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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 633 में से

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पृष्ठ 353

३३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
प्र० वारि वारिणी वारीणि । प० वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, वारिणो वारिणाम्
तृ० वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः । स० वारिणि ,, वारिषु
च० वारिणे ,, वारिभ्यः । सं० हे वारि¹, वारे¹ वारिणी¹ वारीणि!
नोट—'वारि' शब्द की तरह उच्चारण वाले शब्द संस्कृत-साहित्य में शायद
ही कुछ हों। नपुंसक में इदन्त शब्द प्रायः भाषितपुंस्क ही मिलते हैं। उन का उच्चा-
रण आगे आने वाले 'सुधि' शब्द की तरह होता है।
'दधि' (दही) शब्द के उच्चारण में वारि की अपेक्षा कुछ अन्तर पड़ता है।
प्रथमा और द्वितीया विभक्ति की प्रक्रिया तो वारिशब्द के समान ही होती है। परन्तु
तृतीया आदि अजादि विभक्तियों में निम्नप्रकारेण प्रक्रिया का अन्तर है—
'दधि + आ' (टा) यहां घिसञ्ज्ञा होने से आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा
टा को ना आदेश प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्--(२४६) अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनडुदात्तः ।७।१।७५॥
एषामनङ् स्याट् टादावचि (स चोदात्तः) ॥
अर्थः—तृतीयादि अजादि विभक्ति परे होने पर अस्थि, दधि, सक्थि और
अक्षि—इन चार शब्दों के स्थान पर उदात्त अनङ् आदेश हो।
व्याख्या—अचि ७।१। विभक्तिषु ७।३। (इकोऽचि विभक्तौ से वचनविपरि-
णाम कर के)। तृतीयादिषु ७।३। (तृतीयादिषु भाषित० से)। अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णाम्
६।३। अनङ् १।१। उदात्तः १।१। समासः—अस्थि च दधि च सक्थि च अक्षि च =
अस्थिदधिसक्थ्यक्षीणि, तेषाम् = अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णाम्। प्रकृतिवदनुकरणं भवति—
इति परिभाषयाऽत्राप्यक्षिशब्दस्यानङ्। 'अचि' से तदादिविधि हो कर 'अजादिषु
तृतीयादिषु विभक्तिषु' बन जाता है। अर्थ—(अचि) अजादि (तृतीयादिषु) तृतीया
आदि (विभक्तिषु) विभक्तियों के परे होने पर (अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णाम्) अस्थि, दधि,
सक्थि और अक्षि शब्दों के स्थान पर (अनङ्) अनङ् आदेश हो जाता है और वह
(उदात्तः) उदात्त होता है¹।
अनङ् में ङकार इत्सञ्ज्ञक है। अतः ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा यह अन्त्य इकार
के स्थान पर आदेश होगा। अनङ् में नकारोत्तर अकार उच्चारणार्थ है।
टा, ङे, ङसिँ, ङस्, ओस्, आम्, ङि और ओस् ये आठ तृतीयादि अजादि
विभक्तियां हैं।
'दधि + आ' यहां प्रकृतसूत्र से अन्त्य इकार को अनङ् आदेश होकर—दध्
अन् + आ = दधन् + आ। तत्र अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् (२४७) अल्लोपोऽनः।६।४।१३४॥
अङ्गावयवोऽसर्वनामस्थान-यजादि-स्वादिपरो योऽन्, तस्याकारस्य
लोपः। दध्ना। दध्ने। दध्नः २। दध्नोः २॥
१ लघुकौमुदी में स्वरप्रकरण न होने से हम यहां स्वरविचार प्रस्तुत नहीं कर रहे।