लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'शिवर् + अर्च्य' यहां अप्लुत अत् से परे रुँ है और उस से परे 'अर्च्य' का
अकार अलुप्त अत् विद्यमान है अत रुँ के स्थान पर 'उ' हो—शिव उ + अर्च्य ।
पुन आद् गुण (२७) से अ + उ मिल कर 'ओ' गुण हुआ तो—शिवो + अर्च्य । अब
एड पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप करने पर— 'शिवोऽर्च्य' प्रयोग सिद्ध होता है ।
यद्यपि ससजुषो रुँ (८ २ ६६) सूत्र के असिद्ध होने से उत्वविधि (६ १.१०६)
के प्रति रुत्वविधि असिद्ध होनी चाहिये थी तथापि वचनसामर्थ्य से असिद्ध नहीं होती;
क्योकि यदि रुँत्वविधि को असिद्ध मानें तो सारे व्याकरण में रुँ कही नही मिल सकेगा,
अत इस व्याकरण म उत्वोपयोगी रुँत्व करने वाला यही एक सूत्र है ।
ध्यान रहे कि रुँ के स्थान पर उत नही होना, किन्तु उकार की इत् सञ्ज्ञा
हो लोप हो जाने पर शेष बचे र् के स्थान पर ही उत् होना है । सूत्र मे रुँ के कथन
का यह तात्पर्य है कि रुँ के र् को ही उत्व हो अन्य र् को न हो । यथा—प्रातर् +
अत्र = प्रातरत्र, धातर् + अत्र = धातरात्र, लङि—अजागर् + अत्र = अजागरत्र । इत्यादि
मे रुँ के रेफ के न होने से उत्व नही होता ।
यहा 'अप्लुत' ग्रहण का प्रयोजन बालको के लिए अनुपयोगी जान नही लिखते ।
इस का सिद्धान्त-कौमुदी मे सविस्तर विचार किया गया है वही देखें ।
इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा—
१ बालोऽत्र । २ सोऽपि । ३ पुरुषोऽधुना । ४ मानुषोऽद्य । ५ शुद्धोऽहम् । ६
छात्रोऽयम् । ७ हस्तोऽस्य । ८ रामोऽस्मि । ६ नूतनोऽभ्यागत । १० ग्रामोऽम्यर्ण ।
११ राज्ञोऽभिषेक । १२ सोऽपवाद । १३ ततोऽन्यथा । १४ समाचारोऽन्तिम । १५
मोऽनुस्वार । १६ ज्येष्ठोऽनुज । १७ शान्तोऽनल । १८ वचनोऽनुनासिक । १६
सुबोधोऽसि । २० न्यूनोऽसि ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०७) हशि च ।६।१।११०॥
तथा । शिवो वन्द्य ॥
अर्थ —हश् परे हो तो अप्लुत अत् से परे रुँ के स्थान पर उत् आदेश हो ।
व्याख्या—अप्लुतात् ।५।१। अत ।५।१। रो ।६।१। (अतो रोरप्लुतादप्लुते से) ।
उत् ।१।१। (ऋत उत् से) । हशि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थ —(अप्लुतात्) अप्लुत
(अत ) अत् से परे (रो ) रुँ के स्थान पर (उत्) ह्रस्व उकार आदेश होता है (हशि)
हश् परे हो तो । उदाहरण यथा—
'शिवस् + वन्द्य' (शिव जी वन्दनीय हैं) यहा ससजुषो रुँ (१०५) सूत्र से सकार
को रुँ हो, उकार की इत्सञ्ज्ञा तथा लोप करने से— 'शिवर् + वन्द्य' बना । अब
वकार = हश् परे रहते अप्लुत अत् से परे रेफ को उकार आदेश हो— 'शिव उ +
वन्द्य' हुआ । पुन आद् गुण' (२७) से गुण एकादेश किया तो 'शिवो वन्द्य' प्रयोग
सिद्ध हुआ । इस सूत्र के सम्पूर्ण उदाहरण यथा—