लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
नोट—अव + दा + क्त = अव + दद् + त = अवदत्तम् । यहां 'अव' उपसर्ग
नहीं अपितु उपसर्गप्रतिरूपक (उपसर्ग के सदृश दिखाई देने वाला) निपात है । अतः
उपसर्ग न होने से इस से परे 'दा' धातु के आकार को अच उपसर्गात्त (७।४।४७)१
सूत्रद्वारा त् आदेश नहीं होता । दो दद् घो (८२७)२ द्वारा सम्पूर्ण 'दा' के स्थान पर
दद् आदेश ही होता है । ध्यान रहे कि 'अव' उपसर्ग के योग में 'दा' के आकार को
त् आदेश करने पर—अव + द त् + क्त = अवत्तम् रूप बनता है । इसी प्रकार—
अवदत्तं विदत्तं च प्रदत्तञ्चादिकर्मणि ।
सुदत्तमनुदत्तञ्च निदत्तमिति चेष्यते ॥ (महाभाष्य)
इन में अनु, प्र, सु, वि और नि को भी उपसर्गप्रतिरूपक निपात समझना चाहिये ।
विभक्तिप्रतिरूपक यथा—
[४८] अहंयु ॥
१ अहङ्कारवान्—स शुश्रुवांस्तद्वचनं मुमोह राजाऽसहिष्णु सुतविप्रयोगम् ।
अहंयुनाऽथ क्षितिपं शुभंयुस्तच्चे वचस्तापसकुञ्जरेण (भट्टि० १।२०), महाराज दशरथ
विश्वामित्र के उन वचनों को सुन कर पुत्रवियोग को सहन न करते हुए मोह को
प्राप्त हो गए । तब अहङ्कारवान् तापसश्रेष्ठ विश्वामित्र ने अपना कल्याण चाहने वाले
राजा को यह वचन कहा ।
नोट—'अहम्' यह अहङ्कारवाचक विभक्तिप्रतिरूपक निपात है । 'अस्मद्'
शब्द के प्रथमैकवचनान्त के समान प्रतीत होता है, परन्तु है यह उस से नितान्त ही
भिन्न । इस निपात (अव्यय) से मत्वर्थ में अहञ्शुभमोर्युस् (११६२) सूत्रद्वारा युस्
प्रत्यय हो जाता है । अहम् (अहङ्कार ) यस्यास्तीति—अहंयु । 'अहंयु' शब्द उकारान्त
त्रिलिङ्गी हो जाता है । ध्यान रहे कि इसे सकारान्त समझना भूल है । प्रत्यय का
सित्त्व पदसञ्ज्ञार्थ है । अतः भसञ्ज्ञा न हो कर पदसञ्ज्ञा के कारण मोऽनुस्वार (७७) से
मकार को अनुस्वार हो जाता है । 'अहंयु' शब्द में यदि 'अस्मद्' शब्द होता तो
प्रत्ययोत्तरपदयोश्च (७ २ ६८) द्वारा मपर्यन्त मद् आदेश होकर 'मद्यु' ऐसा अनिष्ट
रूप बन जाता ।
इसी प्रकार 'शुभम्' (सुख, कल्याण) इस विभक्तिप्रतिरूपक निपात से भी युस्
प्रत्यय हो कर—शुभम् यस्यास्तीति 'शुभंयु' निष्पन्न होता है । इस का साहित्यगत
प्रयोग भी ऊपर के श्लोक में आ चुका है । अहङ्कारवानहंयुः शुभंयुस्तु शुभान्वित —
इत्यमर ।
चिरेण, चिराय, चिरात्, चिरे, चिरस्य—इत्यादि अव्ययो को भी कई लोग
१ अच उपसर्गात्त (७।४।४७) — अजन्त उपसर्ग से परे घुसंज्ञक दा धातु के आकार
को त्' आदेश हो जाता है तकारादि कित् प्रत्यय परे हो तो ।
२ दो दद् घो (८२७)—घुसंज्ञक दा धातु को 'दद्' यह सर्वादेश हो जाता है
तकारादि कित् प्रत्यय परे हो तो ।