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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 633 में से

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पृष्ठ 417

४०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
विभक्ति परे हो तो। अलोऽन्त्यविधि के अनुसार यह आकार आदेश अन्त्य अल् =
नकार के स्थान पर होता है।
यह आत्व अष्टनो दीर्घात् (६ १ १६८)' सूत्र मे दीर्घग्रहणसामर्थ्य से वैकल्पिक
माना जाता है। क्योकि यदि यह नित्य होता तो सर्वत्र दीर्घ ही के प्राप्त होने से सूत्र
मे 'दीर्घात्' का ग्रहण व्यर्थ हो जाता — उस का ग्रहण न किया जाता। पुनः उस के
ग्रहण से आत्व की वैकल्पिकत्वा स्पष्ट हो जाती है।
यह सूत्र हलादि विभक्तियों मे प्रवृत्त होता है। यहां जस् और शस् तो जकार
और शकार के लुप्त हो जाने से अजादि हैं। अत इस की प्रवृत्ति नही हो सकती।
इस शङ्का की निवृत्ति अग्रिमसूत्र से करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३००) अष्टाभ्य औश् ।७।१।२१॥
कृताकाराद् अष्टन परयोर्जश्शसोर् औश् स्यात्। 'अष्टभ्य' इति
वक्तव्ये कृतात्वनिर्देशो जश्शसोर्विषय आत्वं ज्ञापयति। अष्टौ। अष्टौ।
अष्टाभि । अष्टाभ्यः । अष्टानाम् । अष्टासु । आत्वाऽभावे—अष्ट २ इत्यादि
पञ्चवत्॥
अर्थः—कृताकार अर्थात् आकार आदेश किये हुए 'अष्टन्' शब्द से परे जस्
और शस् को 'औश्' आदेश हो।
व्याख्या—अष्टाभ्य ५।३। जश्शसो ६।२। (जश्शसो शिः से)। औश् १।१।
भ्यस् विभक्ति में अष्टन् शब्द के 'अष्टाभ्य' और 'अष्टभ्य' ये दो रूप बनते हैं। परन्तु
यहां 'अष्टाभ्य' रूप 'अष्टन्' शब्द का नही किन्तु 'अष्टा' शब्द का है। 'अष्टा' शब्द
आकार अन्तादेश किये हुए 'अष्टन्' शब्द का अनुकरण है। बहुवचन का प्रयोग शब्दो
के बाहुल्य की दृष्टि से अथवा मुख्य अष्टन् को बताने के लिये किया गया है। अर्थ—
(अष्टाभ्य) 'अष्टा' शब्द अर्थात् आकार अन्तादेश किये हुए 'अष्टन्' शब्द से परे
(जश्शसो) जस् और शस् के स्थान पर (औश्) औश् आदेश हो जाता है।
औश् आदेश शित् होने के कारण अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) सूत्र द्वारा सम्पूर्ण
जस् और शस् के स्थान पर होता है। ध्यान रहे कि यह सूत्र षड्भ्यो लुक् (१८८)
सूत्र का अपवाद है।
अब यहा प्रश्न उत्पन्न होता है कि अष्टन आ विभक्तौ (२६६) सूत्र से हलादि
विभक्तियों में 'अष्टन्' को आकार अन्तादेश करने का विधान किया गया है, इस से
जस् और शस् के अजादि होने के कारण जबकि 'अष्टन' को आकार आदेश ही नहीं
होना तो पुन उस से परे जस् और शस् को 'औश्' विधान कैसे सम्भव हो सकता है?
इस का उत्तर देते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं कि अष्टभ्य इति वक्तव्ये कृतात्वनिर्देशो
जश्शसोर्विषय आत्वं ज्ञापयति। अर्थात् महामुनि को यदि अष्टन् शब्द से परे केवल
जस् और शस को 'औश्' ही विधान करना अभीष्ट होता तो वे अष्टाभ्य औश् (३००)
१ सूत्र का अर्थ—दीर्घान्त अष्टन् शब्द से परे शस् आदि विभक्ति उदात्त होती है।