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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 633 में से

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पृष्ठ 377

३६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
पदान्त अर्थात् पद के अन्त को आदेश कहने से 'स्रस् + तम् = स्रस्तम्, ध्वस्

  • तम् = ध्वस्तम्' यहां अपदान्त सकार को दकार आदेश नहीं होता। ध्यान रहे कि
    यहां क्रमशः स्रंसुँ ध्वंसुँ धातुओं से 'क्त' प्रत्यय हो कर अनिदितां हल उपधायाः० (३३४)
    सूत्र से अनुनासिक का लोप हुआ है।
    वस्रन्तो में दकारादेश के उदाहरण 'विद्वद्द्भ्याम्' आदि आगे आएंगे। स्रंसुँ,
    ध्वंसुँ दोनों भ्वादिगणीय सेट् आत्मनेपदी धातु हैं। एक का अर्थ 'गिरना' और दूसरे
    का अर्थ ध्वंस होना = 'नाश होना' है। इन के उदाहरण उखास्रस् और पर्णध्वस् शब्द
    हैं। यथा-
    उखास्रस् = बटलोई से गिरने वाला धान्यकण आदि। उखायाः स्रंसत इत्यु-
    खास्रत्। कर्तरि क्विप्, उपपदसमास। इस की रूपमाला यथा-
    प्र० उखास्रत्-द् उखास्रसौ उखास्रसः पं० उखास्रसः उखास्रद्भ्याम् उखास्रद्भ्यः
    द्वि० उखास्रसम् " " ष० " उखास्रसोः उखास्रसाम्
    तृ० उखास्रसा उखास्रद्भ्याम् उखास्रद्भिः स० उखास्रसि " उखास्रत्सु
    च० उखास्रसे " उखास्रद्भ्यः सं० हेउखास्रत्-द् ! उखास्रसौ ! उखास्रसः !
    यहां सर्वत्र पदान्त में वसुस्रंसु० (२६२) से दत्व हो जाता है।
    पर्णध्वस् = पत्तों का नाश करने वाला। पर्णानि ध्वंसत इति पर्णध्वत्। क्विप्,
    उपपदसमास। [सिद्धि और अर्थ विशेषरूप से (८०२) सूत्र पर देखें]।
    रूपमाला यथा-
    प्रथमा पर्णध्वत्-द् पर्णध्वसौ पर्णध्वसः
    द्वितीया पर्णध्वसम् " "
    तृतीया पर्णध्वसा पर्णध्वद्भ्याम् पर्णध्वद्भिः
    चतुर्थी पर्णध्वसे " पर्णध्वद्भ्यः
    पञ्चमी पर्णध्वसः " "
    षष्ठी " पर्णध्वसोः पर्णध्वसाम्
    सप्तमी पर्णध्वसि " पर्णध्वत्सु
    सम्बोधन हे पर्णध्वत्-द् ! हे पर्णध्वसौ ! हे पर्णध्वसः !
    यहां भी सर्वत्र पदान्त में पूर्ववत् दत्व हो जाता है।
    तुरासाह् = इन्द्र। तुरम् = वेगवन्तं साहयति = अभिभवति इति तुराषाट्।
    तुरकर्मोपपदान् षहँ मर्षणे (भ्वा० आ०) इत्यस्माद्धातो विवँप् च (८०२) इति
    क्विप्। उपपदसमास। अन्येषामपि दृश्यते (६ ३ १३६) इति दीर्घ। जो वेग वाले
    को दबा लेता है उसे 'तुरासाह्' कहते हैं। यह इन्द्र का नाम है।
    तुरासाह् + स् (सुँ)। यहां हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सकारलोप हो कर
    हो ढः (२५१) सूत्र द्वारा हकार को ढकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से ढकार को
    डकार करने पर-'तुरासाड्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है-