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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

३५८ भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५८) सम्प्रसारणाच्च ।६।१।१०८॥
सम्प्रसारणादचि पूर्वरूपमेकादेश । वृद्धि —विश्वौह । इत्यादि ॥
अर्थ —सम्प्रसारण से अच् परे होने पर पूर्व+पर के स्थान पर पूर्वरूप हो।
व्याख्या—सम्प्रसारणात् ।५।१। च इत्यव्ययपदम् । अचि ।७।१। (इको यणचि
से) । पूर्वपरयो ।६।२। एक ।१।१। (एक पूर्वपरयो. यह अधिकृत है) । पूर्व ।१।१।
(अमि पूर्व स) । अर्थ —(सम्प्रसारणात्) सम्प्रसारण स (अचि) अच् परे होने पर
(पूर्व-परयो ) पूर्व+पर के स्थान पर (एक ) एक (पूर्व ) पूर्वरूप आदेश हो।
'विश्व ऊ आह् +अस्' यहा 'ऊ' यह सम्प्रसारण है, इस से परे 'आ' यह अच्
वर्त्तमान है, अत पूर्व (ऊ) और पर (आ) के स्थान पर एक पूर्वरूप 'ऊ' हो कर
'विश्व ऊ ह्+अस्' हुआ । अब एत्येधत्यूठ्सु (३४) सूत्र म वकारोत्तर अकार और
ऊठ् के ऊकार के स्थान पर 'औ' वृद्धि हो कर—सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग
करने से 'विश्वौह' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार आगे सर्वत्र भसञ्ज्ञको मे
प्रक्रिया होती है। 'विश्ववाह' शब्द की रूपमाला यथा—
प्रथमा विश्ववाट्-ड विश्ववाहौ विश्ववाह
द्वितीया विश्ववाहम् ,, विश्वौह
तृतीया विश्वौहा विश्ववाड्भ्याम् विश्ववाड्भि.
चतुर्थी विश्वौहे ,, विश्ववाड्भ्य
पञ्चमी विश्वौह ,, ,,
षष्ठी ,, विश्वौहो विश्वौहाम्
सप्तमी विश्वौहि ^,, विश्ववाट्सु ट्सु
सम्बोधन हे विश्ववाट्-ड्! हे विश्ववाहौ! हे विश्ववाह !
इसी प्रकार—१. रथवाह् (रथ हाकने वाला), २. शकटवाह् (छकडा हाकने
वाला), ३ भारवाह् (भार उठाने वाला), ४ उष्ट्रवाह् (ऊंट हाक्ने वाला), ५.
प्रष्ठवाह् (सिखाने के लिये जोते हुए बैल आदि) प्रभृति शब्दो के रूप होते हैं।
अनडुह्=बैल [अन =शकट वहतीत्यनड्वान्]। अनडुह् शब्द पाणिनीयगण-
पाठ मे पञ्च वार प्रयुक्त हुआ है। [१ उर प्रभृति, २ ऋश्य दि ३ कुणालादि, ४.
गर्गादि ५. शरत्प्रभृति] । शाकटायन के उणादिसूत्रो मे इस की सिद्धि नही की गई।
महाराज-भोजप्रणीत सरस्वतीकण्ठाभरण के अनसि वहे क्विब्वे दश्चानस (अ० २
पा० १ सू० ३४६) इस औणादिक-सूत्र द्वारा अनस्‌कर्मोपपद 'वह' धातु से क्विँप्
प्रत्यय, अनस् के सकार को डकारादेश, क्विब्वेलोप, वचिखपि० (५७७) द्वारा सम्प्रं
१. कई लोग—वारिवाह, भूवाह प्रभृति अनकारान्तोपपद शब्दो की कल्पना करते
है, परन्तु ऐसे शब्द प्रामाणिक नही हैं [देखें—(६४१३२) पर भाष्य, प्रदीप,
तत्त्वबोधिनी] ।