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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 633 में से

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पृष्ठ 361

३४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
१ ज्ञातृ = जानने वाला (कुल आदि) | ६ छेत्तृ = काटने वाला (कुल आदि)
२ कर्तृ = करने वाला ( ,, ,, ) | ७ दातृ = देने वाला ( ,, ,, )
३ कथयितृ = कहने वाला ( ,, ,, ) | ८ वक्तृ = बोलने वाला ( ,, ,, )
४ गणयितृ = गिनने वाला ( ,, ,, ) | ९ श्रोतृ = सुनने वाला ( ,, ,, )
५ जेतृ = जीतने वाला ( ,, ,, ) | १० हर्तृ = हरने वाला ( ,, ,, )
ध्यातृ, गन्तृ, रचयितृ, प्रभृति शब्दों की स्वयं कल्पना कर लेनी चाहिये।
नोट—ऋदन्त विशुद्ध नपुंसक शब्दों का संस्कृत-साहित्य में प्रायः अभाव ही
है। सब के सब ऋदन्त शब्द नपुंसक में प्रायः भाषितपुंस्क ही मिलते हैं।
(यहाँ ऋदन्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
०
अब ओकारान्त 'प्रद्यो' शब्द का वर्णन करते हैं—
प्रकृष्टा द्यौर्यस्य यस्मिन् वा तत् = प्रद्यु (दिनम्)। प्रकृष्ट अर्थात् सुन्दर वा
निर्मल आकाश वाले दिन को 'प्रद्यो' कहते हैं। प्रद्यो शब्द में 'ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदि-
कस्य' (२४३) से ह्रस्व करना है, परन्तु ओकार के स्थान पर स्थानकृत आन्तर्य से
अकार और उकार दोनों प्राप्त होते हैं। इन में से कौन सा ह्रस्व किया जाये? इस का
निर्णय अग्रिमसूत्र करता है—
[लघु०] नियम-सूत्रम्— (२५०) एच इग्घ्रस्वादेशे । १।१।४७॥
आदिश्यमानेषु ह्रस्वेषु (मध्ये¹) एच इगेव स्यात् । प्रद्यु । प्रद्युनी ।
प्रद्यूनि । प्रद्युना—इत्यादि ॥
अर्थ—जब ह्रस्व आदेश का विधान हो तब एचों के स्थान पर इक् ही ह्रस्व
हो।
व्याख्या—एचः ६।१। इक् १।१। ह्रस्वादेशे ७।१। समास—ह्रस्वस्य आदेशः
= ह्रस्वादेशः, तस्मिन् = ह्रस्वादेशे, षष्ठीतत्पुरुष। अर्थ—(एचः) एच् के स्थान पर
(ह्रस्वादेशे) ह्रस्व आदेश विधान करने पर (इक्) इक् ह्रस्व होता है। यद्यपि एच्
और इक् दोनों चार-चार हैं, तथापि यहाँ यथासङ्ख्यविधि नहीं होती। यथासङ्ख्य-
विधि अपूर्वविधि में ही प्रवृत्त हुआ करती है, नियमविधि में नहीं। अतः स्थानेऽन्तर-
तम (१७) से यहाँ एकार और ऐकार के स्थान पर इकार ह्रस्व तथा ओकार और
औकार के स्थान पर उकार ह्रस्व हो जायेगा।
ध्यान रहे कि एचों के अपने ह्रस्व नहीं होते, 'एचामपि द्वादश, तेषां ह्रस्वाभा-
वात्' यह पीछे सञ्ज्ञाप्रकरण में कहा जा चुका है। एच् संयुक्तस्वर हैं अर्थात् दो दो
स्वर मिलकर बने हैं। अकार और इकार के संयोग से एकार ऐकार तथा अकार
और उकार के संयोग से ओकार औकार की उत्पत्ति हुई है। इस अवस्था में एचों को
१. मध्य इत्यपपाठः, तद्योगे षष्ठ्या एवौचित्याद्—इति शेखरे नागेशः।