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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 633 में से

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पृष्ठ 77

६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
होने पर (पूर्वपरयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एव) एक (वृद्धि) वृद्धि आदेश
हो । उदाहरण यथा -
प्र+ऊह = प्र् 'औ' ह = 'प्रौहः' । [ उत्तम तर्क वा उत्तम तर्क करने वाला ]
प्र+ऊढ = प्र् 'औ' ढ = 'प्रौढः' । [ बढ़ा हुआ वा अधेड़ ]
प्र+ऊढि = प्र् 'औ' ढि = 'प्रौढिः' । [ प्रौढ़ता व शेखी ]
प्र+एष = प्र् 'ऐ' ष = 'प्रैषः' । [ प्रेरणा, घञन्तोऽत्र इष्-धातु ]
प्र+एष्य = प्र् 'ऐ' ष्य = 'प्रैष्यः' । [ प्रेरणीय, सेवक, ण्यदन्तोऽत्र इष्-धातु ]
प्रैष, प्रैष्य यहां एङि पररूपम् (३८) से पररूपम् प्राप्त था शेष स्थानों पर
आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण प्राप्त था । यह वार्त्तिक इन दोनों का अपवाद है ।
[लघु०] वा०- (६) ऋते च तृतीया-समासे ॥
सुखेन ऋतः = सुखार्तः । तृतीयेति किम् ? परमर्तः ॥
अर्थ - तृतीया-समास में अवर्ण से ऋत शब्द का आदि ऋवर्ण परे होने पर
पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है ।
व्याख्या-आत् ।५।१। (आद् गुण सूत्र से) । ऋते ।३।१। च इत्यव्ययपदम् ।
पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१।
(वृद्धिरेचि से) । तृतीया-समासे ।७।१। अर्थ - (तृतीया समासे) तृतीया-तत्पुरुष-समास
में (आत्) अवर्ण से (ऋते) 'ऋत' शब्द परे होने पर (च) भी (पूर्व परयोः) पूर्व +
पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा -
'सुखेन ऋतः' यह लौकिक-विग्रह है । अलौकिक-विग्रह अर्थात् 'सुख टा ऋत
सुँ' में सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र द्वारा टा और सुँ का लुक् हो जाने पर
'सुख+ऋत' ऐसा बनता है । अब इस वार्त्तिक से पूर्व-अवर्ण और पर = ऋवर्ण के
स्थान पर वृद्धि करनी है । 'अ+ऋ' का स्थान 'कण्ठ+मूर्धा' है । कण्ठ+मूर्धा'
स्थान वाला वृद्धि-संज्ञकों में कोई नहीं, सब का 'कण्ठ' स्थान ही तुल्य है । अब यदि
'आ' यह वृद्धि एकादेश करें तो उरण्रपरः (२६) सूत्र से रपर होकर 'आर्' हो जाने
से 'कण्ठ+मूर्धा' स्थान तुल्य हो जायेगा । तो ऐसा करने से—सुख् 'आर्' त् =
'सुखार्तः' प्रयोग हो कर विभक्ति लाने से 'सुखार्तः' सिद्ध हो जाता है । इस का अर्थ—
सुख से प्राप्त हुआ अर्थात् सुखी है ।
अब यहां यह विचार उपस्थित होता है कि अवर्ण से 'ऋत' परे होने पर वृद्धि
का विधान समास में तो करना ही चाहिये, क्योंकि 'सुखेन+ऋतः' यहां लौकिक-
विग्रह में वृद्धि न हो कर गुण एकादेश होने से 'सुखेतर्तः' प्रयोग बन सके । परन्तु
'तृतीया का ही समास हो अन्य विभक्तियों का न हो' इस कथन का क्या प्रयोजन है?
क्यों समास मात्र में ही वृद्धि का विधान न कर दिया जाये ? इस का उत्तर ग्रन्थकार
यह देते हैं कि यदि 'तृतीया' न कहेंगे, समास-मात्र में ही वृद्धि विधान करेंगे तो
'परमश्चासौ ऋतः = परम+ऋतः' यहां गुण न हो कर वृद्धि हो जायेगी, क्योंकि समास