लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'उप' पूर्वक णहँ बन्धने (दिवा० उभय०) धातु से सम्पदादिभ्यः क्विँप् (वा०
५१) वार्त्तिक द्वारा कर्म में क्विँप् प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप, प्रत्ययलक्षणद्वारा
पुनः उसे मान कर नहि-वृति-वृषि० (३६०) सूत्र से पूर्वपद के अन्त्य अच् को दीर्घ
तथा अन्त में प्रादिसमास करने से 'उपानह्' शब्द निष्पन्न होता है । उप = समीपे
नह्यते = बध्यत इत्युपानत्। जूते को उपानह् कहते हैं। अय पादुका पादूरुपानत् स्त्री—
इत्यमरः। उपानह् का बहुधा द्विवचन में प्रयोग होता है। दक्षिण पाद के जूते को
'पूर्वा उपानत्' तथा वाएं पाद के जूते को 'अपरा उपानत्' कहते हैं (व्या० च०)।
विशेषण लगा कर ही इस का स्त्रीत्व प्रकट किया जा सकता है। यथा—इयम्
उपानत्, इमे उपानहौ आदि। उपानह् शब्द के कुछ प्रयोग यथा—उपानद्-गूढ-पादस्य
ननु चर्मावृतेव भूः (हितोप० १.१४४)। श्वा यदि क्रियते राजा स किं नाश्नात्युपानहम्
(हितोप० ३.५८)।
उपानह् + स् (सुँ) । अपृक्त सकार का लोप होकर नहो धः (३५६) द्वारा
पदान्त हकार को धकार¹, जश्त्व से दकार और चर्व से वैकल्पिक तकार करने पर—
'उपानत्, उपानद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
उपानह् + भ्याम् । यहां पदान्त में नहो धः (३५६) से हकार को धकार पुनः
जश्त्व से दकार करने पर 'उपानद्भ्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
उपानह् + सु (सुप्)। नहो धः (३५६) से धकार, जश्त्व से दकार तथा खरि
च (७४) से तकार होकर 'उपानत्सु' सिद्ध होता है। रूपमाला यथा—
प्र० उपानत्-द् उपानहौ उपानहः | प० उपानहः उपानद्भ्याम् उपानद्भ्यः
द्वि० उपानहम् ,, ,, | ष० ,, उपानहोः उपानहाम्
तृ० उपानहा उपानद्भ्याम् उपानद्भिः | स० उपानहि ,, उपानत्सु
च० उपानहे ,, उपानद्भ्यः | सं० हे उपानत्-द्! हे उपानहौ! उपानहः!
धक्तव्य—ग्रन्थकार का नहि-वृति० (३६०) सूत्र यहां लिखना उचित प्रतीत
नहीं होता, इसे नहो धः (३५६) से पूर्व लिखना चाहिये था।
नहि-वृति० (३६०) सूत्र के अन्य उदाहरण यथा—१. वृत्—नीवृत् (पुं०
स्त्री०) =जनपदे, देश । २. वृष्—प्रावृष् (स्त्री०) = वर्षा ऋतु । ३. व्यध्—
हृदयावित् (त्रि०) =हृदय को वींधने वाला । ४. रुच्—नीरुच् (त्रि०) =निरन्तर
चमकने वाला। ५. सह्—ऋतीषह् (त्रि०) =दुःखों या शत्रुओं को सहने वाला।
६. तन्—परीतत् (त्रि०) =चारों ओर फैलने वाला ।
[लघु०] क्विबन्तत्वात् कुत्वेन घः । उष्णिक्, उष्णिग् । उष्णहिौ ।
उष्णिग्भ्याम् ॥
व्याख्या—उष्णिह् (छन्दोविशेष)। 'उष्णिह्' शब्द ऋत्विगद्दधृक्स्रग्दिगुष्णिग्०
१. धकार करने का प्रयोजन 'नहः' आदि में झषस्तथोर्धोऽधः (५४६) की प्रवृत्ति
कराना है अन्यथा 'नहो दः' सूत्र ही बनाते ।
ल० प्र० (३१)