लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५५
भ्—स झणत्कारः । एष झणत्कारः । छ्—स छादयति । एष छादयति ।
भ्—स भाति । एष भाति । ठ्—स ठक्कुरः । एष ठक्कुरः ।
घ्—स घोप. । एष घोपः । थ्—स थूत्करोति । एष थूत्करोति ।
ढ्—स ढकारः । एष ढकारः । च्—स चलति । एष चलति ।
ध्—स धावति । एष धावति । ट्—स टिट्टिभः । एष टिट्टिभः ।
ज्—स जयति । एष जयति । त्—स तरति । एष तरति ।
व्—स वध्नाति । एष वध्नाति । क्—स करोति । एष करोति ।
ग्—स गच्छति । एष गच्छति । प्—स पठति । एष पठति ।
ड्—स ड्डिये । एष ड्डिये । श्—स शेते । एष शेते ।
द्—स ददाति । एष ददाति । ष्—स षण्ढः । एष षण्ढः ।
ख्—स खनति । एष खनति । स्—स सर्पति । एष सर्पति ।
फ्—स फलति । एष फलति ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(११५) सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम् ।६।१।१३०॥
सस् इत्यस्य सोर्लोपः स्यादचि, पादश्चेल्लोपे सत्येव पूर्य्येत । सेमाम-
विड्ढि प्रभृतिम् (ऋ० २.२४ १) । सैष दाशरथी रामः ॥
अर्थः—यदि केवल लोप होने से ही पाद पूरा होता हो तो अच् परे होने पर
तद् शब्द के 'सुं' का लोप हो जाता है ।
व्याख्या—सः ।६।१। (तद् शब्द का प्रथमा के एकवचन में 'सस्' रूप बनता
है, उस का यहां अनुकरण किया गया है । इस के आगे षष्ठी के एकवचन का छन्दोवत्
सूत्राणि भवन्ति इस कथन से छन्दोवत् होने के कारण सुपां सुलुक्० सूत्र से लुक् हो
जाता है) । सुंलोपः ।१।१। (एतत्तदोः सुंलोपः० से) । अचि ।७।१। लोपे ।७।१। चेत्
इत्यव्ययपदम् । एव इत्यप्यव्ययपदम् (स्यश्छन्दसि बहुलम् सूत्र से 'बहुलम्' की अनुवृत्ति
आती है । उस से यहां 'एव' पद का ही ग्रहण किया जाता है) । अर्थः—(सः) 'सस्'
के (सुंलोपः) सुं का लोप हो जाता है (अचि) अच् परे होने पर (चेत्) यदि (लोपे)
लोप होने पर (एव) ही (पाद-पूरणम्) पादपूर्त्ति होती हो तो । श्लोक आदि के
एक विशेष भाग को छन्दःशास्त्र में 'पाद' कहते हैं; उसी का यहां ग्रहण समझना
चाहिये । उदाहरण यथा—
सेमामविङ्ढि प्रभृतिं य ईशिषे ऽया विधेम नवया महा गिरा ।
यथा नो मीढ्वान्त्स्तवते सखा तव वृहस्पते सीषधः सोत नो मतिम् ॥
यह ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के चौबीसवें सूक्त का प्रथम मन्त्र है । यहां
वैदिक जगती छन्द है । जगती छन्द के प्रत्येक पाद में बारह १२ अक्षर होते हैं । सेमाम-
विङ्ढि प्रभृति य ईशिषे यह जगती छन्द का एक पाद है । इस में 'सस् + इमाम्'
इस अवस्था में सकार का लोप हो कर गुण हो जाने से बारह अक्षरों का पाद पूरा
हो जाता है । यदि यहां इस सूत्र से सकार का लोप न करते तो सकार को रुँ, रुँ को