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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 633 में से

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पृष्ठ 351

३३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

‘वारिभ्याम्, हे वारि’ आदि प्रयोगों के सिद्ध हो जाने पर आचार्य के पुनः ‘अचि’ पद
के ग्रहण से न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र की अनित्यता स्पष्ट प्रतीत होती है।
पूर्वपक्षी—‘अचि’ पद के ग्रहण से भला आप कैसे न लुमताङ्गस्य (१६१)
सूत्र की अनित्यता का अनुमान करते हैं ?
उत्तरपक्षी—यदि न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध नित्य होता, तो सम्बुद्धि में
उस का आश्रय कर के नुँम् प्राप्त ही न हो सकता। पुनः उस के निषेध के लिये ‘अचि’
पद की कोई आवश्यकता ही न होती। परन्तु आचार्य का उस के निषेध के लिये यत्न
करना सिद्ध करता है कि आचार्य न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध को नित्य नहीं
मानते।
‘हे वारि’ यहां सम्बुद्धि में न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध के अनित्य होने से
अनित्यपक्ष में ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण हो कर—‘हे वारे’ और नित्यपक्ष में
गुण न होने से—‘हे वारि’ इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं।
द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमावत् प्रक्रिया होती है।
तृतीया के एकवचन ‘वारि+आ’ (टा) में शेषो घ्यसखि (१७०) से घिसञ्ज्ञा
हो इकोऽचि० (७।१।७३) की अपेक्षा पर होने के कारण आङो नाऽस्त्रियाम् (७।३।
१२०) से टा को ना आदेश हो कर नकार को णकार करने से ‘वारिणा’ प्रयोग सिद्ध
होता है।
वारि+भ्याम् = वारिभ्याम्। वारिभिः। हलादि विभक्ति में नुँम् न होगा।
चतुर्थी के एकवचन में ‘वारि+ए’ इस अवस्था में घिसञ्ज्ञा हो कर नुँम् की
अपेक्षा पर होने के कारण घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण प्राप्त होता है। परन्तु यहां
नुँम् करना ही अभीष्ट है। अतः अग्रिम वार्त्तिक से पूर्वविप्रतिषेध का विधान करते हैं—
[लघु०] वा०—(२४) वृद्धधौत्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुँम् पूर्वविप्रतिषेधेन ॥
वारिणे। वारिणः २। वारिणोः २। नुमचिर० (वा० १६) इति नुँट्
—वारीणाम्। वारिणि। हलादौ हरिवत् ॥
अर्थ—वृद्धि, औत्व, तृज्वद्भाव और गुण—इन के साथ विप्रतिषेध होने पर,
पूर्व भी नुँम् प्रवृत्त हो जाता है।
व्याख्या—अचो ञ्णिति (७।२।११५) में प्राप्त वृद्धि, अच्च घे (७।३।११९)


१ यद्यपि इकोऽचि विभक्तौ (७।१।७२) के भाष्य में ‘हे त्रपो!’ और एङ्ह्रस्वात्
सम्बुद्धेः (६।१।६७) के भाष्य में ‘हे त्रपु!’ ऐसे दो प्रयोग पाये जाते हैं, तथापि
हमारा मन प्रत्येक इगन्त नपुंसक के सम्बुद्धि में दो दो—रूप बनाना स्वीकार
नहीं करता । न लुमताङ्गस्य (१।१।६२) निषेध के अनित्य होने से केवल कहीं
कहीं ‘त्रपो!’ आदि पूर्वमहानुभावों के लिखे रूपों में ही गुण का समाधान करना
चाहिये, न कि सर्वत्र विकल्प, नहीं तो फिर अव्यवस्था हो जायगी । कैयट ने
इकोऽचि विभक्तौ (७।१।७२) सूत्र के प्रदीप में इस का उल्लेख भी किया है।