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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 633 में से

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पृष्ठ 167

१५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
(३) 'शम्भुस् + राजत' (शिवजी शोभित होते हैं) यहा भी पूर्ववत् पदान्त
सकार को रुँत्व, रो रि (१११) स रेफलोप तथा ढूलोपे० (११२) से पूर्व अण्(उ)
को दीर्घ करने स - शम्भू राजते' प्रयोग सिद्ध होता है ।
इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा—
१ अहा रम्यम् । २ ना रम्य (नर् + रम्य', नृशब्दस्य सबोधने) । ३. अन्ता-
राष्ट्रिय । ४ सवितू रश्मय । ५ नीरक् । ६. लीढाम् (लिह् + ढाम्; वह चाटे) ।
७ भूपती रक्षति । ८ फेरू रोति । ६ नीरस । १० दाशरथी राम । इत्यादि ।
इस सूत्र मे अण् प्रत्याहार पीछे (११) सूत्र पर कह अनुसार पूर्व णकार
(अ इ उ ण्)स ही लिया जायेगा, इस स 'तृढ' (मारा गया), 'वृढ' (तैयार, उद्यत)
यहा पूर्व ऋकार का दीर्घ न होगा । तथाहि—'तृद्+ढ, वृद्+ढ' यहा ढो ढे लोप.
(५५०] सूत्र स ढकार का लाप हो कर—'तृढ, वृढ' प्रयोग सिद्ध होते हैं।
ढलोप का उदाहरण मूल म नही दिया गया, इस मे—लिह् + ढ = लि +
ढ = 'लीढ' प्रभृति उदाहरण हैं ।
यहा 'पूर्वस्य' ग्रहण का प्रयोजन सिद्धान्त-कौमुदी मे देखना चाहिये ।
नोट— पुना रमते' मे 'पुनस् + रमते' यह छेद अशुद्ध है, क्योकि 'पुनर्'—यह
रेफान्त अव्यय है, सकारान्त नहीं । वैसा होने पर 'मनोरथ.' की तरह 'पुनो रमते'
बन जाता । हरिम् + रम्य, शम्भुस् + राजत' ये छेद तो शुद्ध है, लकारपूर्व न होने
स इन म हशि च (१०७) प्राप्त नही।
[लघु०] 'मनस् + रथ' इत्यत्र रुँत्वे कृते 'हशि च' (१०७) इत्युत्वे 'रो रि'
(१११) इति लोपे च प्राप्ते—
अर्थ - 'मनस् + रथ' यहा ससजुषो रु. से सकार को रुँ किया तो हशि च से
उत्व तथा रो रि म रेफ का लोप दोनों प्राप्त हुए [इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है]।
व्याख्या - यहा उत्व और रेफ-लोप युगपत् (इकट्ठे) प्राप्त होते है । इन
दोनो मे से कौन-सा हो ? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अग्रिम-सूत्र लिखते हैं—
[लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(११३) विप्रतिषेधे परं कार्यम् ।१।४।२।।
तुल्यबलविरोघे परं कार्यं स्यात् । इति लोपे प्राप्ते 'पूर्वत्राऽसिद्धम्'
(३१) इति 'रो रि' (१११) इत्यस्यासिद्धत्वादुत्त्वमेव । मनोरथ ॥
अर्थ - तुल्यबल वाला का विरोध होने पर परकार्य होता है ।
व्याख्या—विप्रतिषेधे ।७।१। परम्।१।१। कार्यम् ।१।१। अर्थ —(विप्रतिषेधे)
विप्रतिषेध होने पर (परम्) पर (कार्यम्) कार्य होता है। अन्यत्रान्यत्रलब्धाव-
काशयोरकत्र प्राप्तिस्तुल्यबलविरोध. । तुल्यबल वाले दो कार्यों के विरोध को विप्रति-
षेध कहते हैं । पृथक्-पृथक् स्थानो (जहा वे परस्पर प्राप्त नही हो सकते) पर चरि-
तार्थ होने वाले सूत्र तुल्यबल वाले कहलाते हैं। इन तुल्यबल वालो का यदि विरोध हो