सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 551

५३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[१] च*॥
१ समुच्चय¹—अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थञ्च चिन्तयेत् (हितोप० ३)। स
शापो न तया राजन् न च सारथिना श्रुतः (रघु० १।७८)। २ अन्वाचय—भो
भिक्षामट गाञ्चानय (गणरत्न०), भिक्षा के लिये घूमो और (यदि मार्ग में गौ मिल
जाये तो) गाय को भी लेते आना। ३ इतरेतरयोग—तयोर्जगृहतुः पादान् राजा
राज्ञी च मागधी। तौ गुरुर्गुरुपत्नी च प्रीत्या प्रतिननन्दतुः (रघु० १।५७)। ४ समा-
हार—पाणी च पादौ च पाणिपादम् (गणरत्न०)। ५ परन्तु लेकिन—शान्तमिदमा-
श्रमपदं स्फुरति च बाहुः कुतः फलमिहास्य (शाकुन्तल० १।१५)। यज्जातसूनूस्तूर्णां
घर्माद्योन चाग्निम (हितोप० १३)। ६ तुल्ययोगिता (ज्यों ही त्यों ही)—ते च प्रापुरु-
दन्वन्तं बुबुधे चादिपुरुषः (रघु० १०।६), ज्योंही वे क्षीरसागर पर पहुंचे त्योंही
आदिपुरुष (विष्णु) जाग गये। ७ अवधारण (ही)—अतीत पन्थानं तव च महिमा
वाङ्मनसयोः (गणरत्न०) हे देव ! यस्तव महिमा स वाङ्मनसयोः पन्थानमति-
क्रान्त एव। कर्मक्षयाच्च निर्वाणम् (व्या० च०), कर्मों के क्षय से ही मोक्ष प्राप्त
होता है। ८ यदि (अगर)—जीवेतु चेच्छसि मूढ हेतुं मे गदतः शृणु (महाभारत),
हे मूढ ! यदि तुम जीना चाहते हो तो मुझ से कारण सुनो। ९ पादपूर्ति—भीमं
पायस्तथैयुश्च (गणरत्न०)।
[२] वा*॥
१ विकल्प—यवैर्वा व्रीहिभिर्वा यजेत (सुप्रसिद्धा श्रुति)। २ अथवा, या—
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा
(हितोप० १।१)। श्वशुरगृहनिवासः स्वर्गतुल्यो नराणां यदि भवति चिवेशी पञ्च वा
षड् दिनानि (समयोचित०)²। ३ समुच्चय—अस्ति ते माता स्मरसि वा तातम्
तरह न देखो), यहां 'पशु' शब्द द्रव्यवाचक नहीं अतः निपात होने से उस की
अव्ययसंज्ञा हो कर सुँब्लुक् हो जाता है। इसीप्रकार लक्ष्मीवाचक 'मा' शब्द की
अव्ययसंज्ञा नहीं होती, निषेधवाचक की ही होती है।
अत्र यदि चादियों का पाठ स्वरादियों में ही होता और उन की निपात-
संज्ञा न की जाती तो 'पशु पश्य' इत्यादि स्थलों की तरह 'पशु पश्य' इत्यादियों
में भी अव्ययसंज्ञा हो जाने से अनिष्ट हो जाता जो अब नहीं होता। सार यह
है कि—स्वरादियों में तो द्रव्यवाचक की भी अव्ययसंज्ञा हो जाती है, यथा—
स्वं पश्य (स्वर्ग को देख)। परन्तु चादियों में द्रव्यवाचक की नहीं होती।
किञ्च—निपाता आद्युदात्ता (फिट्सूत्र ८०) द्वारा आद्युदात्तस्वर भी निपात-
संज्ञा का प्रयोजन है।
१ समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग, समाहार—शब्दों की विस्तृत व्याख्या इस
व्याख्या के द्वन्द्वसमासप्रकरण में चार्थे द्वन्द्व (६८२) सूत्र पर देखें।
२ इस श्लोक का उत्तरार्ध इस प्रकार है—दधि-मधु-घृतलोभान्मासमेकं वसेच्चेद्
भवति विगतलज्जो मानवो मानहीनः। (मालिनी छन्द है)।