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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 633 में से

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पृष्ठ 71

५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
(२७) सूत्र द्वारा 'अ+इ' के स्थान पर 'ए' तथा 'अ+उ' के स्थान पर 'ओ' गुण
एकादेश प्राप्त होता है । इस पर इस के निवारणार्थ अग्रिम-सूत्र लिखते हैं—
[लघु०] अधिकार-सूत्रम्—(३१) पूर्वत्रासिद्धम् ।८।२।१॥
सपाद-सप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं
शास्त्रमसिद्धम् । हर इह, हरयिह । विष्ण इह, विष्णविह ॥
अर्थ —सवा सात अध्यायों के प्रति त्रिपादी-सूत्र असिद्ध होते हैं और त्रिपादी
सूत्रों में भी पूर्वशास्त्र के प्रति पर-शास्त्र असिद्ध होता है ।
व्याख्या—अष्टाध्यायी में आठ अध्याय और प्रत्येक अध्याय में चार चार पाद
हैं, यह सब पीछे संज्ञा-प्रकरण में विस्तार पूर्वक स्पष्ट कर चुके हैं । सात अध्याय
सम्पूर्ण और आठवें अध्याय के प्रथम-पाद के व्यतीत होने पर आठवें अध्याय के दूसरे
पाद का यह प्रथम-सूत्र है । यह अधिकार-सूत्र है । अधिकारसूत्र स्वयं कुछ नहीं किया
करते किन्तु अग्रिम-सूत्रों में अनुवृत्ति के लिये हुआ करते हैं । उन की अवधि (हद्द)
निश्चित हुआ करती है । इस सूत्र का अधिकार यहां से लेकर अ अ (८।४।६७) सूत्र
अर्थात् अष्टाध्यायी के अन्तिमसूत्र तक जाता है । इस प्रकार आठवें अध्याय का दूसरा,
तीसरा तथा चौथा पाद इस के अधिकार में आता है । यह सूत्र इन तीनों पादों के
सूत्रों में जा कर अनुवृत्ति करता है कि तू (पूर्वत्र इत्यव्ययपदम्) पूर्व-शास्त्र में (असिद्धम्
।१।२।) असिद्ध है, अर्थात् पूर्व की दृष्टि में तेरा कोई अस्तित्त्व ही नहीं । इस से यह
होता है कि इन तीन पादों के सूत्र पूर्व-घटित सवा सात अध्यायों की दृष्टि में तथा
इन तीन पादों में भी पूर्व के प्रति पर-सूत्र असिद्ध हो जाता है । यथा—आद् गुणः
(२७) सवा सात अध्यायों के अन्तर्गत-सूत्र है [यह छठे अध्याय के प्रथम पाद का ८४
वा सूत्र है]। इसकी दृष्टि में आठवें अध्याय के तीसरे पाद में वर्त्तमान लोपः शाकल्यस्य
(३०) सूत्र असिद्ध है, अतः आद् गुणः (२७) सूत्र लोपः शाकल्यस्य (३०) सूत्र
द्वारा किये गये यकार-वकार के लोप को नहीं देखता, इसे तो अब भी यकार-वकार
सामने पड़े हुए दीख रहे हैं । अवर्ण से परे यकार-वकार के दिखाई देने से अच् परे न
होने के कारण आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश नहीं होता—हर इह, विष्ण
इह—ऐसे ही अवस्थित रहते हैं । इस प्रकार—लोप-पक्ष में 'हर इह, विष्ण इह' तथा
लोपाभावपक्ष में 'हरयिह, विष्णविह' रूप सिद्ध होते हैं ।¹
अभ्यास (५)
(१) कौमुदीस्थ लम्बा-चौड़ा अर्थ पूर्वत्रासिद्धम् सूत्र का कैसे हो जाता है ?
(२) सूत्र में विकल्प वाचक पद के न होने पर भी लोपः शाकल्यस्य सूत्र
कैसे वैकल्पिक लोप किया करता है ?
१ त्रिपाद्यां में पूर्व के प्रति पर-शास्त्र की असिद्धि में उदाहरण यथा—किम्मुक्तम् ।
यहां पर मोऽनुस्वारः (८।३।२३) इस पूर्व त्रिपादी सूत्र के प्रति मयो ञ्ञो वो वा
(८।३।३३) इस पर-त्रिपादी-सूत्र के असिद्ध होने से (अर्थात् व् की जगह उ =
अच् होने से) म् को अनुस्वार नहीं होता ।