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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 633 में से

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पृष्ठ 75

६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
धातु के लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है] यहां पकारोत्तर अवर्ण से परे
एजादि 'इण्' धातु वर्त्तमान है, अत इस सूत्र से पूर्व = अ और पर = ए के स्थान पर
'ऐ' यह एक वृद्धि आदेश हो कर—उप् 'ऐ' ति = उपैति' प्रयोग सिद्ध होता है।
उपैधते (पास बढ़ता है)। 'उप+एधते' ['एधत' यह पद एधँ वृद्धौ (भ्वा०)
धातु के लँट् लकार के प्रथमपुरुष का एकवचन है] यहां अवर्ण से परे एजादि एध्
धातु वर्त्तमान है अत पूर्व=अ और पर = ए के स्थान पर एक 'ऐ' वृद्धि आदेश हो
कर—उप् 'ऐ' धते = 'उपैधते' प्रयोग सिद्ध होता है।
प्रष्ठौह (प्रष्ठवाहः का')। 'प्रष्ठ+ऊह' (यहा ऊठ्' है। कैसा है ? यह
हलन्त-पुंल्लिङ्ग में 'विश्ववाह्' शब्द पर स्पष्ट होगा) यहा अवर्ण स ऊठ् परे है अत
पूर्व = अ और पर = ऊ दोना के स्थान पर 'औ' यह वृद्धि एकादेश हो कर—प्रष्ठ्
'औ' ह—'प्रष्ठौह' प्रयोग सिद्ध होता है।
यह सूत्र ऊठ् के विषय मे गुण का तथा इण् और एध् के विषय म आगे वक्ष्य-
माण एङि पररूपम् (३८) सूत्र द्वारा विधीयमान पररूप का अपवाद है।
अब यहा यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस सूत्र में इण् और एध् धातु को
एजादि क्यो कहा गया है ? अर्थात् यदि एजादि न कहते, तो कौन सी हानि हो
जाती ? इस का उत्तर यह है कि एजादि न कहने से 'उपेन' और 'प्रेदिधत्' प्रयोगो
मे भी वृद्धि हो जाती, जो नितान्त अनिष्ट है। तथाहि—उपेन (समीप पहुँचा, युक्त
अथवा वे दोनों पास जाते हैं)। 'उप+इत' ('इत' यह पद इण् गतौ धातु का क्तान्त
रूप है अथवा लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का द्विवचन है) यहा अवर्ण से परे 'इण्' धातु
तो है पर वह एजादि नही, अत. वृद्धि न हो कर आद् गुण (२७) सूत्र से 'ए' यह
गुण एकादेश ही होगा। इस स—उप् 'ए'त = 'उपेन' यह दृष्ट रूप सिद्ध हो जायेगा।
'मा भवान् प्रेदिधत्' (आप अधिक न वढावें) ['इदिधत्' यह णिजन्त एध् धातु के लुङ्
लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है। यहा न माड्योगे (४४१) सूत्र मे 'आट्'
आगम का निषेध हो जाता है, इसी बात को जतलाने के लिये यहा 'मा' पद का
प्रयोग किया गया है] यहा अवर्ण से परे 'एध्' धातु तो वर्त्तमान है, पर वह एजादि
नही, अत इस सूत्र से वृद्धि न हो आद् गुणः (२७) सूत्र द्वारा गुण हो जायेगा।
इस मे—प्र् 'ए' दिधत्='प्रेदिधन्' यह इष्ट रूप सिद्ध हो जायेगा।
य दोनो उक्त सूत्र के प्रत्युदाहरण है। विपरीत उदाहरणो को प्रत्युदाहरण
कहते है, अर्थात् 'यदि सूत्रो मे यह न कहते तो यह अशुद्ध हो जाता' इस प्रकार जो
प्रयोग दर्शाये जाते है उन्हे प्रत्युदाहरण कहते हैं।
सूत्र में 'एति' और 'एधति' से 'इण्' और 'एध्' धातु का ही ग्रहण समझना
१ उद्दण्डता दूर करने के लिये जिस के गले म युग या भारी काष्ठ बान्ध देते है उस
बछडे या बैल को 'प्रष्ठवाह्' कहते है। यहा प्रष्ठवाह् शब्द के षष्ठी के एक-
वचनान्त का प्रयोग है। प्रष्ठवाड् युगपार्श्वग, प्रष्ठोही बालगभिणी—इत्यमर ।