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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

२४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
नवम-प्रत्यक्षलक्षणा-खण्डनम्
शब्दानुमानोपमानजप्रमितिव्यतिरिक्तत्वे सति प्रमितित्वं प्रत्यक्षलक्षण-
मभिधाय यः कोऽपि न त्रपते, स प्रष्टव्यः—किं प्रत्येकमिदं लक्षणम्, उत मिलितम् ?
नाद्यः; प्रत्येकं व्यभिचारात् । द्वितीये किं मिलितानां निषेधः, उत निषेधानां
मिलितत्वम् ? नाद्यः; प्रत्येकमेव व्यभिचारात् । न हि प्रत्येकमनुमित्यादौ
मिलिततद्रूपसम्भवः । नापि द्वितीयः; मिलितास्वनुमित्यादिषु निषेधमेलकसम्भवे-
ऽपि प्रत्यक्षत्वानभ्युपगमात् ।
न बह्वाश्रयाणामुक्तनिषेधानां लक्षणत्वम्, अपि त्वेकाश्रयाणामिति चेन्न ।
समुदायिभेदेऽपि समुदायस्यानुमित्यादिवत् एकतोपचारबीजाविशेषाभ्युपगम इति
हि वक्ष्यते ।
नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन
‘शब्दज, अनुमानज और उपमानज प्रमितियों से भिन्न जो प्रमिति हो, वह प्रत्यक्ष
है’ ऐसा लक्षण कहकर जो लज्जित नहीं होते, उनसे पूछना चाहिए कि क्या इनमें
प्रत्येक लक्षण है या मिलित ?
इनमें प्रत्येक अर्थात् ‘शब्दजप्रमितिव्यतिरिक्तप्रमितित्वम्’ आदि तो लक्षण नहीं
कह सकते, कारण शब्दजप्रमितिव्यतिरिक्त प्रमितित्व अनुमिति में अतिव्याप्त है । इसी
तरह अन्यत्र भी लक्षणों की अतिव्याप्ति जाननी चाहिए । यदि मिलित लक्षण कहें, तो
‘शब्दज तथा अनुमानज तथा उपमानज प्रतीतिसमुदाय से व्यतिरिक्त प्रमितित्व’ लक्षण
है या ‘शब्दज प्रमिति का जो भेद तथा अनुमानज प्रमिति का जो भेद तथा उपमानज
प्रमिति का जो भेद—एतत् भेदत्रयविशिष्ट प्रमितित्व है ? इनमें प्रथम पक्ष में समुदाय
का भेद प्रत्येक में होने से प्रत्येक में अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि प्रत्येक अनुमिति
आदि समुदायरूप नहीं है । द्वितीय कल्प में अनुमित्यादि त्रयसमुदाय में प्रत्येक अनुमिति
आदि का भेदत्रय होने से अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—‘शब्दादि प्रतीतियों के भेदत्रय से युक्त जो एक प्रतीति है, वह प्रत्यक्ष
है ।’ अनुमित्यादि त्रयसमुदाय में एकत्व नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं । खंडन—
यद्यपि समुदाय के एकदेश अनुमित्यादि अनेक हैं, किन्तु समुदाय एक ही है, अर्थात्
प्रत्येक अनुमिति आदि में गुणरूप एकत्व न होने पर भी जैसे औपचारिक एकत्व-व्यवहार
होता है, वैसे ही अनुमित्यादि समुदाय में भी उपचार से एकत्व-व्यवहार हो सकता है ।
कारण उपचार का बीज परोक्षत्वरूप एक धर्म अनुमित्यादित्रय में भी विद्यमान है ।

परिच्छेद ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २४१
असमुदायत्वे सतीत्यपि विवक्षितमिति चेन्न । समुदायत्वविशिष्ट एवांशतः
स्वात्मनि वृत्तिविरोधभयेन असमुदायत्वस्यैष्टव्यत्वेन तादृशि प्रसङ्गो दुर्वारः ।
ज्ञानस्यैवं विवक्षितमिति चेन्न । विशिष्टस्यापि ज्ञानस्य ज्ञानत्वादेव ।
एकेति च किमाश्रयव्यक्त्यभेदो विवक्षितः, उताभिन्नजातीयता, उतैकोपा-
धिकता, उतैकसङ्ख्यायोगिता, उत द्व्यादिसङ्ख्यायोगाभावः ?
आद्ये तद्विशिष्टस्याव्यापकतादोषः, व्यक्त्यात्मनोऽभेदस्य व्यावृत्तत्वात्
धर्मिणा च लक्षणविशेषणेऽलक्ष्यधर्मत्वं धर्मस्य स्यात्, स्वस्यैव स्वधर्मत्वानुपपत्तेः ।
आश्रयाभेदस्योपलक्षणत्वे प्रागुक्तदोषः ।
समर्थन—उक्त लक्षण में समुदाय से भिन्नत्व का भी निवेश है, अतः अनुमित्यादि-
त्रय के समुदाय में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—यदि कहें कि समुदायत्वविशिष्ट
में भी समुदायत्व मानेंगे, तो विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषणवृत्ति अवश्य होने से अंशतः
आत्माश्रय हो जायगा । अतः समुदायत्वविशिष्ट भी असमुदाय होने से पुनः अनुमित्यादि
समुदाय में अतिव्याप्ति ही है ।
समर्थन—उक्त लक्षण में 'प्रमितित्व' का भी निवेश करेंगे । एवञ्च समुदाय प्रमिति
न होने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—समुदायत्वविशिष्ट अनुमित्यादि प्रमिति
है, अतः समुदाय भी प्रमिति ही है ।
किञ्च—लक्षण में निविष्ट 'एक' शब्द से लक्षणाश्रय लक्ष्य व्यक्ति का अभेद
अभिप्रेत है या एक ( अभिन्न ) जाति का आश्रयत्व अथवा एक उपाधि का आश्रयत्व
या एकत्वसंख्या का योग या द्वित्व आदि संख्या का योगाभाव ?
प्रथम कल्प में एक ही प्रत्यक्ष व्यक्ति का संग्रह हो सकने से लक्षण व्यक्त्यन्तर में
अव्याप्त हो जायगा । यदि 'एकलक्ष्याश्रयत्व' लक्षण में विशेषण दें, तो लक्षण लक्ष्य का
धर्म न हो सकेगा । कारण जैसे स्व का धर्म स्व नहीं होता, वैसे ही स्वविशिष्ट भी
स्व का धर्म नहीं हो सकता । यदि कहें कि लक्ष्य व्यक्ति का अभेद लक्षण में विशेषण
नहीं, किन्तु उपलक्षण है, अतः उक्त दोष नहीं; तो उपलक्षण व्यावर्य से बहिर्भूत होने
के कारण तद्व्यावृत्त अभावत्रयमात्र ही लक्षण होगा, जो अनुमित्यादि में भी रहेगा ।
एवञ्च पूर्वोक्त दोष तदवस्थ ही है ।
३१

२४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
द्वितीये तदेवाभिन्नजातीयत्वं लक्षणमस्तु, अवश्यं तया प्राथम्येन प्रतीय-
मानत्वात् । न तृतीयः ; परोक्षप्रमितित्वस्यानुमित्यादिषु मिलितास्वपि भावात् ।
नापि चतुर्थः ; वैशेषिकपक्षे गुणतया तदभावात् , भावे वाऽनुमित्यादित्रय-
वृत्तीनां त्रयाणामप्यभावानामेकत्वसङ्ख्यासामानाधिकरण्यसम्भवात्, मिलिताना-
मप्येकसमुदायापेक्षया तथात्वात् ।
नापि पञ्चमः ; वैशेषिकमतानुसारेण अनुमित्यादित्रयेऽपि तदभावस्य तुल्य-
त्वात् । अतदनुसारे प्रत्यक्षव्यक्तिष्वपि द्वयादिसङ्ख्यायोगात् ।
तथापि नैकस्यां प्रत्यक्षव्यक्तौ द्वयादिपरिसमाप्तिः, द्वयादिसङ्ख्यापरि-
समाप्यभावश्च तदभावशब्देन विवक्षित इति चेन्न । का हि परिसमाप्तिर्या
एकस्यां व्यक्तौ नास्तीत्युच्यते ?
तत्रैव वृत्तिर्द्वयादेः परिसमाप्तिः, सैकस्यां व्यक्तौ नास्तीति चेन्न ।
द्वितीय या तृतीय कल्प में यदि वह जाति या उपाधि प्रत्यक्षत्व या अर्थजत्व ही
हो, तो उन्हींको लक्षण मान लें; प्रकृत लक्षण व्यर्थ है । कारण, उक्त लक्षण में विशेषण
होने से वह जाति या उपाधि अवश्य ज्ञेय है, साथ ही उन्हें लक्षण मानने में लाघव
भी है । यदि यत्किञ्चित् एक जाति या एक उपाधि का ग्रहण हो, तो परोक्षत्वरूप
जाति या उपाधि अनुमित्यादि त्रय में भी है । अतः अनुमित्यादि समुदाय में अतिव्याप्ति
हो जायगी ।
चतुर्थ कल्प में वैशेषिक के मत के अनुसार एकत्वसंख्या गुण होने से वह प्रत्यक्ष
( रूप गुण ) में नहीं रह सकती, अतः असम्भव हो जायगा । अन्य मतों के अनुसार
अनुमित्यादित्रय में उक्त अभावत्रय भी है तथा समुदाय की अपेक्षा एकत्वसंख्या भी
है; अतः अनुमित्यादि-समुदाय में अतिव्याप्ति हो जायगी ।
पंचम कल्प में वैशेषिक के मत के अनुसार अनुमित्यादित्रय में भी द्वित्वादि
संख्या का अभाव होने से अतिव्याप्ति हो जायगी तथा अन्य मत के अनुसार प्रत्यक्ष में
भी ( 'एक, दो, तीन प्रत्यक्ष' इस प्रकार ) द्वयादि संख्या रहने से असम्भव हो जायगा ।
समर्थन—तब भी एक प्रत्यक्ष व्यक्ति में द्वित्व आदि सङ्ख्या की परिसमाप्ति
( पर्याप्ति ) नहीं है और द्वयादि की परिसमाप्ति का अभाव ही तदभाव पद से
विवक्षित है, अतः असम्भव नहीं होगा। खंडन—द्वित्वादि संख्या की परिसमाप्ति क्या
है, जो एक व्यक्ति में नहीं है ?
समर्थन—केवल उसीमें वृत्तित्व द्वित्व की परिसमाप्ति है । वह एक ही व्यक्ति
में नहीं है, कारण द्वित्व दो व्यक्तियों में रहता है । खंडन—यदि तत्रैववृत्तित्व

परिच्छेद १ ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २४३
एवमेकत्वस्यापि न क्वचित्परिसमाप्तिः स्यात् । न हि तस्य तत्रैव वृत्तिः ; अन्य-
स्यैकत्वाभावप्रसङ्गात् । अत एकत्वसङ्ख्यावत्यामेव व्यक्तौ द्व्यादिपरिसमाप्ति-
रित्यविशेष एव ।
एकव्यक्तिगतैकत्वसङ्ख्याव्यक्तिर्नान्यत्रेति चेन्न । सत्ताव्यक्तेरप्येवम्भाव-
प्रसङ्गात्, अननुगतत्वापत्तेश्च ।
सत्तैकैव जातिरूपा, एकत्वं तु प्रतिव्यक्ति भिन्नं गुणपदार्थ इति चेत्; नूनं
वैशेषिकैर्विप्रलब्धोऽसि । कथमन्धथा सदेकप्रत्यययोरनुभवव्यवहारविशेषमपश्यन्नपि
कानिचित् कानिचिदसम्बद्धान्यक्षराणि प्रलपसि ।
सत्त्वैकत्वयोः परापरत्वानुपपत्तेरेवं स्यादिति चेन्न । साम्यात् । जातिपरा-
को परिसमाप्ति कहें, तो एकत्व की कहीं भी परिसमाप्ति न होगी। कारण जिन दो में
द्वित्व रहता है, उनमें से प्रत्येक में एकत्व भी रहता ही है। अन्यथा वहाँ एकत्व का
अभाव हो जायगा । एवञ्च वृत्तित्वमात्र ही परिसमाप्ति होने से एक प्रत्यक्ष व्यक्ति में भी
द्वित्व की परिसमाप्ति ही है, अभाव नहीं । अतः लक्षण का असम्भव हो जायगा।
समर्थन—एकव्यक्तिगत एकत्वसंख्या अन्यत्र नहीं रहती, अतः तत्रैववृत्तित्वरूप
परिसमाप्ति एकत्व में हैं। खंडन—सत्ताव्यक्ति भी ऐसी ही हो जायगी। अर्थात् एक-
व्यक्तिगत सत्ता अन्यत्र न रहेगी। यदि सत्ता को भी प्रतिव्यक्ति भिन्न मानें, तो 'इदं
सत्', इदं सत्' यह अनुगत प्रतीति नहीं होगी। किञ्च—यदि एकत्व को प्रतिव्यक्ति-
व्यावृत्त मानें, तो 'इदमेकम्', 'इदमेकम्' यह अनुगत प्रतीति न होगी। यदि उसे नाना
मानें, तो सभी एकत्व का लक्षण में प्रवेश तो हो नहीं सकता, किन्तु एक ही एकत्व
का निवेश हो सकता है। एवञ्च जिस प्रत्यक्ष-व्यक्तिगत एकत्व का निवेश करेंगे, उससे
अन्य व्यक्ति में अव्याप्ति हो जायगी।
समर्थन—जातिरूप होने से सत्ता एक ही है, किन्तु एकत्व तो गुणपदार्थ होने से
प्रतिव्यक्ति भिन्न है। खंडन—निश्चय ही आप वैशेषिकों के वञ्चन में आ गये । अन्यथा
सत्ता और एकत्व दोनों की प्रतीति या व्यवहार में भेद न देखते हुए भी युक्तिविरुद्ध,
असम्बद्ध (एकत्व को गुण तथा सत्ता को जाति) क्यों कहते ?
समर्थन—यदि एकत्व को जाति मानें, तो द्रव्यत्व के तुल्य उसका भी सत्ता के
साथ पर-अपरभाव होना चाहिए। वह हो नहीं सकता; कारण सत्ता में सत्ता नहीं रहती
और एकत्व रहता है तथा एकत्व में सत्ता है और एकत्व नहीं है। फलतः सांकर्य होने
से एकत्व जाति ही नहीं, प्रत्युत गुण ही है। खंडन—यदि सांकर्य का परिहारमात्र ही

२४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
परत्वश्रौव्यमेव च क्वाप्येकन्यूनवृत्तित्वे प्रमाणं स्यात् । क्व तथेति चेन्न ।
शैलेऽनलस्यानुमायां क्व हस्तांवितस्त्यादौ तदंश इत्यांनिश्चयवददोषत्वात् ।
नन्वस्तु मा वाऽऽसीदेकत्वमनुगतम्, किमनेनात्र निरूपितेन ? द्वित्वादि यत्र
न समाप्यते, अभिहिताभावत्रयं चास्ति तत्प्रत्यक्षमिति । मैवम् ; अनुमित्यादि-
त्रयेऽपि न त्रित्वं परिसमाप्तम् । एवं सत्यन्यानि त्रीणि न स्युः ।
अन्या सा त्रित्वव्यक्तिर्याऽन्यत्रेति चेन्न । त्रित्वव्यक्तेः कस्याश्चिदनुमित्यादि-
त्रये समाप्यभावात् ।
काचिदपि त्रित्वव्यक्तिर्यत्र न समाप्यत इति चेन्न । अव्यापकत्वात् ।
प्रत्यक्षत्वस्य च त्रित्वव्यक्तेश्चावश्यं सामानाधिकरण्यस्य वैशेषिकमतव्युत्थितेन
करना है, तो सत्ता को गुण और एकत्व को जाति मानकर कीजिये, क्या हानि है ।
किञ्च—'सत्ता और एकत्व दोनों में एक पर तथा एक अपर है, एक व्यक्ति में वृत्ति
जातिद्वय होने से; जैसे द्रव्यत्व' यह अनुमान ही एकत्व के न्यूनवृत्तित्व में प्रमाण
है । समर्थन—फिर भी इस अनुमिति से 'सत्ता अपर जाति है या एकत्व ?' इस विशेष
का निश्चय तो होता ही नहीं । खंडन— अनुमिति में यह दोष नहीं है; कारण
अनुमिति से सर्वत्र सामान्यरूप से ही निश्चय होता है, विशेषरूप से नहीं । पर्वत में
धूम से वह्नि की अनुमिति में भी वह्नि हस्तपरिमित है या वितस्तिपरिमित, ऐसा
कोई विशेष निश्चय कहाँ होता है ?
समर्थन—एकत्व अनुगत हो या न हो, यहाँ इस निरूपण से क्या प्रयोजन है,
'द्वित्व आदि की परिसमाप्ति जहाँ न हो और उक्त अभावत्रय हों, वह प्रत्यक्ष है' यही
प्रत्यक्ष का लक्षण करेंगे । खण्डन—अनुमिति आदि त्रय में भी यावत् त्रित्वव्यक्ति की
परिसमाप्ति नहीं है । यदि अनुमित्यादि त्रय में ही त्रित्व की परिसमाप्ति मानें, तो
अन्यत्र ( 'प्रमेयादीनि त्रीणि यहाँ' ) त्रित्व न रहेगा ।
समर्थन—अन्यत्र जो त्रित्व व्यक्ति है, वह अन्य ही है । अर्थात् अनुमिति आदि
निष्ठ त्रित्व की परिसमाप्ति उसीमें है । लक्षण में एकैक ( यत्किंचित् ) त्रित्व की
परिसमाप्ति ही अभिप्रेत है । खण्डन—फिर तो यत्किञ्चित् त्रित्वव्यक्ति की परिसमाप्ति
का अभाव अनुमित्यादि त्रय में भी है ।
समर्थन—'किसी भी त्रित्वव्यक्ति की परिसमाप्ति जहाँ न हो, वह प्रत्यक्ष है ।'
खंडन—आप वैशेषिक ( कणाद मुनि के अनुयायी ) नहीं हैं । अतः प्रत्यक्ष में त्रित्व-
संख्या को अवश्य मानेंगे । यदि न मानें, तो 'प्रत्यक्षव्यक्तयस्तिस्रः' ऐसा व्यवहार आपके

परिच्छेद ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २४५
भवताऽभ्युपगम्यत्वात् । अन्यथा प्रत्यक्षव्यक्तयस्तिस्रो न स्युः, तदेव हि त्रिरभि-
धीयते यत्र त्रित्वं परिसमाप्यते ।
किञ्च—तथापि स एवातिव्यापकतादोषः । त्रित्वेनावच्छिन्नासु अनुमित्यादि-
व्यक्तिषु त्वदभिहितमभावत्रयमस्तीति तत्र प्रत्यक्षलक्षणं गतमित्यतिव्याप्तिरुक्ता,
तद्व्यावर्तनाय भवताऽभिधीयते—काचिदपि त्रित्वव्यक्तिर्यत्र न समाप्यत इति ।
न चैवमुक्ते साऽतिव्याप्तिर्निवर्तते, तत्राप्युक्तविशेषणस्य विद्यमानत्वात् । न हि
त्रित्वावच्छिन्ने तस्मिन् त्रित्वव्यक्तिः काचिदपि समाप्यते, त्रित्वलक्षणैकोपाध्य-
वच्छिन्ने तस्मिन् त्रित्वव्यक्त्यन्तरं भवदप्याश्रयान्तरमादाय वर्तते, न तु तत्रैव
परिसमाप्यते ।
यत्र चोक्तमुपाधिभूतं त्रित्वं तेषु यदि त्रित्वसमाप्तिर्धर्मिषु दृश्येत, तदा
तद्दर्शनेन तत्र धर्मिमात्रे लक्षणाव्यावृत्तिः सिद्धयेत्, न तु त्रित्वविशिष्टे धर्मिणि ।
तस्मादतिव्यापकत्वं तदवस्थमेव ।
मत में कैसे होगा ? कारण, वे ही तीन हैं, जिनमें त्रित्वसंख्या परिसमाप्त हो । अतः
प्रत्यक्ष में भी सभी त्रित्वों का अभाव न होने से असंभव हो जायगा ।
किञ्च—ऐसा निवेश करने पर भी वहीं अतिव्याप्ति दोष है । देखिये, त्रित्व से
युक्त अनुमिति आदि व्यक्ति में उक्त अभावत्रय है, अतः वहाँ प्रत्यक्ष का लक्षण चला
जाने से अतिव्याप्ति हुई । उसकी व्यावृत्ति के लिए आप निवेश करते हैं कि 'कोई भी
त्रित्वव्यक्ति जहाँ परिसमाप्त न हो, वह प्रत्यक्ष है।' ऐसा निवेश करने पर भी उक्त
अतिव्याप्ति का वारण नहीं होता, कारण वहाँ भी त्रित्वविशिष्ट उक्त विशेषण विद्यमान
है । अनुमिति आदि में भी किसी भी त्रित्वव्यक्ति के न होने से त्रित्वलक्षण एक उपाधि
से अवच्छिन्न (युक्त) अनुमित्यादि त्रय में अंशतः आत्माश्रय होने के भय से वह त्रित्व
तो है नहीं, अन्य त्रित्व है । किन्तु वह भी घट-पटादि अन्य आश्रयों का आदान
करके है ।
केवल उसमें नहीं है, जहाँ उपाधिभूत त्रित्व है, कारण त्रित्वविशिष्ट समुदाय
एक है । केवल उन धर्मियों में त्रित्व देखा जाता है, अतः धर्मीमात्र में लक्षण की
व्यावृत्ति नहीं हो सकती । त्रित्वविशिष्ट धर्मी में व्यावृत्ति नहीं हो सकती । तस्मात्
त्रित्वविशिष्ट में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है ।

२४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
अभावत्रयञ्च त्रित्वोपाध्यवच्छेदेन समुदिततामुपगतवति विशिष्टे धर्मिणि
वर्तते, न स्वविशिष्टे, प्रत्येकमभावत्रयावस्थानस्य तेषु वक्तुमशक्यत्वात् ।
अथ मन्यसे तादृशस्य विशिष्टस्य प्रमितित्वेनैव व्यवच्छेदः । न ह्यभावत्रयवत्
त्रित्वं विशेषणमाश्रयकोटावन्तर्भाव्य तासु धर्मिव्यक्तिषु प्रमितित्वं वर्तते । किन्तु
तेषां धर्मिणां स्वरूपमात्रे उक्ताभावत्रयं प्रमितित्वञ्चेत्येतत् यत्रास्ति, तत्प्रत्यक्षमिति
हि ब्रूम इति ।
न; भवताऽपि भिन्नभिन्नधर्मावच्छिन्नस्यैव धर्मिणः प्रमितित्वमभावत्रयवत्त्वं
च अवश्यमभ्युपगन्तव्यम् । तथा हि—यदि प्रमितित्वस्य क्वाचित्कत्वे नियामकं
नोच्यते, तदा सर्वा प्रमितिः स्यात्, न वा काचिदपि ।
सर्वत्र सत्ताऽसत्ता वा नियमेऽन्यानपेक्षया ।
नियामकाद्दि भावानां काचित्कत्वस्य सम्भवः ॥ ४२ ॥
तन्नियामकमाश्रये विशेषणीभूतं वा वक्तव्यम्, उपलक्षणीभूतं वा । आद्ये
यदेव प्रमितित्वस्याऽऽश्रयविशेषणं तदेव यद्यभावत्रयस्यापि तस्य, तदा त्रित्वा-
वच्छिन्नेऽनुमित्यादावभावत्रयस्य दर्शितत्वात्तत्र च प्रमितित्वेनापि त्रित्वावच्छिन्ने
भवितव्यमिति प्रमितित्वान्न तद्व्यवच्छेदः ।
शब्दादि प्रमितियों के अभावत्रय त्रित्वरूप उपाधिविशिष्ट धर्मी में है, केवल धर्मी
में नहीं है । एक-एक में दो अभावों के होने पर भी तीन अभाव नहीं हैं, कारण
शब्दप्रमिति से शब्दप्रमितित्व का अभाव नहीं होता ।
समर्थन—प्रमितित्व के निवेश से ही अनुमिति आदि समुदाय में अतिव्याप्ति
का वारण हो जायगा । कारण जैसे उक्त अभावत्रय त्रित्वविशिष्ट धर्मी में है, वैसे प्रमि-
तित्व त्रित्वविशिष्ट धर्मी में नहीं है, किन्तु धर्मीमात्र में है । 'उक्त अभावत्रय तथा
प्रमितित्व दोनों जहां एक में रहें, वह प्रत्यक्ष है' ऐसा हम कहते हैं ।
खंडन—आप भी किसी भिन्न धर्म से युक्त ही धर्मी में प्रमितित्व तथा उक्त
अभावत्रय को मानेंगे । देखिये—यदि प्रमितित्व के क्वाचित्कत्व में कोई नियामक
न कहा जाय, तो वस्तुमात्र ही प्रमिति हो जायगी या कुछ भी प्रमिति नहीं होगा ।
नियम में यदि अन्य की अपेक्षा न हो, तो सर्वत्र सत्ता या असत्ता हो जायगी ।
कारण भावों का क्वाचित्कत्व नियामक से होता है, उस नियामक को आश्रय
में विशेषण मानेंगे या उपलक्षण ? प्रथम पक्ष में जो प्रमितित्व का नियामक आश्रय
में विशेषण है, यदि वही अभावत्रय का नियामक भी आश्रय में विशेषण है, तो

५ परिच्छेद ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २४७
अथान्यावच्छिन्ने प्रमितित्वमन्यधर्मावच्छिन्ने चाभावत्रयसम्बन्धः, तदा—
नास्ति त्वत्पक्षेऽपि प्रमितित्वस्य एकधर्मविशिष्टाश्रयत्वलक्षणमेकाश्रयत्वम्,
विशिष्टेऽपि धर्मिण्याश्रितो धर्म्याश्रित एवेति कृत्वा च प्रमितित्वस्य अभावत्रय-
समानाश्रयत्वेऽनुमित्यादित्रयेऽपि प्रसङ्गस्तदवस्थः ।
नापि द्वितीयः ; उपलक्षणीभूतेन केनचिद्धर्मेण योऽसावुपलक्षितो धर्मी, स एव
खलु त्रित्वविशिष्टोऽपि, विशेषणवतोऽपि यावद्विशेष्यवस्तुनो विशेष्यवस्वात्मकत्वात् ।
यथा दण्ड्यपि पुरुषः पुरुष एव । एवञ्च सत्युपलक्षितादनन्यभूते त्रित्वविशिष्टेऽप्यनु-
मित्यादौ प्रमितित्वमाश्रितं नियामकेनोपलक्षणेन उपलक्ष्याभेदव्यवस्थिततया
तस्याप्यवच्छिन्नत्वात् । तथा चातिव्याप्तिर्वज्रलेपायिता ।
तथाप्युपलक्षणेन त्रित्वविशिष्टतया नोपलक्षितोऽसौ धर्मी, किन्तु स्वरूपेणेति
चेन्न । उक्तमत्र । यदेव तदुपलक्षितं तदेव विशिष्टमपि । तथापि विशिष्टेन रूपेण
त्रित्वविशिष्ट अनुमित्यादि त्रय में उक्त अभावत्रय को दिखा आये हैं और प्रमितित्व भी
त्रित्वविशिष्ट अनुमित्यादि में है; कारण दोनों के नियामक एक ही हैं । अतः प्रमितित्वरूप
विशेषण से अनुमित्यादि समुदाय में अतिव्याप्ति का वारण नहीं हो सकता ।
यदि अन्य धर्म से अवच्छिन्न ( नियमित ) आश्रय में प्रमितित्व तथा अन्य धर्म
से अवच्छिन्न आश्रय में अभावत्रय मानें, तो आपके पक्ष में भी प्रमितित्व तथा अभाव-
त्रय एकधर्मविशिष्ट प्रत्यक्ष में नहीं हैं, अतः असम्भव हो जायगा । यदि कहें कि
यद्यपि अवच्छेदक-भेद है, तथापि प्रत्यक्षरूप धर्मी में प्रमितित्व और अभावत्रय दोनों हैं,
अतः असम्भव नहीं है, तो अनुमिति आदि त्रय में भी त्रित्वविशिष्ट में अभावत्रय तथा
प्रत्येक में अर्थात् प्रत्यक्षत्वविशिष्ट में प्रमितित्व भी है। अतः अतिव्याप्ति वैसी ही है।
नियामक आश्रय में उपलक्षण है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण उपल-
क्षणीभूत धर्म से उपलक्षित धर्मी ही त्रित्वरूप विशेषण से विशिष्ट भी है; क्योंकि विशे-
षणवान् विशेष्य भी विशेष्यरूप ही होता है; जैसे दण्डीपुरुष भी पुरुष ही है । ऐसा
होने पर उपलक्षित में प्रमितित्व होने से उपलक्षित से अनन्यभूत त्रित्वविशिष्ट
अनुमिति आदि त्रय में भी प्रमितित्व है । कारण उपलक्ष्य के अभेदरूप से व्यवस्थित
होने से त्रित्वविशिष्ट भी नियामक उपलक्षण से अवच्छिन्न है । अतः प्रत्यक्षलक्षण की
अनुमित्यादि त्रय में अतिव्याप्ति वज्रलेपतुल्य हो गयी ।
समर्थन—यद्यपि उपलक्षित से अनन्यभूत त्रित्वविशिष्ट है; तथापि उपलक्षक से
त्रित्वविशिष्ट रूप से उपलक्षित नहीं होता, किन्तु केवल धर्मीमात्र उपलक्षित होता है।

२४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तावन्नोपलक्षितमिति चेत्, मोपलक्षि। अविशिष्टे नापि तन्नोपलक्षितमेव; अन्यथा
प्रकृतेऽपि वैयधिकरण्यापत्तेः।
तदास्तामुल्लसत्पल्लवदलनविलसितेनेति। तदेवं लक्षणान्तरेऽपि प्रतिपादितोऽयं
दूषणसमूहः स्वयमूहनीयः।
एतदेव परामृश्य भट्टैरिदमुदाहृतम् ।
लक्षणस्याऽभिधानन्तु केनांशेनोपयुज्यते ॥ ४३ ॥
अन्याभिप्रायोक्तमपि हि तत्सामान्यतोऽप्युपपद्यमानमेवेति ।
अथ अनुमान-खण्डने
अनुमिति-परामर्श-खण्डनम्
अनुमानमपि किमुच्यते ?
करणपक्षे लिङ्गपरामर्शोऽनुमानमिति चेत्, किं लिङ्गत्वम् ?
खंडन—जो उपलक्षित है, वही त्रित्वविशिष्ट भी है। यदि कहें कि त्रित्वविशिष्टरूप से
उपलक्षित नहीं है, तो न सही। अविशिष्टरूप से भी तो उपलक्षित नहीं है। अन्यथा
यदि अविशिष्टत्व रूप से उपलक्षित में प्रमितित्व मानें, तो अविशिष्टत्व से उपलक्षित में
प्रमितित्व तथा प्रत्यक्षत्वादिविशिष्टरूप से उक्त अभावत्रय होने से प्रत्यक्ष में भी भिन्न-
अवच्छेद से प्रमितित्व और अभावत्रय है। अतः प्रत्यक्ष में असंभव हो जायगा।
तस्मात् शङ्कारूप पल्लव जिसमें उल्लसित हैं, ऐसे वचनों का आडम्बर व्यर्थ है।
इसी प्रकार अन्य लक्षणों में भी इन दूषणसमूहों का स्वयं ऊह करना चाहिए।
इसी बात को विचारकर भट्टजी ने कहा है कि लक्षण का अभिधान किसी
अंश में उपयोगी नहीं है। यद्यपि भट्टजी ने धर्म में नोदना (विधि) ही प्रमाण
है या नोदना प्रमाण ही है, प्रत्यक्षादि लक्षण अनुपयोगी हैं—इस प्रस्ताव में यह
कहा है, तथापि लक्षण-सामान्य में भी भट्टजी का कथन उपयोगी हो सकता है, क्योंकि
लक्षणमात्र उक्त प्रकार से खण्डित हैं।
अनुमान-खण्डन के अन्तर्गत
अनुमिति और परामर्श का खण्डन
खण्डनकर्ता—अनुमान भी क्या वस्तु है? अर्थात् प्रत्यक्ष की तरह ही अनुमान का
लक्षण भी वक्ष्यमाण दोषों से बाधित होने के कारण अनुमान भी अनिर्वचनीय ही है।
समर्थन—'अनुमीयतेऽनेनेति अनुमानम्' यह करणव्युत्पत्ति-पक्ष स्वीकारकर लिङ्ग-
परामर्श को ही अनुमान कहेंगे। खंडन—इस लक्षण के घटक लिङ्ग का निर्वचन होना
चाहिए। अतः पहले यह कहिये कि लिङ्ग क्या वस्तु है ?

परिच्छेद ] अनुमिति और परामर्श का खण्डन २४६
व्याप्तस्य पक्षधर्मत्वमिति चेन्न । संशयस्योपलक्षणत्वे तत्र दृष्ट्वाऽपि व्यापकं
तत्परामर्शेऽतिप्रसङ्गात् । अत एव न तस्य वर्तमानस्य अतत्कालेऽप्युपलक्षणत्वात् ।
विशेषणत्वे चानुमाय व्यापकं धर्मिनाशावदप्रवृत्त्यापत्तेः ।
पक्षधर्माद्धेतोः पक्षांशे विशेष्ये साध्यसिद्धिः, ईदृशश्च वैयधिकरण्यमिष्टमेवे-
त्यतो नैवमिति चेन्न । पक्षमादाय वैयधिकरण्ये नियतसामानाधिकरण्य-
लक्ष्णव्याप्तिलोपापत्तेः ।
तथापि विशेष्यमादाय साऽस्त्येवेति चेन्न । साध्यविशेषसिद्धिरपि यत्र
निर्वचन— व्याप्तिविशिष्ट धूमादि का पक्षवृत्तित्व ही लिङ्ग है । खण्डन—इस पक्ष
में भाव-व्युत्पत्ति के निराशार्थ आपको पक्षवृत्तित्वपदघटित पक्ष-पदार्थ यही कहना होगा
कि 'जिस धर्मी में साध्य का सन्देह हो, वह पक्ष है।' एवञ्च यहाँ 'सन्देह' पक्ष में
उपलक्षण है या विशेषण ? यदि उपलक्षण मानें, तो जहाँ पर्वत में वह्नि का प्रत्यक्ष
होने पर भी धूम का परामर्श होता है, वहाँ धूमपरामर्शी अनुमान तथा धूम लिङ्ग कहा
जायगा । 'वर्तमान सन्देह से उपलक्षित धर्मी में वृत्ति व्याप्तिविशिष्ट धूमादि ही लिङ्ग है ।
प्रकृत स्थल में सन्देह वर्तमान नहीं है, अतः अतिप्रसङ्ग नहीं' यह भी नहीं कह सकते;
कारण भूत, भविष्यत् भी [ गुरुटीका, कुरु-क्षेत्र इत्यादि स्थल में ] गुरु, कुरु, उपलक्षण
देखे जाते हैं । भावार्थ यह है कि 'वर्तमान' विशेषण ही होता है, उपलक्षण नहीं । अतः
यदि सन्देह में 'वर्तमान' विशेषण हो, तो वह सन्देह धर्मी का विशेषण हुआ, उपलक्षण
नहीं । फिर यदि सन्देह को धर्मी का विशेषण मान लें, तो वह्नि का अनुमान हो जाने
के बाद तदर्थ प्रवृत्ति न होनी चाहिए, कारण धर्मी का नाश होने पर धर्म के लिए
प्रवृत्ति नहीं होती । यहां वह्नि की अनुमिति हो जाने पर तो सन्देह नष्ट हो जाने से
सन्देहविशिष्ट धर्मी का भी नाश हो ही जाता है ।
निर्वचन--सन्देहविशिष्ट पर्वत में विद्यमान धूम से केवल पर्वत में वह्नि की
अनुमिति होती है और साध्यसिद्धि से सन्देह नष्ट होने पर भी पर्वत विद्यमान ही रहता
है । अतः धर्मी के नाश के तुल्य अप्रवृत्ति नहीं होगी । हेतु और साध्य के बीच इस
प्रकार का ( हेतु समग्र पक्ष में रहे और साध्य पक्ष के एक अंश धर्मीमात्र में रहे, यह )
वैयधिकरण्य होता हो, तो वह हमें इष्ट ही है । खण्डन—यदि सन्देहविशिष्ट पर्वत
में धूम और केवल पर्वत में वह्नि को मानें, तो साधन में नियत-सामानाधिकरण्यरूप
साध्य की व्याप्ति ही न रहेगी, अर्थात् व्याप्यसिद्धि हो जायगी ।
निर्वचन — यदि सन्देहविशिष्ट पर्वत में धूम है, तो केवल पर्वत में है ही; क्योंकि
३२

२५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
व्याप्तिबलायातं सामान्यं तत्र सामान्यप्रतीत्यपर्यवसानबलादेवेति सामान्यविशेष-
सिद्ध्यनुपयोगिनी पक्षधर्मता त्वदिष्ट्रा केवलं सिद्धसाधनपरिहाराय अनुमिति-
कारणत्वेनैष्टव्या । सिद्धसाधनञ्च न स्वार्थानुमाने दोष इति नानुमितिमात्रहेतु-
निवेशिनी सेति । मोक्षमार्गेहिं—
आगमेनानुमानेन ध्यानात्प्रत्यक्षेण च ।
त्रेधाऽऽत्मनि प्रमाणानां संप्लवः स्वार्थमिष्यते ॥ ४४ ॥—इति ।
एतेन संशययोग्यताऽपि निरस्ता ।
व्याप्त्वमिति चेत् ; किं वस्तुगत्या व्याप्यस्य स्वरूपेण परामर्शोऽनुमानं
व्याप्यतया वा ? नाद्यः ; अगृहीतव्याप्तिनाऽपि धूमादिपरामर्शस्यानुमानताप्रसङ्गात् ।
विशिष्ट में वृत्ति धर्म विशेष्य में भी रहता है । अतः पर्वत में साध्य तथा साधन दोनों,
रहने से व्याप्ति का विलोप नहीं होगा । खण्डन—फिर भी पक्षधर्मत्व का निवेश व्यर्थ
ही है । कारण, पर्वत में व्याप्तिविशिष्ट धूम के ज्ञान से ही वहाँ सामान्यतः वह्नि का
ज्ञान होगा और वह सामान्य विशेषज्ञान के बिना अपर्यवसित होने से विशेष वह्नि का
भी ज्ञापक हो जायगा । अतः पक्षधर्मत्व के निवेश का सामान्य या विशेषरूप से
साध्य की सिद्धि में कोई उपयोग नहीं रहा । अब केवल सिद्धसाधनरूप दोष की
निवृत्ति में ही उसका उपयोग कहा जा सकता है । किन्तु सिद्धसाधन स्वार्थानुमान
में दोष नहीं है, क्योंकि मुमुक्षुओं के आगम ( श्रवण ), अनुमान ( मनन ) और ध्यान
( निदिध्यासनरूप प्रत्यक्ष ) तीनों आत्मा में होने से प्रमाणत्रय का एक में सङ्कर तथा
शब्दसिद्ध आत्मा में अनुमिति भी देखने में आती है । अतः अनुमितिमात्र में पक्षधर्मता
को कारण नहीं कहा जा सकता ।
निर्वचन—'सन्देहयोग्य साध्य से विशिष्ट पर्वतादि पक्ष है तथा उक्त पक्ष में वृत्ति
व्याप्तिविशिष्ट धूमादि हेतु ही लिङ्ग है ।' खंडन—व्यापक वह्नि आदि का प्रत्यक्ष होने
पर भी धूमादि हेतु का ज्ञान ( परामर्श ) हो जायगा; क्योंकि साध्य का निश्चय होने पर
भी साध्य-सन्देह की योग्यता है ही, कारण योग्यता यावद्द्रव्यभावि हुआ करती है ।
अन्यथा उक्त पक्ष में कालान्तर में भी संशय न होने से अनुमिति न होगी ।
निर्वचन—'व्याप्तिविशिष्ट लिङ्ग है और उसका परामर्श ही अनुमान है' इतना
ही अनुमान का लक्षण कहेंगे । पक्षधर्मत्व का लिङ्गलक्षण में निवेश न रहे, तो क्या

परिच्छेद ] अनुमिति और परामर्श का खण्डन २५१
नापि द्वितीयः ; व्याप्त्युल्लेखिनः प्रमाणस्यानुमानत्वप्रसङ्गात् । तस्यापि व्याप्यत्व-
ग्राहिताया अवश्यवक्तव्यत्वात् ।
अत एव द्वितीय-तृतीयविशेषणे अपि निरस्ते । धारावाहिनि तथात्वापत्तेः ।
गृहीतव्याप्तिनाऽपि युगपदुभयग्रहणे द्वावेतौ व्याप्यव्यापकाविति परामर्शस्यानु-
मानत्वप्रसङ्गात् । न च तदनुमानमेव ; असन्दिग्धतया पक्षत्वाभावेन तद्धर्मस्य
हेतोः सिद्धसाधनवदपक्षधर्मत्वात् ।
स्वार्थानुमाने नाऽयं दोष इति चेन्न । प्रत्यक्षलक्षणोपपत्त्या साक्षात्त्वासाक्षात्त्व-
विरोधापत्तेः ।
हानि है' ? खंडन—क्या वस्तुतः जो हेतु व्याप्तिविशिष्ट है, उसका स्वरूप से परामर्श
अनुमान है या व्याप्तिविशिष्टस्वरूप से हेतु का परामर्श अनुमान है ? प्रथम पक्ष
में जिस पुरुष को व्याप्तिग्रह न हुआ हो, उसका 'पर्वतो धूमवान्' यह ज्ञान अनुमान हो
जायगा । द्वितीय पक्ष में व्याप्ति को विषय करनेवाला 'धूमाग्नी व्याप्तौ' यह ज्ञान भी
अनुमान हो जायगा । कारण व्याप्त्युल्लेखी उक्त ज्ञान का व्याप्यत्व भी
विषय होता ही है ।
अतएव (उक्त दोष से ही) 'द्वितीय लिङ्गपरामर्श (यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः)
या तृतीय लिङ्गपरामर्श (धूमवांश्चायम्) अनुमान है' यह कथन भी युक्त नहीं
है । किञ्च—धारावाही ज्ञान का द्वितीय या तृतीय 'पर्वतो धूमवान्' यह ज्ञान भी अनुमान
हो जायगा । किञ्च—जहाँ व्याप्ति के प्रत्यक्ष के बाद 'धूमवह्नी व्याप्यव्यापकौ' यह
मानस-ज्ञान हुआ, तो वह भी अनुमान हो जायगा । 'वह ज्ञान अनुमान ही है' ऐसी
इष्टापत्ति नहीं कह सकते; कारण वहाँ साध्य का सन्देह न होने से पर्वत पक्ष नहीं है ।
अतः उस पर्वत में विद्यमान हेतु, सिद्धसाधनस्थल की तरह, पक्ष का धर्म ही नहीं
हो सकता ।
समर्थन—स्वार्थ-अनुमान में अपक्षधर्मत्व दोष नहीं है । अतः व्याप्तिप्रत्यक्ष के
अनन्तर जात 'धूमवह्नी व्याप्यव्यापकौ' यह धूमपरामर्श अनुमान ही है । खंडन—यदि
उक्त परामर्श को अनुमान मान लें, तो उसके अनन्तर होनेवाला 'पर्वतो वह्निमान्' यह
ज्ञान अनुमानजन्य होने से अनुमिति तथा चक्षु से अन्वित होने से प्रत्यक्ष भी होगा ।
एवञ्च अनुमितित्व और प्रत्यक्षत्व में सङ्कर हो जायगा ।
१ परार्थानुमान-स्थल में सिद्धसाधन दोष होने से वहाँ अतिव्याप्ति के वारणार्थ पक्ष-
वृत्तित्व का निवेश आवश्यक है । फिर भी यह ग्रन्थ आपाततः है ।

२५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
अव्यापकविषयत्वे सतीति चेन्न । व्याप्यविषयत्वाभावप्रसङ्गात् । व्याप्यत्वं
हि सप्रतियोगिकग्रहणम्, तथा चैतस्य व्याप्यमिदमिति गृह्यते । तथा च सति
व्यापकस्यापि विशेषणस्य ग्रहणमवश्यं वक्तव्यम् । अन्यथा विशिष्टग्रहणस्य
वक्तुमशक्यत्वात् ।
विशेषतो व्यापकाविषयत्वे सतीति चेन्न । 'अग्निधूमौ व्याप्तावि'त्याप्तोपदेशाद्,
वा पूर्वं भूयोगृहीतवह्निधूमसाहचर्यस्य वह्निधूमाग्रहणकाले विमर्शवशाद् वा जाय-
मानव्याप्तिग्रहस्य व्याप्यपरामर्शोऽनुमानं स्यात् ।
न परामर्शः प्रत्ययमात्रं येन प्रथमग्रहणे प्रसङ्गः स्यात् । किन्न‍ाम ? प्रत्यभि-
ज्ञानमिति चेन्न । विचारादाप्तोपदेशाद्वा प्रतीत्य व्याप्तिं पुनराप्तोपदेशाद्विचाराद्वा
यैव मया व्याप्तिर्गृहीता सैवेयमिति प्रत्यभिजानानस्य व्याप्तिज्ञानमनुमानं स्यात् ।
विशेषतो व्याप्यविषयत्वे सतीति चेन्न । अव्यापकत्वप्रसङ्गात् । एकव्यक्तिविष-
निर्वचन—'व्यापकाविषयक जो व्याप्यपरामर्श वह अनुमान है' ऐसा कहेंगे।
खंडन—जो व्यापक को विषय न करे, ऐसा व्याप्यविषयक ज्ञान हो ही नहीं सकता,
कारण व्याप्य व्यापक से निरूपित ही होता है । अर्थात् 'इसका यह व्याप्य है' ऐसा
ही व्याप्य का ज्ञान होता है । अतः व्याप्ति में विशेषणरूप से व्यापक अवश्य भासता
है । अन्यथा विशेषण के भान के बिना विशिष्ट का भान ही न सकेगा ।
निर्वचन—'जिस ज्ञान का विशेषरूप से व्यापक विषय न हो, ऐसा जो व्याप्य
परामर्श वह अनुमान है' ऐसा कहेंगे । खंडन—'धूमाग्नी व्याप्यव्यापकौ' इस आप्त
के उपदेश से या पूर्वकाल में जिस पुरुष को बार-बार वह्नि-धूम का साहचर्यज्ञान
हुआ हो, उस पुरुष के वह्नि-धूम के अप्रत्यक्षकाल में विचार (तर्क) से जात व्याप्य-
परामर्श अनुमान हो जायगा । कारण शाब्द या मानस होने से उक्त ज्ञानों में व्यापक
विशेष रूप से नहीं भासता ।
समर्थन—हम ज्ञानमात्र को नहीं, किन्तु प्रत्यभिज्ञा को परामर्श कहते हैं । उक्त-
शाब्द या मानस ज्ञान प्रत्यभिज्ञारूप नहीं हैं, अतः उनमें अनुमान-लक्षण की अतिव्याप्ति
नहीं होगी । खण्डन—तब तो विचार या आप्तोपदेश से व्याप्तिज्ञान होने के बाद
जायमान विचार या आप्तोपदेश से जो व्याप्ति गृहीत हुई थी, वही यह है' इत्याकारक
व्याप्ति-प्रत्यभिज्ञा भी अनुमान हो जायगी ।
निर्वचन—विशेषरूप से व्याप्यविषयक परामर्श को ही अनुमान कहेंगे । अर्थात्
'जिसका विषय विशेषरूप से व्यापक नहीं हो, वह अनुमान है ।' खण्डन—'विशेष

परिच्छेद ] अनुमिति और परामर्श का खण्डन २५३
यत्त्वस्य व्यक्त्यन्तरेऽसम्भवात् सामान्यतो व्यक्तिविषयत्वस्य चातिप्रसञ्जकत्वात् ।
किञ्च—धूमवत्त्वादेर्यदा कदाचिदग्निमत्त्वं वा प्रतीयते तदानीं वाऽग्निमत्त्वं
पर्वतादेः ? नाद्यः ; तदानीमिव अन्यदाऽप्यग्न्यर्थिप्रवृत्तेस्तत्र प्रसङ्गात् । न
द्वितीयः ; तदानीमग्निमत्तया व्याप्त्यनवगमात् ।
तदेति धूमकालोऽपेक्षित इति चेन्न । क्वचिद्देशेऽन्यदाऽपि धूमस्यावस्थान-
मस्तीति कालान्तरस्यापि धूमकालत्वात् ।
तद्धूमकालोऽपेक्षित इति चेन्न । तच्छब्दस्य व्यक्तिविशेषवचनत्वे
अप्रतीतव्याप्तिकत्वम्, यत्किञ्चिद्व्यक्तिवचनत्वे चोक्तदोषापत्तिः ।
रूप से व्याप्यविषयक हो' इस वाक्य का क्या पर्वतादिनिष्ठ तत्तद् धूमादिविषयक हो, यह
अर्थ विवक्षित है या सामान्यतः व्यक्तित्वाधिकरण-विषयक हो, यह अर्थ है ?
प्रथम पक्ष में अरण्यादिगत धूम-परामर्श में अव्याप्ति हो जायगी, कारण लक्षण में
पर्वतगत धूमव्याप्ति विशेष होने से अरण्यगत धूम में उक्त लक्षण का असम्भव
है । द्वितीय पक्ष में सामान्यतः व्यक्तित्वाधिकरण प्रत्यभिज्ञान का भी विषय है, अतः
पूर्वोक्त प्रत्यभिज्ञा में अतिव्याप्ति हो जायगी ।
किञ्च—धूम से पर्वत में जिस किसी काल से सम्बद्ध वह्नि की प्रतीति होती है
या उसी काल से सम्बद्ध वह्नि की ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण जैसे उस काल में अग्नि
के लिए मनुष्यों की प्रवृत्ति होती है, वैसे ही अन्यकाल में भी होने लगेगी। द्वितीय
कल्प भी युक्त नहीं; कारण तात्कालिकत्वरूप से अग्नि की धूम वे व्याप्ति नहीं है,
किन्तु अग्नित्वरूप से ही अग्नि की धूम में व्याप्ति है ।
निर्वचन—'यदा यदा धूमस्तदा तदा वह्निः' ईदृश व्याप्तिग्रह में काल भासता
ही है, अतः धूमकालिक अग्नि की अनुमिति हो ही सकती है। खंडन—किसी देश
में दूसरे काल में भी धूम रहता है, अतः अन्य काल भी धूमकाल होने से उस काल
में भी अग्न्यर्थी की प्रवृत्ति होनी चाहिए ।
निर्वचन—'तद्-शब्द परामर्शविषय धूमपरक है, अतः अन्य काल में अग्न्यर्थी की
प्रवृत्ति नहीं होगी। खंडन—यदि तद्-शब्द को परामर्शविषय तत्-तद् धूमव्यक्तिपरक
मानें, तो तत्तद् धूमव्यक्तिविशेष में तो विशेषरूप से व्याप्तिग्रह है नहीं। फिर अनुमिति
में उस काल का स्फुरण कैसे होगा ? यदि तद्-शब्द को जिस व्यक्ति में व्याप्तिग्रह
हुआ है, उस व्यक्तिपरक मानें, तो सम्भव है कि अन्य काल में विद्यमान धूम में भी,

२५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
हेतोः पक्षधर्मतयाऽप्यपर्वतादिधर्मः साध्यो मा भूत्, ततस्तु कालान्तरे किं न
स्यात् । तं कालमन्तर्भाव्य पक्षत्वे कथं पश्चान्निष्कंपं प्रवर्तेत । धूमकालमन्त-
र्भाव्य चेदुक्तमावर्तते । तद्धूमकालश्चेद्; अंशतः स्ववृत्तिः ।
व्याप्ति-तद्ग्रहोपाय-खण्डनम्
कश्च व्याप्तिशब्दार्थ इति वक्तव्यम् ।
अविनाभाव इति चेन्न । किमेकस्याव्यतिरेकेऽपरस्य भावोऽविनाभावपदार्थः,
उत एकस्य व्यतिरेकेऽपरस्य व्यतिरेकः ? यद्याद्यः ; तदाऽव्यतिरेकोऽन्वयार्थ
व्याप्तिग्रह हुआ हो । अतः अन्य काल में भी प्रवृत्ति हो जायगी ।
समर्थन—पक्षधर्मताबलात् भी पर्वतीय वह्नि की सिद्धि हो सकती है, केवल
नियतकालीनता से नहीं । यहाँ वह अप्रयोजक है । खण्डन—हेतु की केवल पक्षधर्मता
से पर्वतेतर देश और तत्कालेतरकालगत वह्नि न सिद्ध हो, बल्कि तद्देशकालीन
साध्य ही सिद्ध हो । किन्तु अन्यकाल में अग्नि की सिद्धि क्यों नहीं होगी ?
यदि कहें कि 'अनुमितिकाल या लिङ्गकाल से विशिष्ट संदिग्धसाध्यधर्मी पक्ष है ।
अतः लिङ्गकाल अनुमिति में भासता है । इसलिए अन्य काल में साध्यसिद्धि की
आपत्ति नहीं आयेगी', तो लिङ्गकाल का नाश होने पर धर्मी के नाश के तुल्य पक्ष में
प्रवृत्ति ही नहीं होगी।
निर्वचन—लिङ्गकाल पक्ष में विशेषणरूप से नहीं भासता, किन्तु धूमकाल
भासता है और धूमकाल धूम की अनुवृत्ति होने से प्रवृत्तिकाल भी है, अतः हानि
नहीं । खंडन—यदि धूमकाल को पक्ष में विशेषण मानें, तो अन्य काल भी धूमकाल है
अतः अन्य काल में भी प्रवृत्ति होनी चाहिए । यदि तद्धूमकाल पक्ष में विशेषण मानें,
तो 'तद्धूमकालविशिष्टपर्वतः धूमवान्' इस तरह पक्षधर्मता का ज्ञान होने से अंशतः
धूम धूमवृत्ति हो जायगा, अर्थात् अंशतः आत्माश्रय हो जायगा ।
व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन
किञ्च—आपको यह भी कहना होगा कि व्याप्त्यवघटक व्याप्तिशब्द का अर्थ क्या है ?
निर्वचन—अविनाभाव ही व्याप्ति-शब्द का अर्थ है । खंडन—इस 'अविनाभाव'
शब्द का अर्थ क्या 'एक के अव्यतिरेक में अपर का भाव है' या 'एक के व्यतिरेक में
अपर का व्यतिरेक ?' यदि प्रथम पक्ष मानें, तो अव्यतिरेक का अर्थ अन्वय होता है ।
एवञ्च 'एक के अन्वय में अपर का अन्वय', यह इसका अर्थ हुआ । ऐसा मानने पर

परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २५५
इत्येकस्यान्ययेऽपरस्यान्यय इत्युक्तं स्यात् । एवञ्च सति पार्थिवत्व-लोहलेख्यत्वयो-
रन्वयो व्याप्तिः स्यात् ।
न क्वाचित्कः सम्बन्धो व्याप्तिः , सार्वत्रिकस्य तथात्वेन विवक्षितत्वादिति
चेत् । किमिदं सार्वत्रिकत्वं सम्बन्धस्य ? सर्वासु तज्जातीयव्यक्तिषु विद्यमानतेति
चेत् ; नेयं सर्वतज्जातीयव्यक्त्यपरिज्ञाने शक्याऽवधारणा । न च सर्वास्ता व्यक्तयो
विशेषतो ज्ञातुं शक्याः , तत्तत्प्रमितिकरणासम्भवात् ।
इन्द्रियेण सामान्यलक्षणया प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाले सर्वास्तज्जातीय-
व्यक्तयो गृह्यन्ते, यदनभ्युपगमे षण्डकसमुद्वाह्य मुग्धायाः पुत्रप्रार्थनमिवेति
वाचस्पतिरुपालम्भमवादीदिति चेत् । मैवम् ; सामान्यलक्षणया प्रत्यासत्त्या
व्याप्तिं गृह्णतः सार्वज्ञप्रसङ्गात् ।
क्वचिदप्यज्ञानं ते न स्यादिति च सार्वज्ञापादनमिति न प्रतिकृत्याऽपि ।
लोहलेख्यत्व ( कुठारादिच्छेद्यत्व ) रूप साध्य की पार्थिवत्व में व्याप्ति हो जायगी ।
कारण पार्थिवत्व का जिस काष्ठादि में अन्वय है, वहाँ लोहलेख्यत्व का भी अन्वय है ही ।
समर्थन — काचित्क सम्बन्ध अर्थात् अन्वय व्याप्ति नहीं, किन्तु सार्वत्रिक अन्वय ही
व्याप्ति है। एवञ्च पार्थिवत्व का लोहलेख्यत्व से सार्वत्रिक अन्वय नहीं है, कारण वज्र
( हीरे ) में वह व्यभिचरित हो जाता है । खंडन — सम्बन्ध में सार्वत्रिकत्व क्या
वस्तु है ? यदि 'तज्जातीय सर्वव्यक्तियों में विद्यमानता' है, तो जबतक सर्वव्यक्तियों
का ज्ञान न हो, तबतक सर्वव्यक्तियों में सम्बन्ध की विद्यमानता का भी ज्ञान हो नहीं
सकता । सब व्यक्तियों का विशेषरूप से ज्ञान हो नहीं सकता; क्योंकि उक्त ज्ञान के
लिए करणभूत इन्द्रियसन्निकर्ष ही नहीं है।
समर्थन — चक्षुरिन्द्रिय से सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति ( सन्निकर्ष ) द्वारा व्याप्ति-
ग्रहकाल में धूमत्वेन सभी धूम और वह्नित्वेन सभी वह्नि व्यक्तियों का ग्रहण हो ही
सकता है । सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति न मानकर व्याप्तिग्रह का स्वीकार करना षण्ढ
से विवाहकर मुग्धा स्त्री द्वारा पुत्र-प्रार्थना के तुल्य ही है, यह उपालम्भ तो श्रीवाचस्पति
मिश्र दे ही चुके हैं । खंडन —यदि सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से व्याप्तिग्रहण-काल
में सभी व्यक्तियों का ग्रहण मानें, तो प्रमेयत्व और अभिधेयत्व के व्याप्तिग्रह-काल में
प्रमेयमात्र का ग्रह हो जाने से मनुष्यमात्र को सर्वज्ञ हो जाना चाहिए ।
प्रतिबन्दी प्रश्न — सर्वज्ञत्व का प्रसङ्ग हो जायगा, यह दोष भी सर्व के ज्ञान के
बिना हो नहीं सकता। कारण जब आप सर्व को जानते ही नहीं, तो मुझमें सर्वज्ञान का

२५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
प्रमेयत्या व्याप्तिग्रहणकाले सर्वतज्जातीयव्यक्तिग्रहणे प्रमेयत्वादिसर्वं तदा ज्ञायत
एव, न तु रूपान्तरेणेति चेन्न । यदि रूपान्तरेण तत् प्रमेयं तदा रूपान्तरवतोऽपि
प्रमेयत्वाधारतया कथमग्रहणम् । अथ न प्रमेयं नास्त्येव रूपान्तरेण तत् । येन तु
रूपेणास्ति तेन सर्वेण प्रमेयमिति यावद्विद्यमानाकारेण ज्ञातत्वप्रसङ्गः । तथात्व-
स्वीकारे च ज्ञायतां प्रमेयत्वदर्शिना भवता मामकी चित्तवृत्तिः, ततः श्रद्धास्ये ।
स्यादेतत्—यथा भेदोऽन्योन्याभाववैधर्म्यादिः पृथक्, तथैक्यमपि वस्तूनाम् ।
ततः प्रमेयत्वाद्यपि धर्मिणामेकत्वमेकमेव । ततः प्रमेयत्वेन ज्ञायमानं तत् सर्वमपि
तेनैक्येन प्रतीयमानैकव्यक्त्यात्मकमेव ज्ञायमानं भवतीति कथं तदेकत्ववेदिनः
सार्वज्ञम् । न च वाच्यं नानात्वमपि व्यक्तीनां प्रमेयमिति तदपि धर्मितया
आरोप कैसे करेंगे ? तब तो आपमें भी सर्वज्ञता की आपत्ति आ जायगी । उत्तर—
यह प्रतिकृत्या (प्रतिबन्दी) भी युक्त नहीं है । कारण 'मेरे चित्त में क्या है' इस
प्रश्न का उत्तर न देने से मेरी हृद्गत वस्तु को आप नहीं जानते, यह बात स्पष्ट है,
जो मेरी हृद्गत वस्तु के जान लेने पर सिद्ध नहीं हो सकती—यही यहाँ सर्वज्ञत्वापादन
का आशय है । अनिष्टकारक देवता को 'कृत्या' कहते हैं और उस देवता की
निवारक देवता को 'प्रतिकृत्या' कहते हैं । प्रकृतमें लक्षणा से 'प्रतिकृत्या' शब्द
प्रतिबन्दीपरक है ।
समर्थन—सामान्यलक्षणा से प्रमेयत्वरूप से सर्व का ग्रहण होने पर भी रूपान्तर
(तत्तद्रूप) से सर्व का ग्रहण नहीं होता, अतः सर्वज्ञत्व का प्रसङ्ग नहीं है । खंडन—
यदि तत्तद्रूप से तत्-तत् वस्तु प्रमेय हैं, तो तत्तद्रूपविशिष्ट तत्तद्वस्तु भी प्रमेयत्व की
आधार हैं ही । फलतः प्रमेयत्व रूप से उनका ग्रहण क्यों न हो ? यदि अन्यरूप से
वे प्रमेय नहीं हैं, तो अन्यरूप से वे हैं ही नहीं । जिस रूप से वे हैं, उस रूप
से प्रमेय ही हैं । अतः यावत् विद्यमान आकारों से उसका ग्रहण होने लगेगा । यदि
आप यह मान लें कि यावत् विद्यमान आकारों से सभी वस्तु ज्ञेय हैं, तो प्रमेयत्व से सब
वस्तुओं को देखनेवाले आप मेरे चित्त में विद्यमान वस्तु को भी जान लें, तभी आपके
वचन में मैं श्रद्धा करूँगा ।
समर्थन—जैसे अन्योन्याभाव, वैधर्म्य आदि रूपभेद, वस्तुओं में पृथक्त्वरूप
हैं, वैसे ही एकत्व, प्रमेयत्व आदि भी वस्तुओं के ऐक्यरूप ही हैं । एवञ्च प्रमेयत्व
आदि भी धर्मियों के ऐक्यरूप ही हैं । तस्मात् प्रमेयत्व रूप से ज्ञायमान वह सर्ववस्तु

परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २५७
ग्राह्यमेवेति; यतस्तदपि प्रमेयत्वादिनो गृह्यमाणमेकमेव गृहीतं भवतीति । तस्मात्
“एको भावस्तत्त्वतो येन दृष्टः सर्वे भावास्तत्त्वतस्तेन दृष्टाः ।"—इति । तत्त्वतः =
ताद्रूप्येण एकीभूता इति ।
तदेतदपि नोपपन्नम् ; नानैकमिति व्याहतप्रतीत्यापत्तेः । अथ रूपान्तरेण
नानात्वं प्रमेयत्वादिना चैक्यमिति व्यवस्थित्या न व्याघातः स्यात्; तर्हि
प्रमेयत्वाद्याधारस्य व्यक्तिभेदस्य कृत्स्नस्य ग्रहणात् सार्वज्ञापत्तिस्तादवस्थ्येवेति ।
किञ्च—सामान्यलक्ष्णया प्रत्यासत्त्या तज्जातीयविशेषग्रहणे तासु सर्वासु
व्यक्तिषु सम्बन्धास्तित्वे किं प्रमाणम् ?
सर्वव्यक्तिवत् तत्सम्बन्धग्रहेऽपि व्याप्तिग्राहकमिन्द्रियमेव प्रमाणमिति चेत्;
तर्हि क्वचिदेवमवधारितस्य यद्व्यभिचारो दृश्यते, तन्न स्यात्, इन्द्रियेण
तत्सम्बन्धस्य प्रमितत्वात् ।
ऐक्यरूप से प्रतीयमान एकरूपात्मक ही ज्ञात होता है। अतः एकत्ववेत्ता पर
सर्वज्ञत्व का प्रसङ्ग कैसे आ सकता है ? यदि कहें कि व्यक्तियों का नानात्व भी प्रमेयत्व
रूप से ज्ञात होता है। अतः वस्तु नाना हैं, तो वह युक्त नहीं है। कारण; प्रमेयत्व रूप
से गृहीत नानात्व भी एक ही होता है। कहा भी है : 'जिस पुरुष ने एक भाव
( वस्तु ) को प्रमेयत्वादि रूप से देख लिया, उसने संपूर्ण भावों को प्रमेयत्वादि रूप
से एकता-प्राप्त ही देखा है।'
खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो 'नाना एक हैं' ऐसी व्याहत प्रतीति होने लगेगी ।
यदि कहें कि अन्य रूपों से नाना हैं तथा प्रमेयत्व रूप से एक है, अतः व्याहत प्रतीति
नहीं होगी, तो प्रमेयत्व के आधारभूत सभी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों का ग्रहण हो जाने से
सर्वज्ञत्व की आपत्ति पूर्ववत् ही बनी रही ।
किञ्च—सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सब व्यक्तियों का ज्ञान होने पर भी उनमें
व्याप्तिरूप सम्बन्ध है, इसमें क्या प्रमाण है ?
समर्थन—सभी व्यक्तियों के तुल्य उनके व्याप्तिरूप सम्बन्ध के ज्ञान में भी इन्द्रिय
करण और सामान्यलक्षणा ही प्रत्यासत्ति ( सन्निकर्ष ) है। अतः सम्बन्ध-ज्ञान में प्रत्यक्ष ही
प्रमाण है । खण्डन—यदि सम्बन्ध-ज्ञान में प्रत्यक्ष को प्रमाण मानें, तो 'यत्र यत्र पार्थिवत्वं
तत्र तत्र लोहलेख्यत्वम्' ऐसा व्याप्ति-निश्चय होने पर भी वज्र में देखा जानेवाला व्यभिचार
न होना चाहिए, कारण प्रत्यक्ष से व्याप्तिरूप सम्बन्ध प्रमित ही है।
३३

भ्रान्तिस्तत्र सम्बन्धप्रतीतिः पश्चाद् बाधादिति चेन्न । सामग्र्यभेदे काचिद्
भ्रान्तिः, काचिदभ्रान्तिरिति विभागाद्युपपत्तेः । दोषादोषवैचित्र्यविवेचनस्य च
दुष्करत्वात् ।
कार्यभेदादेव सामग्रीभेदोऽप्युन्नेय इति चेत् । उन्नीयताम् ; स एव तु कीदृगुन्नेय
इति वाच्यम् । न तावत्सार्वत्रिकसम्बन्धाभावाभावात्मकः, तदानीं भाविनां सम्बन्धा-
नामसत्त्वेनाकारणत्वात् । सामान्यतश्च तज्जातीययोः सम्बन्धस्य प्रतीतेः पूर्वं
सत्त्वं भ्रान्त्यभ्रान्तिसाधारणम् । क्वचिदपि सम्बन्धाभावे भ्रान्तेरनुत्पादात् ।
किमेतावता, अन्य एव तर्हि कार्यभेदात्कारणभेदः कल्पयिष्यत इति चेत्; स
हि किमिन्द्रियसहकारिभूतः करणान्तरमेव वा कल्पनीय इति वाच्यम् । नाद्यः ;
इन्द्रियस्य भाविभूतसम्बन्धांशे प्रमाणत्वकल्पनायां प्रमाणाभावात् । प्रत्युत
समर्थन—वहां व्याप्तिरूप सम्बन्ध की प्रतीति भ्रमरूप है, कारण पीछे वह बाधित
हो जाती है । खण्डन—धूम में वह्नि के व्याप्तिग्रह के इन्द्रिय, सामान्यलक्षणा
प्रत्यासत्ति आदि जो कारण हैं, वे ही तो पार्थिवत्व और लोहलेख्यत्व के व्याप्तिग्रह में भी
कारण हैं। फिर जब कारण एक हैं, तो पूर्वस्थल में अभ्रान्ति और उत्तरस्थल में भ्रान्ति
है, यह विभाग हो नहीं सकता । पूर्वस्थल में दोष नहीं है और उत्तरस्थल में दोष है,
यह वैचित्र्य-विवेचन भी दुष्कर है।
समर्थन—कार्य के भेद से अर्थात् पूर्वस्थल में प्रमारूप तथा उत्तरस्थल में भ्रमरूप
व्याप्तिग्रह होता है इससे सामग्रीभेद की अनुमिति करेंगे । खण्डन—भले ही अनुमिति
कीजिये, किन्तु यह कहिये कि वह सामग्रीभेद क्या है? वह्नि-धूमस्थल में सार्वत्रिक सम्बन्ध
है और लोहलेख्यत्व-पार्थिवत्वस्थल में सार्वत्रिक सम्बन्ध नहीं है, यह सामग्रीभेद तो आप
कह नहीं सकते । कारण व्याप्तिग्रहकाल में भावी सम्बन्ध तो है नहीं, अतः व्याप्तिग्रह
के भावी सम्बन्ध कारण नहीं हो सकते । यदि कहें कि सामान्यरूप से वह्नि-धूमजातीय
का सम्बन्ध व्याप्तिग्रह से पूर्व विद्यमान ही है, तो लोहलेख्यत्व और पार्थिवत्व का सम्बन्ध
भी सामान्यरूप से काष्ठादि में व्याप्तिग्रहकाल में विद्यमान है। यदि कहीं भी
लोहलेख्यत्व और पार्थिवत्व के सम्बन्ध का ग्रह न हो, तो भ्रान्ति कैसे होगी ?
समर्थन—कार्यभेद से कारणभेद की कल्पना करेंगे और वह सार्वत्रिक सम्बन्ध से
अन्य ही मानेंगे । खण्डन—वह कारण क्या इन्द्रिय का सहकारी है या स्वतन्त्र
(इन्द्रिय-निरपेक्ष) अन्य ही? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, क्योंकि इन्द्रियों को भावि-भूत के
सम्बन्धांश (व्याप्ति-अंश) में करण मानने में कोई प्रमाण नहीं है। इसके विपरीत

परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २५६
व्युपरतेन्द्रियव्यापारस्यापि विचारयतः पूर्वप्रतीतसम्बन्धधर्मिद्वयस्य व्याप्स्यव-
धारणदर्शनात् ।
तदाऽपि मनोऽस्तीन्द्रियमिति चेत् । अस्तु ; तस्मिन् कार्ये मनसः करणत्वे तु
प्रमाणाभावः, अवश्यपरिकल्पनीयेनान्येनैव सर्वानुपपत्त्युपशान्तेः । कारणत्वमात्रं
तु चक्षुरादिज्ञानवन्मनसस्तत्र स्यात् ।
चक्षुरादिवत्करणमन्यदेव तत्कल्पनीयमिति सप्तममिन्द्रियं प्रमाणान्तरं वा
प्रसज्येत । अन्यथा चाक्षुषादिप्रतीतावपि चक्षुरादेः करणत्वं न स्यात् । शक्यते
तत्रापि वक्तुं मन एव तत्र सुखादिप्रतीतिवत्करणम्, चक्षुरादयस्तु सहकारिमात्रम् ।
नापि द्वितीयः ; इन्द्रियान्तरप्रसङ्गात्, प्रमाणान्तरप्रसङ्गाद्वा ।
नापि विनाभाव एकस्य व्यतिरेकेणापरस्याव्यतिरेकः, तन्निषेधोऽविनाभाव
इन्द्रिय-व्यापार विरत होने पर भी 'वह्नि की व्याप्ति धूम में न हो, तो धूम और वह्नि का
भूयः सहदर्शन नहीं हो सकता' यह विचार करनेवाले मनुष्य को पूर्वप्रतीत परस्परसम्बद्ध
व्याप्य-व्यापक धर्मिद्वय का व्याप्तिग्रह (ज्ञान) देखा ही जाता है।
यदि कहें कि चक्षुरादि के उपरामकाल में भी मनरूप इन्द्रिय तो है ही, तो
वह भी युक्त नहीं। कारण चाक्षुषादि ज्ञान के तुल्य व्याप्तिग्रह में भी मन कारण तो है,
किन्तु अवश्य परिकल्पनीय सहकारी कारणों से ही सर्वदोषों की निवृत्ति होने से मन
को व्याप्तिग्रह में करण मानने में कोई प्रमाण नहीं है।
यदि कहें कि जैसे चाक्षुषादि ज्ञान में चक्षु करण है, वैसे ही व्याप्तिग्रह में भी
मन से अन्य ही कोई करण मानेंगे, तो वह भी ठीक नहीं। वैसी स्थिति में यदि आप
व्याप्तिग्रह को प्रत्यक्ष मानें, तो सप्तम इन्द्रिय हो जायगी और यदि परोक्ष मानें, तो
सप्तम प्रमाण हो जायगा, क्योंकि वह व्याप्यादिनिरपेक्ष होने से लिङ्गादि से विलक्षण
है। एवञ्च अपसिद्धान्त हो जायगा। अन्यथा यदि मन को ही करण मानें, तो चाक्षु-
षादिज्ञान में भी चक्षु करण न होगा। कारण कह सकते हैं कि मन ही सुखानुभव की
तरह चाक्षुष में भी करण है, चक्षु तो सहकारिमात्र है।
'वह कारण इन्द्रिय से निरपेक्ष अर्थात् स्वतन्त्र कारण है' यह द्वितीय पक्ष भी
ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो वह पूर्वोक्त रीति से सप्तम इन्द्रिय या सप्तम प्रमाण
हो जायगा।
'एक के व्यतिरेक से अपर का अव्यतिरेक विनाभाव है और उसका निषेध अवि-
नाभाव है' यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं। कारण ऐसा होने पर लोहलेख्यत्व