लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ६१
देश तक परन्तु अलवर देश को छोड़ कर मेघ बरसा)। यहां मर्यादा अर्थ होने से
'आ' ङित् अर्थात् 'आङ्' है अतः प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न होने के कारण प्रकृतिभाव नहीं होता,
अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो जाता है।
(४) अभिविधौ यथा—आ+अलवराद्=आलवराद् वृष्टो मेघः (अलवर
देश तक अर्थात् अलवर देश में भी मेघ बरसा)। यहां अभिविधि अर्थ होने से 'आ'
ङित् अर्थात् 'आङ्' है अतः प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न होने के कारण प्रकृतिभाव नहीं होता;
सवर्णदीर्घ हो जाता है।
अब 'आ' के उदाहरण--
(१) वाक्ये यथा—आ एवं नु मन्यसे (अब तू ऐसा मानता है, अर्थात् पहले
तू ऐसा नहीं मानता था अब मानने लगा है)। यहां 'आ' के अङित् होने से प्रगृह्य-संज्ञा
हो कर प्रकृतिभाव हो जाता है। वृद्धिरेचि (३३) सूत्र से वृद्धि एकादेश नहीं होता।
(२) स्मरणे यथा—आ एवं किल तत् (हां वह ऐसा ही है)। यहां 'आ' के
अङित् होने से प्रगृह्य-संज्ञा हो कर प्रकृतिभाव हो जाता है। वृद्धिरेचि (३३) सूत्र
प्रवृत्त नहीं होता।
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५६) ओत् ।१।१।१५॥
ओदन्तो निपातः प्रगृह्यः स्यात्। अहो ईशाः॥
अर्थः—ओकार अन्त वाला निपात प्रगृह्य-सञ्ज्ञक हो।
व्याख्या - ओत् ।१।१। निपातः ।१।१। (निपात एकाजनाङ् से)। प्रगृह्यः
।१।१। (ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् से)। 'ओत्' यह 'निपातः' पद का विशेषण है, अतः
इस से तदन्त-विधि होती है। अर्थः- (ओत् = ओदन्तः) ओदन्त (निपातः) निपात
(प्रगृह्यः) प्रगृह्य-सञ्ज्ञक होता है। यथा- अहो ईशाः (अहो ! ये स्वामी हैं)। यहां
अद्रव्यवाची होने से चादयोऽसत्त्वे (५३) द्वारा 'अहो' निपात-सञ्ज्ञक है; इस की इस
सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जाती है। प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण एचो-
ऽयवायावः (२२) द्वारा प्राप्त अवादेश नहीं होता। इसीप्रकार अथो, नो, आहो,
उताहो आदि अन्य ओदन्त निपातों में भी समझ लेना चाहिये। ध्यान रहे कि यहां
एक अच् रूप निपात न होने से पूर्वसूत्र द्वारा प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न हो सकती थी अतः यह
सूत्र बनाया गया है।
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५७) सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावना ॥१।१।१६॥
सम्बुद्धि-निमित्तक ओकारो वा प्रगृह्योऽवैदिक इतौ परे। विष्णो इति।
विष्ण इति। विष्णविति ॥
छोड़ कर उस तक मेघ बरसा। अभिविधि में इस अवधि का ग्रहण होने से यह
तात्पर्य होगा कि अलवर देश सहित उस तक मेघ बरसा। अन्य उदाहरण यथा—
आ पाटलिपुत्राद् वृष्टो मेघः, आ कुमारं यशः पाणिनेः, ओदकान्तात् प्रियोऽनु-
गन्तव्यः। यहां द्वितीय उदाहरण में अभिविधि तथा तृतीय में मर्यादा अर्थ है।