क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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२६२ क्षेमकुतूहलम्
नेत्रशक्तिवर्द्धकोमन्त्रः
शर्यातिं च सुकन्यां च च्यवनं शक्रमश्विनौ।
भोजनान्ते स्मरेद्यस्तु चक्षुस्तस्य न हीयते ॥११४॥
चक्षुष्यमन्त्र
शर्याति, सुकन्या, च्यवन, इन्द्र, अश्विनौ, (उभयकुमार) को स्मरण करने से नेत्र
(दृष्टि) शक्ति वृद्धि होती है॥११४॥
भोजनस्य परिपाकाय मन्त्रः
अगस्त्यं कुम्भकर्णं च शनिं च वडवानलम्।
आहारपरिणामार्थं संस्मरेच्च वृकोदरम् ॥११५॥
भोजन सुपरिपाक विधान
अगस्त्य मुनि, कुम्भकर्ण, (रावणभ्राता) शनैश्चर, बडवानल एवं वृकोदर
(भीम) का आहार का परिणाम (पाचन) हेतु भोजन के अन्त में स्मरण करना
चाहिए॥११५॥
विष्णुः समस्तेन्द्रियदेहदेही प्रधानभूतो भगवान् यथैकः।
सत्येन तेनान्नमशेषमेतदारोग्यमन्तं परिणाममेतु ॥११६॥
समस्त इन्द्रियाँ शरीर की आत्मा एक ही प्रधानभूत भगवान् विष्णु है- इसे सत्य
(स्मरण करने) के कारण आरोग्य प्राप्ति- निर्व्याधि अवस्था-शरीर को हो सके, तदर्थ
(भगवान विष्णु) का स्मरण किया जाना हितकर है॥११६॥
इत्यादिबहुवाक्यानि भोजनान्तेषु यः पठेत्।
स भवेद्वल्लभो राज्ञां चायुरवाप्नुयात् ॥११७॥
इस प्रकार (पूर्वोक्त) सदवाक्यों- मन्त्रों-स्मरणीय वचनों आदि का जो व्यक्ति
पाठन करता है, वह भोजनार्थी एवं सदोच्चारण के कारण, राजवल्लभ (राजाओं का
प्रिय) हो जाता है, तथा राजा स्वयं दीर्घायुष्य का लाभ प्राप्त करता है (राजा
आयुरवाऽप्नुयात्)॥११७॥
अथ ताम्बूलभक्षणविधानम्
ताम्बूलं स्वर्णवर्णं क्रमुकफलयुतं साग्रमग्र्यं गृहीतं
कर्पूरैणाण्डजाभ्यां कृतखदिरवटीसौरभेणातिपूर्णम्।
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चूर्णं ग्रावानुजातं शशधरकिरणप्रोज्ज्वलं तेन सार्कं
दत्त्वा विप्राय पूर्वं तदनु नरपतिर्भक्षयेदामदत्तम् ॥११८॥
ताम्बूल भक्षण
स्वर्ण वर्णिय अग्रभाग समान (सहित) ताम्बूल, में पूगखण्ड (क्रमुक), कर्पूर
एवं कस्तूरी मिश्रित सुगन्धित खदिर वटी (कत्था) तथा चन्द्र किरण समान चूर्ण (चूना)
रखकर सर्वप्रथम राजा ब्राह्मण (द्विपु) को प्रदान करे, फिर विश्वस्त व्यक्ति (आप्तदत्तम्)
द्वारा प्राप्त, राजा से स्वयं (नरपतिर्भक्षयेत्) चर्वण (भक्षण) करना चाहिए॥११८॥
अथाजीर्णोपशमनद्रव्याणि
विरुद्धाध्यशनात्यर्थचिन्ताविण्मूत्रधारणात् ।
असात्म्यभोजनाद्द्वेषात्क्रोधात्स्वप्नविपर्ययात् ॥११९॥
इत्यादिकारणैर्जन्तोर्यदा त्वन्नं न पच्यते।
तदाऽन्नपरिपाकार्थमेतद्द्रव्यान्तरं भजेत् ॥१२०॥
पिष्टान्ने सलिलं प्रियालफलजे पथ्या हिता मांसजे
क्षीरे गव्यभवे च तक्रमुचितं मोचाफलं सर्पिषि।
नारङ्गे गुडभक्षणं च कथितं मत्स्योद्भवे काञ्जिकं
गोधूमेऽपि च कर्कटी हितेतरा शेषाणि बुद्ध्या भजेत् ॥१२१॥
अजीर्ण निवारण विधानम्
क. अजीर्ण के हेतु आहार-विहार
१. विरुद्ध भोजन २. अध्यशन ३. अतिचिन्ता
४. असात्म्य भोजन ५. द्वेष ६. क्रोध
७. निद्रा विपर्यय ८. अन्य कारण
ख. अजीर्ण का शमन
१. पिष्टान्न : जल २. मांस : हरीतकी ३. गोदुग्ध : तक्र
४. घृत : कदली ५. नारंग : गुड़ ६. मत्स्य : कर्कटी
अन्य द्रव्यों (आहार-विहार) से उत्पन्न अजीर्ण की स्थिति में (शेषाणि बुद्ध्या
भजेत) स्वबुद्धि/ आवश्यकतानुसार उपयुक्त पाचक द्रव्यों/ उपायों का अनुसरण/
प्रयोग हितकर होता है।
२६४ क्षेमकुतूहलम्
ग्रन्थकर्तृवंशवर्णनम्
वंशोऽयं किमु वर्ण्यते सुविमलो नानागुणैरुन्नतो
यत्रैकेन विभीषणश्च भिषजा नीरोगतामाप्तवान्।
श्रीरामादपरेण या सुविदिता लब्धा ह्यकोलापूरी
ग्रामा द्वादश एव चान्यविदुषा लब्धा हि दिल्लिश्वरात्॥१२२॥
ग्रन्थ कर्त्ता-वंश वृत्त
अनेक गुणों से उन्नत तथा सुविमल ग्रन्थकार के वंश का क्या वर्णन किया जा
सकती है अर्थात् उनका वंश अत्युत्तम है। जिस वंश के एक वैद्य (भिषक्) विभीषण
को रोग से विमुक्ति की थी (निरोगता)। एक अन्य चिकित्सक ने भी राम के द्वारा
सुप्रसिद्ध अकोलापुरी को प्राप्त किया था। उसी वंश के अन्य विद्वान (विदुषा) ने दिल्ली
नरेश (दिल्ली खर) से बारह ग्राम (ग्रामा द्वादश) प्राप्त किये थे॥१२२॥
पुत्राः क्षेमभिषग्वरस्य षडिमे नानागुणैरुन्नता
गोपालो शिवपालमाधववरौ नारायणस्त्वद्भुतः।
रामो लक्ष्मणसंज्ञकः सुविदिताः संवत्सराणां शत
जीव्यासुः पृथीतलेऽतिसुखिनो नित्योत्सवैरुत्सुकाः॥१२३॥
भिषखर (चिकित्साकों) में श्रेष्ठ-उत्तम गुणों से युक्त छह (षडिमे) पुत्र हुए-
गोपाल, शिवपाल, माधववर, अद्भुत सम्पन्न नारायण, राम तथा लक्ष्मण। यह समस्त
पृथ्वी पर अतिसुखी, नित्यप्रति अनेक उत्सवों से प्रसन्न (नित्योत्सवैरुत्सुकाः) रह कर
ख्यातनामा थे॥१२३॥
प्रजाक्षेमकृता क्षेमशर्मणा वंशपद्धतिः।
स्वकीया स्वयमावर्त्य वर्णविन्यासशालिना॥१२४॥
वर्णों को यथास्थान चुनावपूर्व स्थापित-कुशल (कवि) वर्णविन्याशाली-क्षेम शर्मा
वे स्वयं स्ववंश परम्परा का परिचर्या, प्रजाक्षेम (प्रजाओं-जनमानस के कल्याणार्थ)
प्रस्तुत था॥१२४॥
परदोषकथास्वनादरा बहवः सन्त्यवनौ सुसज्जनाः।
इति चेतसि सन्निधाय यत्क्रमेवाद्रियतां तदार्यकैः॥१२५॥
इस पृथ्वी पर बहुत से सज्जन (बहवः सत्यवनौ सुसज्जनाः) अन्य व्यक्तियों के
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दोषों पर ध्यान नहीं देते (परदोषकथास्वनादरा), इस धारणा को मन में रखकर (चेतसि
सन्निधाय), जो कुछ मैंने लेखन ग्रन्थ रूप में किया है, इसका सम्मान आर्यजन (यत्कृत
मेवाद्रियतां तदार्यकैः:) को करना चाहिए, ऐसी आशा (विश्वासपूर्वक) है॥१२५॥
नन्दन्तां नीतिभाजः सकलवसुमतीजातयः पान्तु विश्वं
दुर्हत्ता यान्तु नाशं भवतु वसुमती सस्यसंपन्नदेशा।
नीरं यच्छन्तु मेघाः कलयतु सुकविः काव्यकौशल्यलीला-
मव्यादव्याजभाजं परिहतदुरितं क्षेमशर्माणमीशः॥१२६॥
नीति का पालन कर्त्ता (नीतिभाज नन्दताम्), समस्त पृथ्वी पर निवास करने वाले
संसार का पालन करें (सकलवसुमतीजातयः पान्तु विश्व), दुर्जन नष्ट हो जायें (दुर्हत्ता
यान्तु नाशं भवतु वसुमती सस्यसंपन्नदेशा), मेघ जल की वर्षा करें (नीरं यच्छन्तु मेघाः
कलयतु), सुकवि काला कुशलता की लीला प्रगट करें (सुकविः काव्यकौशल्यलीलाम-
व्याजभांज परिहत दुरितं) तथा भगवान् शिव शंकर का निष्कयोजन (निष्कास) भजन
कर्त्ता निष्पाप क्षेम शर्मा (क्षेमशर्माणमीशः) की सुरक्षा प्रदान करें।
बाणाकाशसुते नादे (१६०५) वत्सरे विक्रमाङ्किते।
ऊर्जे शुक्लत्रयोदश्यां ग्रन्थः पूर्णोऽयमैन्दवे॥१२७॥
इति श्रीनरवैद्यमन्थात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
गोरसपानकादिप्रशंसनो नाम द्वादशोत्सवः॥१२॥
विक्रम संवत्सर सौलह सो पाँच (१६०५) कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी सोमवार के
दिन यह ग्रन्थ ने पूर्णता को प्राप्त किया॥१२७॥
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का गोरस-पानक निर्माण-
वर्णननामक बारहवां उत्सव समाप्त॥
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