति से पूर्व ? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अन्य अधिकार चलाते हैं—
परश्च । पर ।३।१।२। न इत्यव्ययपदम् । 'प्रत्यय' पद की पूर्वसूत्र से अनुवृत्ति
आती है। अर्थ — प्रत्यय परे होता है। अर्थात् जिस से प्रत्यय विधान किया जाना
है उस से प्रत्यय परे समझना चाहिये। यथा — अचो यत् (७७३) यहा अजन्त धातु
से यत् प्रत्यय विधान किया गया है सो यत् प्रत्यय अजन्त धातु से परे होगा। स्वप्नो
नन् (८६१) यहा स्वप् धातु से नन् प्रत्यय विधान किया गया है सो नन् प्रत्यय स्वप्
धातु से परे होगा¹। इस प्रकार प्रत्यय का अधिकार और उस के स्थान का नियम
कर अब अवान्तर अधिकार चलाते हैं—
ङ्याप्प्रातिपदिकात् ।४।१।१। समास — ङी च आप् च प्रातिपदिकञ्च एषां
समाहार = ङ्याप्प्रातिपदिकम्, तस्मात् = ङ्याप्प्रातिपदिकात् । 'ङी' यह भेदक अनु-
बन्धों से रहित ग्रहण किया गया है, अतः 'ङीप्, ङीष्, ङीन्' इन सब स्त्रीप्रत्ययों का
सामान्यतः ग्रहण होगा। इसी प्रकार 'आप्' यह भी भेदक अनुबन्धों से रहित होने
के कारण 'टाप्, डाप्, चाप्' इन सब स्त्रीप्रत्ययों का ग्राहक होगा। यह अधिकार
सूत्र है। इस का अधिकार पाञ्चवें अध्याय की समाप्ति तक जाता है। इस सूत्र मे
प्रकृति बतलाई गई है। अर्थ — यहा से ले कर पाञ्चवें अध्याय की समाप्ति तक
जितने प्रत्यय कहे गये हैं वे (ङ्याप्प्रातिपदिकात्) ङ्यन्त आबन्त तथा प्रातिपदिक से
परे हों। इसी सूत्र के अधिकार मे स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र पढ़ा गया है। अतः उस
सूत्र का यह अर्थ हुआ—ङ्यन्त, आबन्त तथा प्रातिपदिक से परे सुं, औ, जस् आदि
इक्कीस प्रत्यय हों²।
१ तत्र 'राम+टा' यहा पर टा प्रत्यय टित् होने से आद्यन्तौ टकितौ (८५) से राम के
आदि में न हो कर राम से परे होगा। इसी प्रकार घरेष्ट. (७६२) आदि में
समझना चाहिये।
२. ङीप्, ङीष्, ङीन् तथा टाप्, डाप् और चाप् प्रत्ययो का आगे स्त्रीप्रत्यय-
प्रकरण मे उल्लेख आयेगा। ङ्यन्त और आबन्त प्रत्ययान्त होने से प्रातिपदिक-
अजन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६५
इन इक्कीस प्रत्ययों के सात त्रिक बनते हैं। यथा—१. सुँ, औ, जस्। २.
अम्, औट्, शस्। ३. टा, भ्याम्, भिस्। ४. ङे, भ्याम्, भ्यस्। ५. ङसिँ, भ्याम्,
भ्यस्। ६. ङस्, ओस्, आम्। ७. ङि, ओस्, सुप्। इन त्रिकों की क्रमशः प्रथमा,
द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी ये सञ्ज्ञाएं पाणिनि से पूर्ववर्ती
आचार्यों ने की हुई हैं। महामुनि पाणिनि ने भी इन सञ्ज्ञाओं का उपयोग अपने
ग्रन्थ में किया है (देखें कारकप्रकरण)।
अब इन विधान किये हुए इक्कीस प्रत्ययों की व्यवस्था करते हैं—
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्— (१२२) सुपः ।१।४।१०२॥
सुपस्त्रीणि त्रीणि वचनान्येकश एकवचन-द्विवचन-बहुवचनसञ्ज्ञानि
स्युः ॥
अर्थः—सुँप् का प्रत्येक त्रिक ‘एकवचन, द्विवचन, बहुवचन’ सञ्ज्ञक हो।
व्याख्या – सुपः ।६।१। त्रीणि ।१।३। त्रीणि ।१।३। (तिङस्त्रीणि त्रीणि० से)।
एकशः इत्यव्ययपदम्। एकवचन-द्विवचन-बहुवचनानि ।१।३। (तान्येकवचनद्विवचनबहु-
वचनान्येकशः से)। अर्थः—(सुपः) सुँप् के जो (त्रीणि त्रीणि) तीन २ वचन, वह
(एकशः) प्रत्येक (एकवचन-द्विवचन-बहुवचनानि) ‘एकवचन-द्विवचन-बहुवचन’
सञ्ज्ञक हो।
सुँप् प्रत्याहार के सात त्रिक अर्थात् तीन २ वचन होते हैं। ये सातों ‘एकवचन-
द्विवचन-बहुवचन’ सञ्ज्ञक होते हैं। यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) के अनुसार
प्रत्येक त्रिक के अन्तर्गत तीन वचन क्रमशः एकवचन, द्विवचन, बहुवचन सञ्ज्ञक हो
जाते हैं। यथा –
| त्रिकसंख्या | विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|---|
| पहला त्रिक | प्रथमा | सुँ (स्) | औ | जस् (अस्) |
| दूसरा त्रिक | द्वितीया | अम् | औट् (औ) | शस् (अस्) |
| तीसरा त्रिक | तृतीया | टा (आ) | भ्याम् | भिस् |
| चौथा त्रिक | चतुर्थी | ङे (ए) | भ्याम् | भ्यस् |
| पांचवां त्रिक | पञ्चमी | ङसिँ (अस्) | भ्याम् | भ्यस् |
| छठा त्रिक | षष्ठी | ङस् (अस्) | ओस् | आम् |
| सातवां त्रिक | सप्तमी | ङि (इ) | ओस् | सुप् (सु) |
संज्ञक न होते थे अतः केवल 'प्रातिपदिकात्' कहने से इन से परे सुँ आदि
प्रत्ययों की उत्पत्ति सम्भव न थी। इसीलिये प्रकृतसूत्र में इन का पृथक् उल्लेख
किया गया है। [वस्तुतः प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम् परिभाषा
से इन का ग्रहण भी हो सकता है अत एव पङ्गु, श्वश्रू आदि ऊङ्प्रत्ययान्त शब्दों
से स्वादियों की उत्पत्ति में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। इन का सूत्र में
उल्लेख इसलिये किया गया है कि तद्धित की उत्पत्ति ङ्यन्त, आवन्त से परे ही
हो इन से पूर्व प्रातिपदिक से नहीं। इसका विशेष स्पष्टीकरण सिद्धान्तकौमुदी
की टीकाओं में इस स्थल पर देखें।]
१६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
ध्यान रहे कि प्रत्येक त्रिक को 'एकवचन + द्विवचन + बहुवचन' ये तीन संज्ञाएं
मिलती हैं। इन को वह अपने अन्तर्गत तीन प्रत्ययों में बांट देता है। यथा--'सुँ, औ,
जस्' यह एक त्रिक है, इसे 'एकवचन, द्विवचन, बहुवचन' ये तीन संज्ञाएं प्राप्त होती
हैं। यह त्रिक इन तीन संज्ञाओं को अपने अन्तर्गत तीन प्रत्ययों को क्रमशः दे देता है,
इस से 'सुँ' यह एकवचन, 'औ' यह द्विवचन, 'जस्' यह बहुवचन हो जाता है। इसी
प्रकार अन्य छ त्रिकों में भी जान लेना चाहिये।
अब यह बतलाते हैं कि कहां एकवचन और कहां द्विवचन प्रयुक्त होता है
[बहुवचन के विषय में भी थोड़ी दूर आगे चल कर कहेंगे]।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१२३) द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने ।१।४।२२॥
द्वित्वैकत्वयोरेते स्तः ॥
अर्थः—द्वित्व और एकत्व की विवक्षा (कहने की इच्छा) होने पर क्रमशः
द्विवचनप्रत्यय और एकवचनप्रत्यय होता है।
व्याख्या—द्व्येकयोः ।७।२। द्विवचनैकवचने ।१।२। द्विवचनञ्च एकवचनञ्च
द्विवचनैकवचने, इतरेतरद्वन्द्वः । 'द्व्येकयोः' यहां 'द्वौ च एकश्च, तेषु = द्व्येकेषु' ऐसा
बहुवचन होना चाहिये था, परन्तु मुनि ने ऐसा न कर 'द्व्येकयोः' में द्विवचन ही किया
है। उन के ऐसा करने का अभिप्राय यह है कि 'द्वि' शब्द से दो पदार्थ और 'एक'
शब्द से एक पदार्थ ऐसा अर्थ ग्रहण न किया जाये किन्तु 'द्वि' शब्द से दो की सङ्ख्या
अर्थात् द्वित्व और 'एक' शब्द से एक की सङ्ख्या अर्थात् एकत्व का ग्रहण हो । भाव
यह है कि लोक में द्वि और एक शब्द सङ्ख्येयवाची ही प्रसिद्ध हैं सङ्ख्यावाची नहीं१।
अर्थात् 'द्वि' शब्द से लोक में दो पदार्थ और 'एक' शब्द से एक पदार्थ ही लिया जाता
है न कि दो और एक की सङ्ख्या। दो पदार्थों में द्विवचन और एक पदार्थ में एक-
वचन हो—यह अर्थ सुसङ्गत नहीं होता । अतः मुनि ने 'द्व्येकयोः' कह कर द्वि और
एक शब्द को सङ्ख्यावाची के रूप में प्रयुक्त किया है। इस से अब यह सुसङ्गत अर्थ
हो जाता है—(द्व्येकयोः) दो सङ्ख्या अर्थात् द्वित्व और एक सङ्ख्या अर्थात् एकत्व
विवक्षित होने पर क्रमशः (द्विवचनैकवचने) द्विवचन और एकवचन प्रत्यय हों।
किस २ अर्थ में कौन २ सा त्रिक हो ? यह कारकप्रकरण का विषय है। अतः
प्रथम कारकप्रकरणानुसार त्रिक का निर्णय कर चुकने के बाद पुनः इस सूत्र से वचन-
निर्णय करना चाहिये। यदि हमें एकत्व की विवक्षा होगी तो हम एकवचन और यदि
द्वित्व की विवक्षा होगी तो द्विवचन करेंगे। यह इस सूत्र का सार है।
१. एक, द्वि से ले कर नवदशन् शब्द तक सब शब्द सङ्ख्येयवाची होते हैं अतः
पदार्थों के साथ इन का सामानाधिकरण्य होता है। यथा—एको वातः, द्वौ पुरुषौ
इत्यादि । विंशति आदि शब्द सङ्ख्या और सङ्ख्येय दोनों प्रकार के वाचक
होते हैं। यथा—'गवां विंशतिः, ब्राह्मणानामेकोनविंशतिः' इत्यादियों में सङ्ख्या-
वाची हैं। 'गावो विंशतिः, ब्राह्मणा एकोनविंशतिः' इत्यादियों में सङ्ख्येयवाची हैं।
इस पर विशेष टिप्पण इस व्याख्या के कृदन्तप्रकरण में (८१८) सूत्र पर देखें।
अजन्तपुल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८७
अब रूपसिद्धि के लिये अवसानसञ्ज्ञा का प्रतिपादन करते हैं—
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(१२४) विरामोऽवसानम् ।१।४।१०६॥
वर्णानामभावोऽवसानसञ्ज्ञः स्यात् । रुँत्व-विसर्गौ । रामः ॥
अर्थः—वर्णों का अभाव अवसान-सञ्ज्ञक हो ।
व्याख्या—विरामः ।१।१। अवसानम् ।१।१। 'विराम' शब्द का दो प्रकार का
अर्थ होता है; पहला अधिकरण में 'घञ्' प्रत्यय मानने से और दूसरा भाव में 'घञ्'
प्रत्यय स्वीकार करने से । प्रथम यथा—विरम्यतेऽस्मिन्निति = विरामः [यहां सामी-
पिक अधिकरण विवक्षित है] । उच्चारण का ठहराव जिस के पास किया जाता है उसे
'विराम' कहते हैं । उच्चारण का ठहराव अन्तिमवर्ण के पास किया जाता है अतः इस
पक्ष में अन्तिमवर्ण 'विराम' होता है । द्वितीय यथा—विरमणं विरामः, भावे घञ् ।
उच्चारण का न होना 'विराम' होता है । अर्थात् किसी वर्ण से परे उच्चारण का न
होना 'विराम' कहाता है । इस पक्ष में अन्तिम वर्ण से आगे उच्चारण के अभाव की
अवसानसञ्ज्ञा होती है। यही पक्ष ग्रन्थकार ने वृत्ति में स्वीकार किया है। पर हैं दोनों
ही शुद्ध । अर्थः — (विरामः) वर्णों के उच्चारण का अभाव (अवसानम्) अवसान-
संज्ञक होता है । यथा—'रामर्' यहां रेफ से आगे उच्चारणाभाव है उसी की यहां अव-
सान-संज्ञा है । ध्यान रहे कि पहले पक्ष में रेफ की ही अवसानसंज्ञा होगी ।
रामः । 'राम' इस शब्द की अव्युत्पत्तिपक्ष में अर्थवदधातुर० (११६) से तथा
व्युत्पत्तिपक्ष में कृदन्त होने से कृत्तद्धितसमासाश्च (११७) से प्रातिपदिकसंज्ञा हो
प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात् (१२०, १२१, ११६) इन के अधिकार में स्वौज-
समौट्० (११८) सूत्र द्वारा इक्कीस प्रत्यय प्राप्त हुए । तदनन्तर सुपः (१२२) से
सात त्रिकों के अन्तर्गत तीन २ वचनों की क्रमशः एकवचन, द्विवचन, बहुवचन सञ्ज्ञा
हो गई । अब प्रथमा के एकत्व की विवक्षा में द्व्येकयोद्विवचनैकवचने (१२३) द्वारा
राम शब्द से परे 'सुँ' प्रत्यय आ कर 'राम+सुँ' बना । उपदेश में अनुनासिक होने के
कारण सकारोत्तर उकार उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) द्वारा इत्संज्ञक है अतः तस्य
लोपः (३) से उस का लोप हो— रामस् । सुप्तिङन्तं पदम् (१४) से 'रामस्' इस
समुदाय की पदसंज्ञा हो ससजुषो रुः (१०५) से सकार को रुँ आदेश किया तो—
राम+रुँ । पुनः उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) से इत्संज्ञा तथा तस्य लोपः
(३) से लोप हो—रामर् । विरामोऽवसानम् (१२४) से रेफोत्तरवर्ती अभाव की
अवसानसञ्ज्ञा हो, उस के परे होने से खरवसानयोर्विसर्जनीयः (६३) द्वारा रेफ को
विसर्गादेश करने पर—'रामः' प्रयोग सिद्ध होता है । [विसर्ग के अयोगवाह होने से
और अयोगवाहों का पाठ यरों में मानने से अनचि च (१८) से विसर्ग को वैकल्पिक
द्वित्व भी हो जायेगा । रामः: ।]
नोट—जिस पक्ष में रेफ की अवसानसञ्ज्ञा होती है उस पक्ष में खरवसानयोः०
(६३) सूत्र का खर् परे होने पर रेफ को या अवसान में वर्त्तमान रेफ को विसर्गादेश
हो—ऐसा अर्थ हो जाने से कोई दोष नहीं आता ।
१६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] विधि सूत्रम्—(१२५) सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ ।१।२।६४॥
एकविभक्तौ यानि सरूपाण्येव दृष्टानि तेषामेक एव शिष्यते ॥
अर्थ — एकविभक्ति अर्थात् समानविभक्ति के परे होने पर जितने शब्द सरूप
=समानरूप वाले ही देखे जाएं, उन में से एक ही रूप शेष रहता है (अन्य रूप लुप्त
हो जाते हैं) ।
व्याख्या—सरूपाणाम् ।६।३। (निर्धारणे षष्ठी) । एकशेष ।१।१। एकविभक्तौ
।७।१। एव इत्यव्ययपदम् । (वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदेव विशेष. से) । अन्वय —एक-
विभक्तौ सरूपाणाम् एव (दृष्टानाम्) मध्य एकशेष स्यादिति । समास —एका चासौ
विभक्तिश्च =एकविभक्ति, तस्याम् =एकविभक्तौ, कर्मधारयसमास, समानविभक्ता-
वित्यर्थ । समान रूप यषान्ते सरूपा, तेषाम् =सरूपाणाम् बहुव्रीहिसमास, ज्योतिर्जन-
पदत्यादिना समानस्य सभावे । शिष्यत इति शेष, कर्मणि घञ् । एकश्चासौ शेषश्च=
एकशेष, कर्मधारयसमास । अर्थ —(एकविभक्तौ) समानविभक्ति मे (सरूपाणामेव)
जितने समानरूप वाले ही शब्द देखे जाए उन मे स (एकशेष ) एक शेष रहता है
[अन्य लुप्त हो जाते हैं] ।
यहा यह ध्यान रखना चाहिए कि यह एकशेष कार्य अन्तरङ्ग¹ होने से 'औ'
आदि विभक्तिया की उत्पत्ति स पूर्व ही होता है।
एक विभक्ति अर्थात् समानविभक्ति के परे होने पर जो शब्द एक जैसे ही देखे
जाते है विरूप नही दिखाई देते, उन शब्दा म एक ही शेष रहता है अन्य लुप्त हो
जाते हैं । यथा—'मातृ' शब्द दो प्रकार स सिद्ध होता है। एक—नप्तृनेष्टृ० (उणा०
२।५२) इस उणादिसूत्र द्वारा 'मान्' (नलोप हो कर) अथवा 'मा' धातु स तृजन्त
१. असिद्ध बहिरङ्गमन्तरङ्गे (प०) अर्थात् अन्तरङ्ग कार्य करने मे बहिरङ्ग कार्य
असिद्ध होता है। बहुत निमित्तो की अपेक्षा करने वाला कार्य बहिरङ्ग और थोडे
निमित्तो की अपेक्षा करने वाला कार्य अन्तरङ्ग होता है। अथवा—घरेलू=निज
से सम्बन्ध रखने वाला=समीप का=निकट का या अपने भीतर का कार्य अन्त-
रङ्ग और दूर का अथवा अपने से बाहिर का कार्य बहिरङ्ग होता है। यद्वा—
बहुत मन्झटो वाला काय बहिरङ्ग और थोडे झन्झट वाला कार्य अन्तरङ्ग
होता है। 'राम राम' यहा एकशेष विभक्त्युत्पत्ति स थोडी अपेक्षा वाला [विभ-
क्त्युत्पत्ति मे प्रातिपदिकसज्ञा, द्वित्वादि की विवक्षा इत्यादि बहुत बातो की अपेक्षा
होती है] थोडे झन्झटा वाला घरेलू वा भीतरी कार्य सा है अत यह अन्तरङ्ग
और विभक्त्युत्पत्ति उस से बहिर्भूत होने से बहिरङ्ग है। अन्तरङ्ग कार्य पहले
और बहिरङ्ग कार्य पीछे होगा । यह परिभाषा लोकसिद्ध है। यथा लोक मे सवेरे
उठ कर मनुष्य अन्तरङ्गकार्य शौच, दन्तधावन, स्नानादि कर बाद मे बहिरङ्ग=
बाहिर के या पराये कार्यों को करते हैं, वैसे यहा भी समझना चाहिये । इस
परिभाषा की विशेष व्याख्या व्याकरण के उच्च ग्रन्थो म देखें ।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६६
निपातित होता है । इस का अर्थ 'माता = जननी' और इस के रूप 'माता, मातरौ,
मातरह । मातरम्, मातरौ, मातृः'_ इत्यादि होते हैं । दूसरा—माङ् माने (जुहो०)
धातु से ण्वुल्तृचौ (७८४) द्वारा तृच् प्रत्यय करने से सिद्ध होता है । इस का अर्थ
'मापने वाला' और इस के रूप 'माता, मातारौ, मातारः । मातारम्, मातारौ, मातृन्'
इत्यादि होते हैं । अब इन दो प्रकार के 'मातृ' शब्दों का द्वन्द्व करने पर एकशेष नहीं
होगा । क्योंकि ये एकविभक्ति = समान-विभक्ति में केवल सरूप ही नहीं देखे जाते ।
इस में सन्देह नहीं कि सुं, टा, ङे आदि विभक्तियों में इन दोनों प्रकार के 'मातृ'
शब्दों के 'माता, मात्रा, मात्रे' आदि रूप समान ही होते हैं, परन्तु प्रत्येक विभक्ति में
सरूप ही हों ऐसा नहीं देखा जाता । 'अम्' मे औणादिक 'मातृ' शब्द का 'मातरम्'
और दूसरे 'मातृ' शब्द का 'मातारम्' विरूप होता है सरूप नहीं । हमारी शर्त्त तो
यह है कि 'एक अर्थात् एक जैसी = समान विभक्ति परे होने पर जो शब्द सरूप ही
रहें, विरूप न हों; उन में से एक ही शेष रहता है' इस शर्त्त को इन दो प्रकार के
'मातृ' शब्दों ने पूरा नही किया । समानविभक्ति 'अम्' आदि में इन की विरूपता पाई
जाती है अतः इन का एकशेष नही होगा ।
प्रत्यर्थं शब्दः अर्थात् प्रत्येक अर्थ के लिये शब्द के उच्चारण की आवश्यकता
होती है । इस लिये जब दो, तीन या अधिक अर्थों का बोध कराना अभीष्ट होता है
तो उस के लिये तद्वाचक शब्दों का उच्चारण भी उतनी बार प्राप्त होता है । इस पर
यह सूत्र नियम करता है कि उन का उच्चारण एक ही बार हो अनेक बार नहीं ।
जैसे—जब दो, तीन या अधिक राम कहने हों तो तब रामशब्द का दो, तीन या
अधिक वार उच्चारण प्राप्त होता है । इस नियम से एक 'राम' शब्द रह जाता है,
शेषों का लोप हो जाता है । उन सब के अर्थ का वही शेष बचा हुआ ही बोध कराता
है । जैसा कि कहा गया है—यः शिष्यते स लुप्यमानार्थाभिधायी अर्थात् जो शेष
रहता है वह लोप हुओ के अर्थ का भी बोध कराता है ।
'राम राम' इन दो सरूप शब्दों में इस सूत्र द्वारा एक 'राम' शब्द ही शेष
रह जाता है । अब प्रथमाविभक्ति के द्वित्व की विवक्षा में द्वह्येकयोर्द्विवचनैकवचने
(१२३) सूत्र द्वारा 'औ' प्रत्यय आ कर 'राम + औ' हो जाता है । अब इस स्थिति
में वृद्धिरेचि (३३) के प्राप्त होने पर उस का बाधक अग्रिमसूत्र उपस्थित होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१२६) प्रथमयोः पूर्व-सवर्णः ।६।१।६८॥
अकः प्रथमाद्वितीययोरचि पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः स्यात् । इति
प्राप्ते—
अर्थः—अक् प्रत्याहार से प्रथमा या द्वितीया का अच् परे हो तो पूर्व (अक्)
और पर (अच्) के स्थान पर पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश हो जाता है । इस सूत्र के प्राप्त
होने पर (अग्रिम सूत्र निषेध करता है ) ।
व्याख्या--अकः ।५।१। (अकः सवर्णे दीर्घः से) । प्रथमयोः ।६।२। अचि
१७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
।७।२। (इको यणचि से) । पूर्व-परयो ।६।२। एक ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधि-
कृत है)। पूर्व सवर्ण ।१।१। दीर्घ ।१।१। (अकः सवर्णे दीर्घ से) । समास —प्रथमा
च प्रथमा च = प्रथमे, तयो = प्रथमयोः, एकशेष । विभक्तिया सात है, पहले 'प्रथमा'
शब्द से उन म से पहली 'सुं, औ, जस्' विभक्ति का ग्रहण हो जाता है, दूसरे 'प्रथमा'
शब्द से अवशिष्ट छ विभक्तियो म प्रथमा अर्थात् 'अम्, औट्, शस्' का बोध होता
है। इस प्रकार 'प्रथमयोः' शब्द स प्रथमा तथा द्वितीया विभक्ति का ग्रहण हो जाता
है । पूर्वस्य सवर्ण = पूर्व-सवर्ण , षष्ठीतत्पुरुषसमास । अर्थ — (अक ) अक् प्रत्याहार
से (प्रथमयो ) प्रथमा या द्वितीया विभक्ति का (अचि) अच् परे हो तो (पूर्व-परयो )
पूर्व + पर के स्थान पर (एक ) एक (पूर्व-सवर्ण ) पूर्वसवर्ण (दीर्घ ) दीर्घ आदेश
होता है । तात्पर्य यह है कि अक् और प्रथमा द्वितीया के अच् के स्थान पर एक ऐसा
आदेश होता है जो पूर्व वर्ण का सवर्ण होते हुए साथ ही दीर्घ भी होता है । यथा—
'इ+औ' के स्थान पर पूर्वसवर्णदीर्घ 'ई' होगा, यह पूर्व का सवर्ण है और दीर्घ भी
है । इसी प्रकार—'उ+अ' के स्थान पर 'ऊ', 'ऋ+अ' के स्थान पर 'ॠ' पूर्वसवर्ण-
दीर्घ होगा। इन सब के उदाहरण आगे यत्र तत्र बहुत आएगे ।
'राम+औ' यहा मकारोत्तर अकार = अक् म परे 'औ' यह प्रथमा का अच्
विद्यमान है, अत पूर्व+पर के स्थान पर 'आ' यह पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है।
इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है—
[लघु०] निषेध सूत्रम्— (१२७) नाऽदिचि।६।१।१०४॥
आद् इचि न पूर्वसवर्णदीर्घः । वृद्धिरेचि (३३)—रामौ ॥
अर्थ.— अवर्ण से इच् प्रत्याहार परे होने पर पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश नही होता ।
वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि हो कर 'रामौ' सिद्ध हो जाता है।
व्याख्या—आत् ।५।१। इचि ।७।१। पूर्वपरयो ।६।२। एक ।१।१। (एकः
पूर्वपरयो यह अधिकृत है)। पूर्व-सवर्ण ।१।१। (प्रथमयो पूर्वसवर्ण से)। दीर्घ ।१।१।
(अक सवर्णे दीर्घ से)। न इत्यव्ययपदम् । अर्थ — (आत्) अवर्ण से (इचि) इच्
प्रत्याहार परे होने पर (पूर्व-परयो ) पूर्व+पर के स्थान पर (पूर्वसवर्ण, दीर्घ )
पूर्वसवर्णदीर्घ (एक ) एकादेश (न) नही होता । अवर्ण को छोट कर सब स्वर इच्
प्रत्याहार के अन्दर आ जाते हैं ।
'राम+औ' यहा मकारोत्तर अवर्ण से 'औ' यह इच् प्रत्याहार परे वर्तमान है
अत इस सूत्र से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो कर पुन वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एका-
देश करने से—राम् औ='रामौ' प्रयोग सिद्ध होता है ।
[लघु०] विधि सूत्रम्— (१२८) बहुषु बहुवचनम् ।१।४।२१॥
बहुत्वविवक्षायां बहुवचन स्यात् ॥
अर्थ.—बहुत्व अर्थात् दो सङ्ख्या से अधिक सङ्ख्या की विवक्षा हो जो बहु-
वचन प्रत्यय होता है ।
व्याख्या—बहुषु ।७।३। बहुवचनम् ।१।१। यहां ‘बहु’ शब्द व्याख्यान से बहुत्व-
वाची है। अर्थः—(बहुषु) बहुत्व की विवक्षा होने पर (बहुवचनम्) बहुवचन प्रत्यय
होता है। यदि दो से अधिक सङ्ख्या की विवक्षा होगी तो प्रकृति से बहुवचन प्रत्यय
प्रयुक्त किया जायेगा।
‘राम राम राम’ इन तीन रामशब्दों का या इन से अधिक यथेष्ट रामशब्दों
का (दो से अधिक की हमें विवक्षा है चाहे तीन हों या सौ इस से कुछ प्रयोजन नहीं)
सरूपाणाम्० (१२५) से एकशेष हो ‘राम’ हुआ। अब प्रथमा विभक्ति के बहुत्व की
विवक्षा में बहुषु बहुवचनम् (१२८) द्वारा ‘जस्’ यह बहुवचन प्रत्यय आकर ‘राम+
जस्’ हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१२६) चुटू ।१।३।७॥
प्रत्ययाद्यौ चुटू इतौ स्तः॥
अर्थः—प्रत्यय के आदि में स्थित चवर्ग वा टवर्ग इत्सञ्ज्ञक होते हैं।
व्याख्या—प्रत्ययस्य ।६।१।(पः प्रत्ययस्य से)। आदी ।१।२। (आदिर्निंटुडवः
से वचनविपरिणाम कर के)। चुटू ।१।२। इतौ ।१।२। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् से
वचनविपरिणाम द्वारा)। समासः—चुश्च टुश्च = चुटू, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः-----(प्रत्यय-
स्य) प्रत्यय के (आदी) आदि में स्थित (चुटू) चवर्ग और टवर्ग (इतौ) इत्सञ्ज्ञक
होते हैं।
‘राम+जस्’ यहां ‘जस्’ यह प्रत्यय है, इस के आदि में ‘ज्’ यह चवर्ग स्थित
है अतः इस सूत्र से इस की इत् सञ्ज्ञा हो तस्य लोपः (३) से उस का लोप करने
पर ‘राम+अस्’ हुआ। अब यहां हलन्त्यम् (१) से सकार की इत्सञ्ज्ञा प्राप्त
होती है, इस पर उस की निवृत्ति के लिये यत्न करते हैं—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१३०) विभक्तितश्च ।१।४।१०३॥
सुप्तिङौ विभक्ति-सञ्ज्ञौ स्तः॥
अर्थः—सुँप् और तिङ् विभक्तिसञ्ज्ञक होते हैं।
व्याख्या—सुँप् ।१।१। (सुँपः से विभक्तिविपरिणाम द्वारा)। तिङ् ।१।१।
(तिङस्त्रीणि० से विभक्तिविपरिणाम द्वारा)। विभक्तिः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थः–
(सुँप्) सुँप् और (तिङ्) तिङ् (विभक्तिः) विभक्तिसञ्ज्ञक होते हैं। सञ्ज्ञाविधौ
प्रत्यय-ग्रहणे तदन्तग्रहणं नास्ति [जहां प्रत्यय की सञ्ज्ञा की जाये वहां प्रत्यय के ग्रहण
होने पर प्रत्ययान्त का ग्रहण नहीं किया जाता] इस नियम से यहां सुबन्त और तिङन्त
की विभक्ति सञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु केवल सुँप् और तिङ् की ही विभक्ति सञ्ज्ञा
होती है। सुँप् प्रत्याहार स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र के ‘सुँ’ से लेकर सप्तमी के बहु-
वचन ‘सुप्’ के पकार तक बनता है। अर्थात् सुँ, औ, जस् आदि इक्कीस प्रत्यय ‘सुँप्’
१. ‘चुटू+इतौ’ अत्र ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् (५१) इति प्रगृह्यत्वेन प्रकृतिभावो-
ऽवसेयः।
१७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
हैं। तिङ् प्रत्याहार तिप्तस्झि० (३७५) सूत्र के 'ति' से लेकर 'महिङ्' के ङकार तक
बनता है। अर्थात् तिप्, तस्, झि आदि अठारह प्रत्यय 'तिङ्' हैं। इन दोनों सुप् और
तिङ् प्रत्ययों की विभक्ति सञ्ज्ञा है। अब विभक्तिसञ्ज्ञा का उपयोग दर्शाते हैं—
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(१३१) न विभक्तौ तुस्माः ।१।३।४।।
विभक्तिस्थास्तवर्गसकारमकारा नेत । इति सस्य नेत्त्वम् । रामाः ॥
अर्थ—विभक्ति में स्थित तवर्ग, सकार, मकार इत्सञ्ज्ञक नहीं होते। इति
सस्य—इस सूत्र से सकार की इत् सञ्ज्ञा का निषेध हो जाता है।
व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। विभक्तौ ।७।१। तुस्मा ।१।३। इत ।१।३। (उप-
देशेऽजनुनासिक इत् से वचनविपरिणाम द्वारा)। समास—तुश्च स् च मश्च = तुस्माः,
इतरेतर-द्वन्द्व । मकारादकार उच्चारणार्थं । अर्थ—(विभक्तौ) विभक्ति में (तुस्मा )
तवर्ग, सकार, मकार (इत ) इत्सञ्ज्ञक (न) नहीं होते ।
इस सूत्र में जस्, शस्, भिस्, भ्यस्, ङस्, ओस्, अम्, भ्याम्, आम् आदि के
अन्त्य हल् की हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्सञ्ज्ञा नहीं होती । तवर्ग के उदाहरण—
रामात्, सर्वस्मात्, सर्वस्मिन्, एधेरन् प्रभृति जानने चाहियें ।
'राम+जस्' यहां अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर
उस का बाध कर अतो गुणे (२७४) से पररूप प्राप्त होता है। पुन उस का भी
बाध कर प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ आकार करने से—रामास् ।
अब पूर्ववत् सकार को रुँ, उँकारलोप तथा अवसानसञ्ज्ञक रेफ को विसर्ग करने पर
'रामाः' प्रयोग सिद्ध होता है।
किसी का अपनी ओर ध्यान खींचना सम्बोधन कहाता है। यथा—हे राम !
भो देवदत्त !¹ इत्यादि । सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति का प्रयोग किया जाता है
[देखो कारकप्रकरण (८८६)] । सम्बोधन के द्योतनार्थ पद के आदि में (क्वचित्
अन्त में भी) प्राय 'हे, रे, भोस्' आदि अव्ययों का प्रयोग किया जाता है । कहीं २
इन का प्रयोग नहीं भी होता ।
अब सम्बोधन के एकत्व की विवक्षा में 'राम+सुँ' हुआ । इस अवस्था में
अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् (१३२) एकवचनं सम्बुद्धिः ।२।३।४६।।
सम्बोधने प्रथमाया एकवचनं सम्बुद्धिसञ्ज्ञं स्यात् ॥
अर्थ:—सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति का एकवचन सम्बुद्धि सञ्ज्ञक होता है।
व्याख्या—सम्बोधने ।७।१। (सम्बोधने च सूत्र से)। प्रथमायाः ।६।१। (प्राति-
पदिकार्थलिङ्ग—प्रथमा से विभक्तिविपरिणाम द्वारा) । एकवचनम् ।१।१। सम्बुद्धिः
१ सम्बोधनवाची पद के आगे आजकल '!' ऐसा चिह्न किया जाता है; परन्तु
प्राचीनकाल में ऐसा कोई चिह्न न था। इस प्रकार के चिह्नों की परिपाटी प्राय
पश्चिम से आई है । इन से वाक्य सुन्दर, असन्दिग्ध और झटिति अर्थप्रत्यायक हो
जाते हैं। इन के ग्रहण में कोई लज्जा की बात नहीं—विषादप्यमृतं ग्राह्यम् ।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७३
।१।२। अर्थः— (सम्बोधने) सम्बोधन में (प्रथमायाः) प्रथमा का (एकवचनम्) एक-
वचन (सम्बुद्धिः) सम्बुद्धि-सञ्ज्ञक होता है ।
इस सूत्र से सम्बोधन के 'सुं' की सम्बुद्धिसञ्ज्ञा हो जाती है। अब सुंलोप के
लिये उपयोगी अङ्गसञ्ज्ञा करने वाला सूत्र लिखते हैं—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् -(१३३) यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम्
।१।४।१३॥
यः प्रत्ययो यस्मात् क्रियते तदादि शब्दस्वरूपं तस्मिन्नङ्गं स्यात् ॥
अर्थः-जो प्रत्यय जिस शब्द से विधान किया जाता है वह शब्द है आदि में
जिस के ऐसा शब्द-स्वरूप उस प्रत्यय के परे होने पर अङ्गसञ्ज्ञक होता है।
व्याख्या—यस्मात् ।५।१। प्रत्ययविधिः ।१।१। तदादि ।१।१। प्रत्यये ।७।१।
अङ्गम् ।१।१। समासः—विधानं विधिः, भावे किप्प्रत्ययः। प्रत्ययस्य विधिः=प्रत्यय-
विधिः, षष्ठी-तत्पुरुषः । तत्=प्रकृति-रूपम् आदिर्यस्य शब्दस्वरूपस्य तत्=तदादि,
तद्गुणसंविज्ञान-बहुव्रीहिसमासः। अर्थः-(यस्मात्) जिस प्रकृति से (प्रत्ययविधिः)
प्रत्यय का विधान हो (तदादि) वह प्रकृति जिस शब्दस्वरूप के आदि में हो ऐसा
प्रकृतिसहित वह शब्दस्वरूप (प्रत्यये) उस प्रत्यय के परे होने पर (अङ्गम्) अङ्ग-
सञ्ज्ञक होता है। उदाहरण यथा—
भू धातु से परे लँट् के स्थान पर 'मिप्' प्रत्यय किया तो बना—भू+मिप् ।
पुनः भूधातु से परे 'शप्' विकरण किया तो 'भू+शप्+मिप्' हुआ। शकार तथा दो
पकारों का लोप करने पर 'भू+अ+मि' । अब यहां अङ्गसञ्ज्ञा करते हैं। यहां
'भू' इस प्रकृति से 'मिप्' प्रत्यय का विधान किया गया है। वह 'भू' प्रकृति 'अ' इस
शब्दस्वरूप के आदि में स्थित है। इस प्रकार प्रकृतिसहित वह शब्दस्वरूप 'भू+अ'
है। अतः उस मिप् प्रत्यय के परे होने पर 'भू+अ' इस समुदाय की अङ्ग संज्ञा हुई।
गुण और अवादेश हो कर यह अङ्ग 'भव' बन जाता है। अब मिप् प्रत्यय के परे रहते
'भव' इस अदन्त अङ्ग को अतो दीर्घो यञि (३६०) से दीर्घ हो कर 'भवामि' सिद्ध हो
जाता है। इसी प्रकार 'भविष्यामि' आदि में 'भविष्य' आदि की अङ्ग संज्ञा समझनी चाहिये ।
यदि सूत्र में 'तदादि' यहां 'आदि' ग्रहण न करते तो केवल उस प्रकृति की ही
अङ्गसंज्ञा होती, प्रकृति से आगे तथा प्रत्यय से पूर्वस्थित शब्दस्वरूप की न होती ।
तब उपर्युक्त उदाहरण में केवल 'भू' की ही अङ्गसंज्ञा होती 'अ' की साथ में न होती ।
इस से अङ्ग के अदन्त न होने से उसे दीर्घ न हो कर अनिष्ट हो जाता । अब पुनः
'आदि' ग्रहण से तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहिसमास के कारण दोनों अर्थात् विकरणविशिष्ट
प्रकृति का ग्रहण हो जाता है; कोई दोष नहीं आता¹ ।
१. बहुव्रीहिसमास में जिन पदों का समास किया जाता है, समास हो चुकने पर प्रायः
उन पदों से भिन्न किसी अन्य पद के अर्थ की ही प्रधानता हो जाया करती है।
यथा—'पीत' शब्द का अर्थ है 'पीला' और 'अम्बर' शब्द का अर्थ है 'कपड़ा' ।
१७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
जहा पर केवलमात्र प्रकृति ही होगी उस से आगे तथा प्रत्यय से पूर्व अन्य
कोई स्थित न होगा, वहा केवल प्रकृति की ही अङ्गसञ्ज्ञा हो जायेगी; अर्थात् व्यपदे-
शिवद्भाव से 'तदादि' केवल प्रकृति ही समझी जायेगी [देखो-आद्यन्तवदेकस्मिन्
(२७८)]।
'राम+सुं' यहा रामशब्द से 'सुं' प्रत्यय का विधान है अत उस प्रत्यय के
परे होने पर तदादि=रामशब्द की अङ्गसञ्ज्ञा हो जाती है।
अब अग्रिमसूत्र मे अङ्गसञ्ज्ञा का उपयोग दर्शाते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१३४) एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः ।६।१।६७॥
एङन्ताद् ह्रस्वान्ताच्चाङ्गाद्धल् लुप्यते सम्बुद्धेश्चेत् ॥
अर्थ.—एङन्त अङ्ग तथा ह्रस्वान्त अङ्ग से परे हल् का लोप हो जाता है
यदि वह सम्बुद्धि का हो तो।
अब 'पीत' और 'अम्बर' शब्द का बहुव्रीहिसमास किया तो बना—पीताम्बर ।
इस का अर्थ है—पीले कपडो वाला। इस अर्थ मे किसी अन्यपदार्थ (पुरुष) की
प्रधानता है जिस के पीले कपडे हैं। इसी प्रकार 'दृष्टा' का अर्थ है 'देखी गई'
और 'मथुरा' का अर्थ है 'एक नगरी'। अब 'दृष्टा' और 'मथुरा' का बहुव्रीहि-
समास किया तो बना—दृष्टमथुर । इस का अर्थ है—जिस से मथुरा देखी गई है
वह पुरुष। इस अर्थ मे किसी अन्यपदार्थ (पुरुष) की प्रधानता है। अत एव
बहुव्रीहिसमास अन्यपदार्थप्रधान कहाता है। इस बहुव्रीहि समास के पुन दो भेद
हो जाते हैं—१ तद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहिसमास, २ अतद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहि-
समास। जिस बहुव्रीहिसमास में अन्यपदार्थ की प्रधानता के साथ साथ समस्यमान
पदों के अर्थों का भी प्रवेश हो वह 'तद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहिसमास' होता है।
यथा—'पीताम्बर' यहा अन्यपदार्थ=पुरुष की प्रधानता के साथ साथ समस्यमान
पदों के अर्थ का भी त्याग नहीं हुआ। यदि कहा जाये कि 'पीताम्बरमानय' (पीले
कपडे वाले को लाओ) तो उस पुरुष के साथ पीले कपडे भी आएगे। अत यहा
तद्गुणसविज्ञान बहुव्रीहिसमास है।
जहा अन्यपदार्थ के साथ समस्यमान पदो के अर्थ का प्रवेश नही होता वहा
'अतद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहिसमास' होता है। यथा—दृष्टमथुर। यहा अन्यपदार्थ
(पुरुष) की प्रधानता के साथ समस्यमान पदों के अर्थों का प्रवेश नहीं होता।
यदि कहा जाये कि—'दृष्टमथुरमानय' (जिस ने मथुरा देखी है उसे लाओ) तो
उस पुरुष के साथ देखी गई मथुरा नही आएगी, अत यहा 'अतद्गुणसविज्ञान-
बहुव्रीहिसमास' है। इसी प्रकार 'चित्रगुमानय' आदि मे समझना चाहिये।
उपर्युक्त सूत्र में 'तदादि' (तत्=प्रकृतिरूपम् आदिर्यस्य तत्=तदादि) यहा
'तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहि' समास है, अत यहा अन्यपदार्थ (जिस के आदि मे
प्रकृति होगी) के साथ उस (प्रकृति) की भी अङ्गसञ्ज्ञा हो जायेगी।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७५
व्याख्या — एङ्ह्रस्वात् ।५।१। सम्बुद्धेः ।६।१। हल् ।१।१। (हल्ङ्याब्भ्यः० से)।
लोपः ।१।१। (लोपो व्योर्वलि से) । लुप्यत इति लोपः, कर्मणि घञ् । समासः—एङ्
च ह्रस्वश्च = एङ्ह्रस्वम्, तस्मात् = एङ्ह्रस्वात्, समाहारद्वन्द्वः । 'एङ् और ह्रस्व से
परे सम्बुद्धि के हल् का लोप होता है' ऐसा अर्थ होने से 'हे कतरत् कुल' यहां दोष
उत्पन्न होता है । तथाहि —नपुंसकलिङ्ग में 'कतर' शब्द से सम्बुद्धि अर्थात् सम्बोधन
का एकवचन 'सुं' करने पर अद्दतरादिभ्यः पञ्चभ्यः (२४१) से उसे अद्द् आदेश
हो जाता है—कतर+अद् (द्) । पुनः डित्वसामर्थ्य से रेफोत्तर अकार का लोप हो —
कतर्+अद् = 'कतरद्' बनता है । अब 'एङ् और ह्रस्व से परे सम्बुद्धि के हल् का
लोप होता है' इस प्रकार का यदि अर्थ होगा तो 'कतर-द्' यहां रेफोत्तर ह्रस्व
अकार से सम्बुद्धि के हल् दकार का लोप प्राप्त होगा जो अनिष्ट है । अतः इस की
निवृत्ति के लिये इस सूत्र में 'अङ्गात्' का अध्याहार किया जाता है (क्योंकि सम्बुद्धि
प्रत्यय का विधान होने से एङ् और ह्रस्व स्वतः अङ्ग होंगे ही) । 'एङ्ह्रस्वात्' को
'अङ्गात्' का विशेषण बना कर तदन्तविधि करने से—'एङन्तह्रस्वान्तादङ्गात्' ऐसा
अर्थ निष्पन्न होता है । इस अर्थ के होने से 'कतरद्' आदि में कोई दोष नहीं आता ।
क्योंकि यहां अङ्ग ह्रस्वान्त नहीं प्रत्युत रेफान्त है, रेफोत्तर अकार तो 'अद्द्' प्रत्यय्
का ही अवयव है । अतः दकारलोप न हो कर इष्ट रूप सिद्ध हो जाता है । अर्थः—
(एङ्ह्रस्वात्) एङन्त और ह्रस्वान्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (सम्बुद्धेः) सम्बुद्धि का
(हल्) हल् (लोपः) लुप्त किया जाता है । एङन्त के उदाहरण 'हे हरे!, हे विष्णो!'
आदि आगे आयेंगे । यहां ह्रस्वान्त का उदाहरण प्रस्तुत है—
राम+सुँ = 'राम+स्' यहां 'राम' इस ह्रस्वान्त अङ्ग से परे 'स्' यह
सम्बुद्धि का हल् वर्त्तमान है अतः प्रकृत सूत्र से उस का लोप हो 'राम' यह प्रयोग
सिद्ध होता है । 'हे' आदि शब्दों को साथ में जोड़ने से—'हे राम !, भो राम !' आदि
बनेंगे । सम्बोधन का द्विवचन और बहुवचन प्रथमावत् सिद्ध होता है । हे रामौ !,
हे रामाः ! ।
नोट — सम्बोधन के द्विवचन और बहुवचन में प्रथमा से कुछ भी भेद नहीं हुआ
करता; भेद सम्बुद्धि में ही होता है । अतः आगे सर्वत्र हम सम्बुद्धि की ही सिद्धि
करेंगे । द्विवचन और बहुवचन में स्वयं प्रथमावत् सिद्धि कर लेनी चाहिये ।
अब द्वितीया विभक्ति के रूप सिद्ध किये जाते हैं । द्वितीया के एकवचन में
'राम+अम्' बना । अब यहां क्रमशः अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ, अतो गुणे
(२७४) से उस का बाध कर पररूप तथा प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पररूप का
बाध कर पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है । इस अवस्था में अग्रिमसूत्र से पूर्वसवर्णदीर्घ का
भी बाध हो जाता है ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१३५) अमि पूर्वः ।६।१।१०३॥
अकोऽम्यचि पूर्वरूपमेकादेशः स्यात् । रामम् । रामौ ॥
१७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अर्थ — अक् से अम् में विद्यमान अच् परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर एक
पूर्वरूप आदेश होता है।
व्याख्या—अकः ।५।१। (अकः सवर्णे दीर्घः से)। अमि ।७।१। अचि ।७।१।
(इको यणचि से)। पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)।
पूर्वम् ।१।१। अर्थ — (अकः) अक् प्रत्याहार से (अमि) अम् प्रत्यय में स्थित (अचि)
अच् के परे होने पर (पूर्वपरयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एकः) एक (पूर्वम्) पूर्व
वर्ण आदेश हो जाता है।
'राम + अम्' यहाँ मकारोत्तर अकार = अक् से परे अम् का अच् = अकार
विद्यमान है। अतः प्रकृतसूत्र से पूर्व + पर के स्थान पर पूर्व = अकार का रूप हो कर
— राम् 'अ' म् = 'रामम्' प्रयोग सिद्ध हुआ।
द्वितीया के द्विवचन में 'राम + औट्' हुआ। टकार की हलन्त्यम् (१) से इत्
सञ्ज्ञा हो कर तस्य लोपः (३) से लोप हो जाता है — राम + औ। अब प्रथमा के
द्विवचन के समान पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो कर वृद्धि हो जाती है—रामौ।
द्वितीया के बहुवचन में 'राम + शस्' हुआ। अब शकार की इत्सञ्ज्ञा करने के
लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१३६) लशक्वतद्धिते ।१।३।८॥
तद्धितवर्जप्रत्ययाद्या ल-श-कवर्गा इतः स्युः ॥
अर्थ —तद्धितभिन्न प्रत्यय के आदि में ल्, श् और कवर्ग इत् हों।
व्याख्या प्रत्ययस्य ।६।१। (ष प्रत्ययस्य से)। आदिः ।१।१। (आदिर्ञिटुडवः
से लिङ्गविपरिणाम द्वारा)। लशकु ।१।१। इतः ।१।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् से)।
अतद्धिते ।७।१। समास —लश्च शश्च कुश्च एषां समाहारः, लशकु, समाहारद्वन्द्वः।
न तद्धिते = अतद्धिते, नञ्समासः। अर्थ —(प्रत्ययस्य) प्रत्यय के (आदि) आदि में
स्थित (लशकु) लकार, शकार और कवर्ग (इत्) इत्सञ्ज्ञक होते हैं (अतद्धिते) परन्तु
तद्धित में नहीं होने। तद्धितप्रत्यय में निषेध होने से कपु, ण, घिनुन्, घ, शस्, लच्
आदि में इत्सञ्ज्ञा न होगी। यथा—व्यूढोरस्क, वाग्मी, लोमश, चूडाल आदि।
'राम+शस्' यहाँ 'शस्' तद्धित नहीं अतः प्रकृत सूत्र से इस के आदि में स्थित
शकार की इत्सञ्ज्ञा हुई और लोप हो गया—राम + अस्। अब प्रथमयोः पूर्वसवर्णः
(१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर 'रामास्' बन गया। इस अवस्था में अग्रिम-सूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१३७) तस्माच्छसो नः पुंसि ।६।१।१०३॥
पूर्वसवर्णदीर्घात् परो यः शसः सस्तस्य नः स्यात् पुंसि ॥
अर्थ —पूर्वसवर्ण-दीर्घ से परे जो शस् का सकार उस के स्थान पर नकार हो
जाता है पुंलिङ्ग में।
व्याख्या—तस्मात् ।५।१। शसः ।६।१। नः ।१।१। पुंसि ।७।१। नकारादकार
उच्चारणार्यः। 'तद्' शब्द पूर्व का बोध कराया करता है। इस सूत्र से पूर्व प्रथमयोः
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७७
पूर्वसवर्णः (१२६) में पूर्वसवर्णदीर्घ का विधान है। अतः यहां 'तस्मात्' शब्द से भी
'पूर्वसवर्णदीर्घात्' का ग्रहण होगा। अर्थः- (तस्मात् = पूर्वसवर्णदीर्घात्) उस पूर्वविहित
पूर्वसवर्णदीर्घ से परे¹ (शसः) शस् के स्थान पर (नः) न् हो जाता है (पुंसि) पुँल्-
लिङ्ग में। अलोऽन्त्यस्य (२१) से यह नकार आदेश शस् के अन्त्य अल् सकार को
ही होगा।
'रामास्' यहां मकारोत्तर आकार पूर्वसवर्णदीर्घ है अतः इस से परे शस् के
सकार को नकार हो कर - 'रामान्' बना।
अब यहां अनिष्ट णत्व प्राप्त होता है। उस का परिहार करने के लिये ग्रन्थ-
कार प्रथम णत्वविधायक सूत्र लिखते हैं-
[लघु०] विधि-सूत्रम् - (१३८) अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि ।८।४।२॥
अट्, कवर्ग, पवर्ग, आङ्, नुम् एतैर्व्यस्तैर्यथासम्भवं मिलितैश्च व्यव-
धानेऽपि रषाभ्यां परस्य नस्य णः समानपदे। इति प्राप्ते-
अर्थः-अट् प्रत्याहार, कवर्ग, पवर्ग, आङ् और नुम् इन का अलग २ या
यथासम्भव दो तीन अथवा चारों का मिल कर व्यवधान होने पर भी समानपद में रेफ
और षकार से परे नकार को णकार हो जाता है। इस सूत्र के प्राप्त होने पर [अग्रिम-
सूत्र निषेध करता है]।
व्याख्या-अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवाये ।७।१। अपि इत्यव्ययपदम्। समानपदे ।७।१।
रषाभ्याम् ।५।२। नः ।६।१। णः ।१।१। (रषाभ्यां नो णः समानपदे से)। णकारादकार
उच्चारणार्थः। इस सूत्र से पूर्व अष्टाध्यायी में रषाभ्यां नो णः समानपदे सूत्र पढ़ा
गया है। वह सूत्र समानपद में रेफ और षकार से परे अव्यवहित (व्यवधान-रहित)
नकार को णकार करता है। यथा-चतुर्णाम्, पुष्णाति आदि। परन्तु यह सूत्र 'नरा-
णाम्, पुरुषेण' प्रभृति प्रयोगों में व्यवहित नकार को णकार करने के लिये रचा गया
है। समासः-अट् च कुश्च पुश्च आङ् च नुम् च = अट्कुप्वाङ्नुमः, इतरेतरद्वन्द्वः।
तैर्व्यवायः (व्यवधानम्) = अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायः, तृतीयातत्पुरुषः। तस्मिन् = अट्-
कुप्वाङ्नुम्व्यवाये, भावसप्तमी। अर्थः - (अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवाये) अट्प्रत्याहार, कवर्ग,
पवर्ग, आङ् और नुम् इन से व्यवधान होने पर (अपि) भी (रषाभ्याम्) रेफ और
षकार से परे (नः) न् के स्थान पर (णः) ण् हो जाता है (समानपदे) समानपद
अर्थात् अखण्ड पद में।
जिस पद के खण्ड अर्थात् टुकड़े कर उन का स्वतन्त्र रूप से प्रयोग न किया
जा सके उसे समानपद या अखण्डपद कहते हैं। 'रामान्' अखण्डपद है, इस के खण्ड
नहीं किये जा सकते। इसलिये यहां णकार प्राप्त है। 'रघुनाथः, रमानाथः, रामनाम'
१. जहां पूर्वसवर्णदीर्घ न होगा, वहां पर पुंल्लिङ्ग में भी शस् के स् को न् न होगा।
जैसे-गाः। 'गो+शस्' यहां पर ओतोऽम्शसोः (२१४) से पूर्व+पर के स्थान
पर 'आ' आदेश हुआ है, अतः पूर्वसवर्णदीर्घ न होने से न् भी न हुआ।
ल० प्र० (१२)
१७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
ये अखण्डपद नहीं इनके खण्ड हो सकते हैं। रघु और नाथ इन दोनों खण्डों का स्व-
तन्त्र प्रयोग किया जा सकता है। इसलिये इन में णत्व नहीं हुआ।
अब यहां यह विचार उपस्थित होता है कि क्या अट्, कवर्ग आदि सब का
व्यवधान हो तो णत्व होता है ? या इन में से किसी एक का व्यवधान होने पर णत्व
होता है ? पहला पक्ष असम्भव है क्योंकि संस्कृतसाहित्य में ऐसा कोई शब्द नहीं जिस
में रेफ या षकार से परे अट्, कवर्ग आदि सब से व्यवहित णकार हो। अतः लक्ष्य
(उदाहरण) न मिलने के कारण 'सब का व्यवधान हो तो णत्व होता है' यह पक्ष
असङ्गत है। दूसरा पक्ष ठीक है। इस से 'नराणाम्, कराणाम्, पुरुषेण' आदि प्रयोगों
की सिद्धि हो जाती है। करणे यज (८०७), स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन (६२६)
इत्यादि पाणिनिसूत्रों से भी इस पक्ष की पुष्टि होती है। इन सूत्रों में मुनि ने एक २
का व्यवधान होने पर णकार आदेश किया है। किञ्च - इस पक्ष के अतिरिक्त एक
अन्य पक्ष भी महामुनि के सूत्रपाठ में पुष्ट होता है। वह यह है कि 'अट्, कवर्ग
आदियों में चाहे जितने वर्णों का व्यवधान हो णत्व हो जाय। मुनि ने—सरूपाणाम्
एकशेष एकविभक्तौ (१२५), कर्मणि द्वितीया (८६१), इन्हन्पूषार्यम्णां शौ (२८४)
इत्यादि सूत्रों में यथासम्भव अनेकों का व्यवधान होने पर भी णकार आदेश किया है।
ग्रन्थकार ने इन दोनों पक्षों का—एतैर्व्यस्तैैर्यथासम्भवं मिलितैश्च इन शब्दों में वर्णन
किया है। इन के उदाहरण यथा—
अट्—वरणम्, हरणम्, करिणा, कुरुणा, गिरीणाम्, अर्हेण इत्यादि।
कवर्ग—अर्केण, मूर्खाणाम्, गर्गेण, अर्घेण इत्यादि।
पवर्ग—दर्पेण, रेफेण, गर्मेण, चर्मणा, वर्मणा इत्यादि।
आङ्—पर्याणद्धम्, निराणद्धम् इत्यादि¹।
नुम्—बृंहणम्, तृंहणम् इत्यादि। यहां 'नुम्' से अनुस्वार अभिप्रेत है। वह
अनुस्वार चाहे 'नुँम्' के स्थान पर हुआ हो या स्वाभाविक हो इस में कुछ प्रयोजन
नहीं। यथा—'बृंहणम्' यहां नुँम् के स्थान पर अनुस्वार हुआ है। 'तृंहणम्' यहां
स्वाभाविक अनुस्वार है।
सूचना—सम्पूर्ण णत्वप्रकरण में रेफ और षकार की तरह ऋवर्ण को भी णत्व
में निमित्त समझना चाहिये। अत एव ऋतॄन्तॄच्—प्रशास्तॄणाम् (२०६) इत्यादि मुनिवर
के निर्देश उपलब्ध होते हैं। आगे चल कर ग्रन्थकार ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम्
(वा० २१) इस वार्तिक को स्वयं ही उद्धृत करेंगे।
रामान् = र् + आ + म् + आ + न्। यहां रेफ से पर आ = अट्, म् = पवर्ग,
१ इस सूत्र की अनुवृत्ति उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य (४५६) सूत्र में जाती है।
अतः पर्याणद्धम् आदि में उस से णत्व हो जाता है। पदव्यवायेऽपि (८।४।३७)
द्वारा निषेध नहीं होता। यही आङ् के ग्रहण का प्रयोजन है। इस पर विस्तृत
विचार व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखें।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७६
आ=अट् इन तीन वर्णों से व्यवहित नकार है अतः अट्कु० सूत्र से णकार प्राप्त होता
है। अब इस का अग्रिमसूत्र से निषेध करते है—
[लघु०] निषेध-सूत्रम् (१३६) पदान्तस्य ।८।४।३६॥
नस्य णो न। रामान् ॥
अर्थ:—पदान्त नकार को णकार नहीं होता।
व्याख्या—पदान्तस्य ६।१। नः ।६।१। णः ।१।१। (रषाभ्यां नो णः समान-
पदे से) । न इत्यव्ययपदम् (न भाभूपू० से)। अर्थः—(पदान्तस्य) पद के अन्त वाले
(नः) न् के स्थान पर (णः) ण् आदेश (न) नहीं होता।
'रामान्' यह सुबन्त होने से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) के अनुसार पदसञ्ज्ञक
है। यहां 'न्' पदान्त है। अतः प्रकृत पदान्तस्य से नकार को णकार होने का निषेध
हो गया तो 'रामान्' प्रयोग सिद्ध हुआ।
तृतीया के एकवचन में—राम+टा। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४०) टाङसिँङसामिनात्स्याः ।७।१।१२॥
अदन्तात् टादीनामिनादयः स्युः। णत्वम्—रामेण॥
अर्थ:—अदन्त (अङ्ग) से परे टा को इन, ङसिँ को आत् और ङस् को स्य
आदेश होता है।
व्याख्या—अतः ।५।१। (अतो भिस ऐस् से)। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह
अधिकृत है, इस का विभक्तिविपरिणाम हो जाता है)। टाङसिँङसाम् ।६।३।
इनात्स्याः ।१।३। 'अङ्गात्' का विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि हो जाती है—
अदन्ताद् अङ्गात्। अर्थः—(अतः=अदन्तात्) अदन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (टा-
ङसिँ-ङसाम्) टा, ङसिँ, ङस् के स्थान पर (इनात्स्याः) इन, आत्, स्य आदेश हो जाते
हैं। यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) के अनुसार टा को इन, ङसिँ को आत् तथा
ङस् को स्य आदेश हो जाता है। ध्यान रहे कि इन और स्य आदेश अदन्त हैं।
'राम+टा' यहां 'राम' अदन्त अङ्ग है। इस से परे 'टा' को 'इन' आदेश
हो जाता है। 'राम+इन' इस अवस्था में आद् गुणः (२७) से गुण एकादेश तथा
अट्कु० (१३८) से नकार को णकार आदेश हो कर 'रामेण' रूप सिद्ध होता है। स्मरण
रहे कि यहां पदान्तस्य (१३६) द्वारा णत्व का निषेध नहीं होता, क्योंकि यहां न्-
पदान्त नही, पदान्त 'अ' है।
तृतीया के द्विवचन में राम+भ्याम्। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४१) सुँपि च ।७।३।१०२॥
यञादौ सुँपि अतोऽङ्गस्य दीर्घः। रामाभ्याम् ॥
अर्थ:—यञादि सुँप् परे होने पर अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो जाता है।
व्याख्या—सुँपि ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)।
अतः ।६।१। दीर्घः ।१।१। यञि ।७।१। (अतो दीर्घो यञि से)। 'यञि' पद 'सुँपि' पद
का विशेषण है और अल् है इस लिये इस से तदादिविधि हो कर 'यञादौ सुँपि' बन
१८० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
जायेगा। 'अत' यह 'अङ्गस्य' का विशेषण है अत इस से तदन्तविधि होकर 'अदन्तस्य
अङ्गस्य' हो जायेगा। अर्थ — (यञि) यञादि (सुपि) सुँप् परे होने पर (अत )
अदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (दीर्घ ) दीर्घ हो जाता है। यञ् एक प्रत्याहार
है, यञादि सुँप् — भ्याम्, भ्यस् आदि हैं। अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा यह दीर्घ आदेश
अदन्त अङ्ग के अन्त्य अल् = अत् के स्थान पर ही होता है।
'राम + भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यञादि सुँप् है, अत इस के परे होने पर 'राम'
इस अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो — 'रामाभ्याम्' प्रयोग सिद्ध हुआ।
तृतीया के बहुवचन में 'भिस्' प्रत्यय आकर 'राम + भिस्' हुआ। सुपि च
(१४१) से दीर्घ के प्राप्त होने पर उस का बाध कर वक्ष्यमाण बहुवचने झल्येत्
(१४५) सूत्र से अदन्त अङ्ग को एकार प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त
होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४२) अतो भिस ऐस् ।७।१।९॥
अदन्ताद् अङ्गात् परस्य भिस ऐस् स्यात्। अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५)
—रामैः ॥
अर्थ — अदन्त अङ्ग से परे भिस् के स्थान पर ऐस् आदेश हो।
व्याख्या—अत ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है, इस की विभक्ति
का यहां विपरिणाम हो जाता है)। भिस ।६।१। ऐस् ।१।१। 'अङ्गात्' का विशेषण
होने से 'अतः' से तदन्तविधि हो जायेगी। अर्थ — (अतः = अदन्तात्) अदन्त (अङ्गात्)
अङ्ग से परे (भिस ) भिस् के स्थान पर (ऐस्) ऐस् हो जाता है। यह आदेश
तस्मादित्युत्तरस्य (७१) द्वारा अदन्त अङ्ग से परे भिस् को होना है। 'भिस' यह
षष्ठीनिर्दिष्ट है। अत अलोऽन्त्यस्य (२१) से उस के अन्त्य अल् सकार को यह आदेश
होना चाहिये। पर उस के बाधक आदे परस्य (७२) द्वारा भिस् के आदि अल् =
भकार को ही प्राप्त होता है। इस पर अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) द्वारा उस का भी
बाध कर सम्पूर्ण भिस् के स्थान पर ऐस् आदेश हो जाता है।
'राम + भिस्' यहां 'राम' यह अदन्त अङ्ग है अत इस से परे प्रकृत सूत्र
द्वारा भिस् के स्थान पर ऐस् सर्वादेश होकर —राम + ऐस्। अब वृद्धिरेचि (३३)
से पूर्व+पर के स्थान पर 'ऐ' वृद्धि हो रुँत्व विसर्ग करने से—'रामैः' प्रयोग सिद्ध
होता है।
अब रामशब्द के चतुर्थी विभक्ति के रूप सिद्ध किये जाते हैं। चतुर्थी के एक-
वचन में 'राम + ङे' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४३) ङेर्यः ।७।१।१३॥
अतोऽङ्गात् परस्य ङेर्यादेश ॥
अर्थ.—अदन्त अङ्ग से परे 'ङे' के स्थान पर 'य' आदेश हो।
व्याख्या—अत ।५।१। (अतो भिस ऐस् से)। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह