लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अर्थ.—अव्यय से विधान किये गये आप् (टाप् आदि स्त्रीप्रत्ययो) तथा सुँप्
प्रत्ययो का लुक् हो जाता है ।
व्याख्या —अव्ययात् ।२।४।८२। आप्सुपं ।६।१।१। लुक् ।१।१।१। (ण्यक्क्षत्रियार्षेञितो
यूनि लुगणिञोः से) । आप् च सुँप् च आप्सुपं, तस्य = आप्सुपं, समाहारद्वन्द्वः । अर्थः
—(अव्ययात्) अव्यय से विधान किये गये (आप्सुपं) आप् और सुँप् प्रत्यय का
(लुक्) लुक् हो जाता है । आप् से टाप्, डाप्, चाप् आदि स्त्रीप्रत्ययो का तथा सुँप्
से सुँ, औ, जस आदि का ग्रहण होता है । उदाहरण यथा —
तत्र शालायाम् (उस शाला मे) । यहा 'तत्र' यह अव्यय 'शाला' इस स्त्री-
लिङ्गी पद का विशेषण है अत इस से अजाद्यतष्टाप् (१२४५) द्वारा टाप् प्रत्यय हो
कर प्रकृतसूत्र से लुक् हो जाता है ।
सुँप का लुक् तो प्रत्येक अव्यय से होता ही है—च+सुँ=च । वा+सुँ=
वा । इस सूत्र पर विशेष विचार सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्याओ मे देखें ।
अब अव्यय का लक्षण करने के लिये एक प्राचीन श्लोक (गोपथब्राह्मण की
ब्रह्मपरक श्रुति) उद्धृत करते हैं—
[लघु०] सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु ।
वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥
अर्थ.—जो तीनो लिङ्गो, सब विभक्तियो और सब वचनो मे विकार को प्राप्त
नही होता—एक जैसा रहता है—बदलता नही, वह अव्यय कहाता है ।
व्याख्या—अव्ययम् यह अन्वर्थ अर्थात् अर्थानुसारिणी सज्ञा है । नास्ति व्यय
=विनाश =विकृतिर्यस्य यस्मिन् वा तद् अव्ययम् । जिस में किसी प्रकार की विकृति
न हो—प्रत्येक अवस्था मे एक जैसा स्वरूप रहे उसे अव्यय कहते हैं । इसी लक्षण को
ऊपर के श्लोक में और अधिक परिष्कृत किया गया है । श्लोक मे 'विभक्ति' से तात्पर्य
कर्म आदि कारक और 'वचन' से एकत्व, द्वित्व, बहुत्व का ग्रहण समझना चाहिये ।
अब 'अव' और 'अपि' उपसर्गों के विषय मे भागुरि आचार्य का मत दर्शाते
हैं—
[लघु०] वष्टि' भागुरिरल्लोपम् अवाप्योरुपसर्गयोः ।
आप् चैव हलन्ताना यथा वाचा निशा दिशा ॥
वगाहः। अवगाहः। पिधानम् । अपिधानम् ॥
अर्थ —भागुरि आचार्य 'अव' और 'अपि' उपसर्गों के (आदि) अकार का
लोप चाहते हैं तथा हलन्त शब्दो से स्त्रीत्ववोधक 'आप्' प्रत्यय भी विधान करना
चाहते हैं ।
१. वष्टेश्चान्दसत्वेन प्रयोगश्चिन्त्य इति नागेशः । एतज्ज्ञापकाद् भाषायामप्यस्य
प्रयोग इति तत्त्वबोधिनी-बालमनोरमाकारादयः ।