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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 593

५७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
५ कसे (से) — प्रेषे (भेजने के लिये) । १६. कै प्रत्ययान्त — प्रयै (जाने के लिये) १
६. कसेन् (असे) — श्रियसे (श्रयितुम्) । १७ इध्यै ,, — रोहिष्यै (रोढुम्) ।
७ अध्यै — पृणध्यै (भरने के लिये) । १८ ,, ,, — अव्यथिष्यै (अव्यथ-
८ अध्यैन् (अध्यै) — पूर्वोक्त उदाहरण । नाय)
९ कध्यै (अध्यै) — आह्वध्यै (आह्नोतुम्) । १९ वे प्रत्ययान्त — दृशे (देखने के लिये) २
१० कध्यन् (अध्यै) — पूर्वोक्त उदाहरण । २० ,, — विख्ये (विख्यातुम्) ।
११. शध्यै (अध्यै) — मादयध्यै (माद- २१ तवै — न म्लेच्छितवै (अपशब्द नही
यितुम्) । बोलने चाहिये) ३
१२ शध्यैन् (अध्यै) — पिवध्यै (पीने के २२ केन् (ए) — अवगाहे (अवगाहित-
लिये) । व्यम्) ।
१३ तवै — दातवै (देने के लिये) ।
१४ तवेङ् (तवे) — सूनवे (जनने के लिये) । २३ एश्प्रत्ययान्त — अवचक्षे (अवख्यात-
१५ तवेन् (तवे) — कर्त्तवे (करने के लिये) । व्यम्) ४
अब ग्रन्थकार अन्य कृदन्त अव्ययो का निरूपण करते हैं—
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् — (३७०) क्त्वा-तोसुन्-कसुनः १।१।३६॥
एतदन्तमव्ययम् । कृत्वा । उदेतोः । विसृप ॥
अर्थः— क्त्वा, तोसुन् और कसुन् प्रत्यय जिस के अन्त मे हो वह भी अव्यय-
संज्ञक होता है।
व्याख्या— क्त्वा-तोसुन्-कसुन् १।३। अव्ययानि १।३। (स्वरादिनिपातम-
व्ययम् से वचनविपरिणाम द्वारा) । केवल प्रत्यय की संज्ञा का कुछ भी प्रयोजन न
होने से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ — (क्त्वा-तोसुन्-कसुन्) क्त्वा, तोसुन् या
कसुन् प्रत्यय जिन के अन्त में हों वे शब्द (अव्ययानि) अव्ययसंज्ञक होते हैं। उदा-
हरण यथा—
आदि पन्द्रह प्रत्यय होते हैं। इन प्रत्ययो मे अनुबन्धभेद स्वरभेद के लिये मा
गुणवृद्धिनिषेध आदि के लिये समझना चाहिये।
१ प्रयै-रोहिष्यै अव्यथिष्यै (३ ४ । १०) — तुमुन् प्रत्यय के अर्थ मे प्रयै, रोहिष्यै
और अव्यथिष्यै ये तीन कृदन्त शब्द वेद में निपातित किये जाते हैं।
२ दृशे विख्ये च (३ ४ । ११) — तुमुन् प्रत्यय के अर्थ मे दृशे और विख्ये ये दो
कृदन्त शब्द वेद मे निपातित किये जाते हैं।
३. कृत्यार्थे तवै-केन्-केन्य-त्वनः (३ ४ । १४) — कृत्यप्रत्ययो के अर्थ में वेद मे तवै,
केन्, केन्य और त्वन् प्रत्यय धातु से परे होते हैं। तवै और केन् प्रत्यय एजन्त
कृत्यप्रत्यय हैं अत एतदन्तो की ही अव्ययसंज्ञा होती है अन्यदन्तों की नही।
४ अवचक्षे च (३.४.१५) — कृत्यप्रत्यय के अर्थ में वेद में 'अवचक्षे' यह कृदन्त शब्द
निपातित किया जाता है।