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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 633 में से

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पृष्ठ 175

१६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
मतुप् प्रत्यय हो कर मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्य (१०६२) सूत्र से मकार को
वकार हो जाता है। न धातु = अधातु, नञ्तत्पुरुष । न प्रत्यय = अप्रत्यय,
नञ्तत्पुरुष । यहां प्रत्ययशब्द से प्रत्यय और प्रत्ययान्त दोनों का ग्रहण होता है।
'अर्थवत्' इस नपुंसक विशेषण के कारण 'शब्दस्वरूपम्' इस विशेष्य का अध्याहार
किया जाता है, क्योंकि शब्दानुशासन (शब्द-शास्त्र) प्रस्तुत है। अर्थ — (अधातु)
धातुरहित (अप्रत्यय) प्रत्यय और प्रत्ययान्त रहित (अर्थवत्) अर्थ वाला शब्दस्वरूप
(प्रातिपदिकम्) प्रातिपदिक-सञ्ज्ञक होता है'। अब इस सूत्र की खण्डशः व्याख्या
प्रस्तुत करते हैं—
(१) जिस शब्द का कुछ न कुछ अर्थ हो वह 'प्रातिपदिक' होता है। जैसे
'राम' शब्द का अर्थ दशरथ-पुत्र है अत इस की 'प्रातिपदिक' सञ्ज्ञा हुई। यदि
'अर्थवत्' न कहते तो शब्दगत प्रत्येक अनर्थक वर्ण की भी प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर
सुँ आदियों की उत्पत्ति होने लगती।
(२) परन्तु वह धातु न होना चाहिए। यथा 'अहन्' यह हन् (अदा०)
धातु के लँङ् लकार के प्रथमपुरुष वा मध्यमपुरुष का एकवचन है। यहां धातुमात्र ही
अवशिष्ट रह गया है, प्रत्यय का लोप हो चुका है, अत इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा न
होगी। यदि यहां प्रातिपदिकसञ्ज्ञा कर दी जाती तो नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०)
सूत्र से नकार का लोप हो कर अनिष्ट रूप बन जाता।
(३) वह अर्थवाला शब्द प्रत्यय न होना चाहिये। यथा—'हरिषु, करोषि'
यहां क्रमशः सुप् और सिप् प्रत्यय हुए हैं। यद्यपि ये अर्थवाले हैं तथापि इन की
प्रातिपदिकसञ्ज्ञा न होगी। यदि इन की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो जाये तो इन के आगे
एकवचनमुत्सर्गः करिष्यते (प्रत्येक प्रातिपदिक से प्रथमा का एकवचन स्वभावतः किया
जाता है) इस नियमानुसार 'सुँ' प्रत्यय की उत्पत्ति हो कर अनिष्ट हो जाये।
(४) वह अर्थवाला शब्द प्रत्ययान्त भी न होना चाहिये। यथा—'हरिषु,
करोषि' यहां समुदाय अर्थवाला है पर प्रत्ययान्त होने से उस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा न
१ इस सूत्र पर एक सुन्दर सुभाषित बहुत प्रसिद्ध है। इस में चार प्रश्न किये गये हैं
जिन का उत्तर इस सूत्र का प्रत्येक पद है—
विद्वान् कीदृग्वचो ब्रूते ? को रोगी ? कश्च नास्तिकः ।
कस्याश्चन्द्रं न पश्यन्ति ? सूत्रं तत्पाणिनेर्वद ॥
(१) विद्वान् किस प्रकार का वचन बोलता है ? उत्तर है—अर्थवत् । अर्थात्
विद्वान् अर्थयुक्त (सार्थक) वचन बोलता है। (२) कौन (सदा) रोगी रहता
है ? उत्तर है—अधातु । क्षीणवीर्य पुरुष सदा रोगी रहता है। (३) नास्तिक
कौन है ? उत्तर है—अप्रत्यय । जिसे परलोक आदि पर प्रत्यय अर्थात् विश्वास
नहीं वह नास्तिक है। (४) किस तिथि का चन्द्र दिखाई नहीं देता ? उत्तर
है—प्रातिपदिकम् । प्रतिपदा का चन्द्र दिखाई नहीं देता।