सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 99

८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
'गङ्गे अमू' (ये दो गङ्गाएं हैं) यहां गकारोत्तर एकार एदन्त द्विवचन है¹।
इस की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जाती है । प्रगृह्या-सञ्ज्ञा होने से प्लुत-प्रगृह्या
अचि नित्यम् (५०) सूत्र द्वारा प्रकृतिभाव हो जाता है । अतः यहां एङः पदान्तादति
(४३) सूत्र से पूर्वरूप एकादेश नहीं होता ।
नोट—यहां कई विद्यार्थी 'हरी', 'विष्णू', 'गङ्गे' आदि पदों को ही ईद्वन्त,
ऊदन्त तथा एदन्त द्विवचन माना करते हैं, यह उन की भूल हुआ करती है । इस भूल
से सावधान रहना चाहिये । यहां ईकार, ऊकार तथा एकार ही ईद्वन्त, ऊदन्त तथा
एदन्त द्विवचन हैं । प्रक्रिया ऊपर लिख दी है, आगे सुबन्तों में स्पष्ट हो जायेगी ।
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५२) अदसो मात् ।१।१।१२॥
अस्मात् परावीदूतो प्रगृह्यौ स्तः । अमी ईशाः । रामकृष्णवामू आसाते ।
मात् किम् ? अमुकेऽत्र ॥
अर्थः—अदस् शब्द के मकार से परे ईत् और ऊत् प्रगृह्य-सञ्ज्ञक हों ।
व्याख्या—अदसः ६।१। [अवयव-षष्ठी] । मात् ।५।१। [दिग्योगे पञ्चमी] ।
ईदूत् ।१।१। प्रगृह्यम् ।१।१। (ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् से) । अर्थ - (अदसः) अदस्
शब्द के अवयव (मात्) मकार से परे (ईदूत्) ईत् और ऊत् (प्रगृह्यम्) प्रगृह्य-
सञ्ज्ञक होते हैं ।
'अदस्' शब्द सर्वनाम है । इसका प्रयोग दूरस्थ पदार्थ के निर्देश में होता है ।
यथा—असौ बालः (वह बालक है) । इस की तीनों लिङ्गों में रूपमाला यथा—
(पुल्लिङ्ग में) प्र०—असौ, अमू, अमी । द्वि०—अमुम्, अमू, अमून् । तृ०—
अमुना, अमूभ्याम्, अमीभिः । च०—अमुष्मै, अमूभ्याम्, अमीभ्यः । प०—अमुष्मात्,
अमूभ्याम्, अमीभ्यः । ष०—अमुष्य, अमुयोः, अमीषाम् । स०—अमुष्मिन्, अमुयोः,
अमीषु ।
(स्त्रीलिङ्ग में) प्र०—असौ, अमू, अमूः । द्वि०—अमूम्, अमू, अमूः । तृ०—
अमुया, अमूभ्याम्, अमूभिः । च०—अमुष्यै, अमूभ्याम्, अमूभ्यः । प०—अमुष्याः,
अमूभ्याम्, अमूभ्यः । ष०—अमुष्याः, अमुयोः, अमूषाम् । स०-अमुष्याम्, अमुयोः,
अमूषु ।
(नपुंसक में) प्र०—अदः, अमू, अमूनि । द्वि०—अदः, अमू अमूनि । आगे
पुंवत् ।
अदस् शब्द के मकार से परे ईत् और ऊत् पुल्लिङ्ग में प्रथमा के बहुवचन तथा
प्रथमा द्वितीया के द्विवचन में और स्त्रीलिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा द्वितीया के
१ गङ्गा शब्द से प्रथमा या द्वितीया का द्विवचन 'औ' आने पर औङ आपः (२१६)
से उसे शी = ई आदेश हो कर आद् गुणः (२७) से गुण हो जाता है । यहां 'ए'
यह एकादेश परादिवद्भाव से द्विवचन तथा व्यपदेशिवद्भाव से एदन्त है ।