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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 538, कुल 633 में से

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पृष्ठ 538

अव्यय-प्रकरणम् ५२३
[४०] सनत् ॥
१. सदा, हमेशा, नित्य—सनत्कुमारः (नित्य ब्रह्मचारी ब्रह्मपुत्र) ।
[४१] सनात् ॥
१. सदा, हमेशा, नित्य—अशत्रुर्जनुषा सनादसि (ऋ० १.१०२.८), हे इन्द्र!
तू जन्म से ही सदा शत्रुरहित है । यह अव्यय वेद में ही देखा जाता है ।
[४२] उपधा ॥
नोट—इस अव्यय का प्रयोग हमें कही नही मिला । श्रीसभापतिशर्मोपाध्याय
सिद्धान्तकौमुदी की 'लक्ष्मी' व्याख्या में इस अव्यय पर टिप्पण करते हुए उपधा धर्मा-
द्यैर्यत्परीक्षणम् इस अमरकोषोक्त वचन की विवृति करने लगते हैं । यह ठीक नहीं ।
क्योंकि अमरकोषोक्त 'उपधा' आवन्त स्त्रीलिङ्ग है अव्यय नहीं ।
[४३] तिरस्*॥
१. टेढ़ा या तिरछा—स तिर्यङ् यस्तिरोऽञ्चति—इत्यमरः । तिरोदृष्ट्या
समीक्षते । २. छिपना—इति व्याहृत्य विबुधान् विश्वयोनिस्तिरोदधे (कुमार० २.६२) ।
३. अनादर—गोभिर्गुरूणां परुषाक्षराभिस्तिरस्कृता यान्ति नरा महत्त्वम् । अलब्ध-
शाणोत्कषणा नृपाणां न जातु मौलौ मणयो वसन्ति (भामिनी० १.७२) ।¹
नोट—छिपना आदि अर्थों में तिरस् का प्रयोग प्रायः धातु के साथ ही पाया
जाता है । तिरोऽन्तर्धौ (१.४.७०) सूत्र द्वारा छिपना अर्थ में तिरस् की गतिसंज्ञा हो
जाती है । गतिसंज्ञा होने से कुगतिप्रादयः (६४६) द्वारा समास हो जाता है । समास
होने के कारण समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् (८८४) से क्त्वा को ल्यप् हो जाता है ।
यथा—तिरोभूय, तिरोधाय इत्यादि । परन्तु कृञ् धातु के योग में 'छिपना' अर्थ होने
पर भी विभाषा कृञि (१.४.७१) सूत्रद्वारा 'तिरस्' की विकल्प से गतिसंज्ञा होती
है । गतिपक्ष में कुगतिप्रादयः (६४६) से समास हो कर क्त्वा को ल्यप् हो जाता है ।
यथा—तिरस्कृत्य । गतिसंज्ञा के अभाव में समास न होने से क्त्वा को ल्यप् नहीं
होता । यथा—तिरः कृत्वा ।²
[४४] अन्तरा*॥
१. अन्दर से—भवद्भिरन्तरा प्रोत्साह्य कोपितो वृषलः (मुद्रा० ३) ; आप
१. वैदिक साहित्य में 'तिरस्' अव्यय का प्रयोग धातुयोग के बिना अकेले भी बहुत
आता है यथा—तिर इव वै देवा मनुष्येभ्यः (शत० ब्रा० ३.१.१.८), देवता
मनुष्यों से छिपे से रहते हैं । स्त्रियस्तिर इवैव पुंसो जिघत्सन्ति (शत० ब्रा० १.६.
२.१२), स्त्रियां पुरुषों को मानो गुप्तरूप से खा जाती हैं । परन्तु लौकिक साहित्य
में इस का प्रयोग प्रायः भू, धा, कृ धातुओं के योग में ही दृष्टिगोचर होता है ।
२. गतिपक्ष में तिरसोऽन्यतरस्याम् (८.३.४२) द्वारा विसर्ग को विकल्प से सकारा-
देश हो जाता है । यथा—तिरस्कृत्य, तिरःकृत्य । परन्तु 'तिरःकृत्वा' में गतिसंज्ञा
न होने से सकारादेश भी नही होता ।