खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
अविद्याविद्यमानत्वे एव विश्रामात् । तत्रैवंविधरूपतानङ्गीकारे चाद्वैतस्यैव नामा-
न्तरकरणापत्तेः; ततस्तस्यां ज्ञेयज्ञानादिभेदावश्याभ्युपेयतया जगद्बाधयुक्तिकवला-
प्रवेशासम्भवात् ।
अद्वैते च द्वैताश्रयस्य बाधस्य वास्तवस्यानवकाशाद् अपारमार्थिकत्व-
संभावनाऽपि दूरत एवापसरतीति ।
ननु किमद्वैतपरमार्थताभ्युपगमेन समाहितं भवति ? यत उपजीव्यबाधादद्वैते
प्रमां श्रुतिर्जनयितुं न शक्नोतीति ब्रूमः । मैवम् ; अद्वैतं हि पारमार्थिकमिदं
पारमार्थिकेन भेदेन बाध्येत, न त्वविद्याविद्यमानेन । तस्मादविद्याव्यवस्थितं
भेदं तद्बोधं चोपजीवन्त्या न परमार्थाद्वैतबुद्धेरुपजीव्यबाधः ।
यदि श्रुतिजन्या भवन्त्यप्यद्वैतबुद्धिः अविद्याविद्यमाना, तथापि तद्विषय-
उचित ही है । यदि जलादि में अदृष्ट [ शीतादि से विलक्षण ] अनुष्णत्व का आप
साधन करें, तो नामान्तर से वह अद्वैत का ही साधन होने से हमारा ही इष्ट
सिद्ध हुआ । यदि जलादि दृष्टान्त में दृष्ट स्पर्श के सजातीय अनुष्णत्व का ही अनु-
मान करते हैं, तो वह दृश्य है । अतः उसमें ज्ञेय-ज्ञान का भेद अवश्य स्वीकार्य
होने से जगद्-बाधक ‘दृक्-दृश्यसम्बन्ध-खण्डन’ आदि युक्तियों के कवल (ग्रास) में
अनुष्णत्व का भी प्रवेश हो ही जायगा ।
प्रश्न—अद्वैत ( ब्रह्म ) भी श्रौत-बोध का विषय है ही । अतः उसमें भी मान-
मेय-व्यवहार होने से उसका भी जगद्-बाधक युक्तियों के कवल में प्रवेश क्यों
न हो ? उत्तर—अद्वैत स्व-प्रकाश है, उसमें मान-मेयभाव नहीं । अतः वह ( अद्वैत )
श्रौत-बोध का विषय नहीं, स्वरूप ही है । यद्यपि ब्रह्माद्वैत संस्कृत मन की वृत्ति
का विषय होता है, तथापि जब मन ही कल्पित है, तो वृत्ति कल्पित है ही । इस-
लिए अद्वैत में वास्तविक मान-मेयभाव होता ही नहीं ।
प्रश्न—अद्वैत पारमार्थिक है, यह मान लेने से क्या सिद्ध हुआ ? अर्थात् उससे शोक
की निवृत्ति या निरङ्कुश तृप्ति ही सिद्ध होती है । वह तृप्ति श्रौत-बोध से ही होती
है और वह बोध प्रमाता आदि के भेदरूप उपजीव्य के विरोध से बाधित है, अतः
उत्पन्न ही नहीं होगा । उत्तर—अद्वैत पारमार्थिक है; अतः वह पारमा-
र्थिक भेद का विरोधी है, अविद्याकल्पित भेद का नहीं । इसलिए अविद्याकल्पित भेद
या उस भेद के बोध की उपजीवक श्रुति से उपजीव्य का बाध नहीं है ।
प्रश्न—अद्वैत-बुद्धि भी अविद्या का ही कार्य है । अतः शुक्ति-रजत के तुल्य