लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
यहा 'वि' मे इकार उच्चारणार्थ है, क्योकि 'वि' अपृक्त नही हो सकता। अपृक्त एका-
ल्प्रत्यय (१७८) द्वारा एकाल् प्रत्यय की ही अपृक्तसञ्ज्ञा होती है। अर्थ -- (अपृक्त-
स्य) अपृक्तसञ्ज्ञक (वे ) वकार का (लोप ) लोप हो जाता है।
ऋत्विज् + व्' यहा वकार अपृक्त है, अत प्रकृतसूत्र से इस का लोप होकर
'ऋत्विज्' ही अवशिष्ट रहता है। अब इस के कृदन्त होने से प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो
कर सुं आदि प्रत्यय उत्पन्न होते है—
'ऋत्विज् + स्' (सुं) यहा हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) सूत्र मे सुं का लोप हो जाता
है। अब 'ऋत्विज्' इस अवस्था मे अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधिसूत्रम्— (३०४) क्विन्प्रत्ययस्य कुः ।८।२।६२॥
क्विन्प्रत्ययो यस्मात् तस्य कवर्गोन्तादेश स्यात् पदान्ते। अस्यासिद्ध-
त्वाच् 'चो कु' (३०६) इति कुत्वम्। ऋत्विक्, ऋत्विग्। ऋत्विजौ।
ऋत्विग्भ्याम् ॥
अर्थ—'क्विन्' प्रत्यय जिस से किया जाये, उस को पदान्त मे कवर्ग अन्ता-
देश हो जाता है। इस सूत्र के असिद्ध होने से चोः कु (३०६) द्वारा कुँत्व हो जाता है।
व्याख्या—क्विन्प्रत्ययस्य ।६।१। कु १।१। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)।
अन्ते ।७।१। (स्को संयोगाद्योरन्ते च से) । समास —क्विन्प्रत्ययो यस्मात् स क्विन्-
प्रत्यय, तस्य=क्विन्प्रत्ययस्य । बहुव्रीहिसमास । अर्थ --(क्विन्प्रत्ययस्य) 'क्विन्'
प्रत्यय जिस से किया गया हो उस के स्थान पर (कु ) कवर्ग आदेश हो जाता है
(पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त मे। अलोन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् के स्थान
पर होना है। अत एव वृत्ति मे 'अन्तादेश.' लिखा है। यहा 'कु' से अणुदित् सवर्णस्य०
(११) द्वारा कवर्ग समझा जाता है--यह सञ्ज्ञाप्रकरण मे उसी सूत्र मे स्पष्ट कर
चुके हैं।
यहा इस सूत्र से केवलमात्र यह अभिप्राय नही समझना चाहिये कि 'पदान्त
मे क्विबन्त शब्द के अन्त को कवर्ग आदेश होता है'। यदि केवल इतना ही अभीष्ट
होता तो 'क्विन् कु' सूत्र रचते, 'प्रत्यय' शब्द साथ मे न जोडते। अत 'प्रत्यय' शब्द
साथ लगाने का यह प्रयोजन है कि 'क्विन्प्रत्ययो यस्मात्' इस प्रकार बहुव्रीहि-समास
मान कर अब अक्विन्नन्तो अर्थात् क्विन्भिन्न अन्यप्रत्ययान्तो को भी कवर्ग अन्तादेश
हो जावे यदि कही उन मे क्विन्प्रत्यय हो चुका हो। यह सब आगे हलन्तस्त्रीलिङ्ग-
प्रकरण मे मूल मे ही स्पष्ट हो जायेगा ।
प्रकृत मे 'ऋत्विज्' यह शब्द क्विबन्त है अत पदान्त मे इस सूत्र से जकार
को कवर्ग-गकार प्राप्त होता है। इस के अतिरिक्त आगे आने वाले चो कुः (३०६)
सूत्र से भी जकार को कवर्ग अर्थात् गकार प्राप्त होता है। पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा
चो कु. (८.२.३०) की दृष्टि मे क्विन्प्रत्ययस्य कुः (८.२ ६२) सूत्र असिद्ध है, अत.