सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ६५
ननु भेदमनङ्गीकुर्वतो भवतः कथं तत्तत्पदार्थवैचित्रीव्यवहारो न व्याहन्यते ?
कथं व्याहन्यते, प्रतिवध्यते हि तत् । किं च योऽयं त्वया व्याघात आपादनीयः,
सोऽपि कस्माच्चिदापादकात् । न च आपाद्यापादकमभिद्यमानमापत्त्यै प्रभवेदिति ।
तस्मात्—
'नानात्वमवलम्ब्यापि वदत्यद्वैतवादिनि ।
असिद्धभेदाद्व्याघातः पतेदापादकात् कुतः ॥'
अथ भेदखण्डनानुवादः
इदमपि च विचारमर्हति—यदद्वैतश्रुतीनां बाधकसमुपन्यस्यते प्रत्यक्षादिघट-
पटप्रभृतिभेदग्राहि, तदपि कीदृशमर्थे पर्यवस्यति ? तथाहि, प्रत्यक्षेण योऽसौ भेदो
गृह्यते स किं स्वरूपभेदः, किमन्योन्याभावः, किं वैधर्म्यम्, किमन्यदेव वा ?
जो सामान्य से ज्ञात अह, नहि विशेष से त ।
उनमें अद्वय-श्रुतिन का, रोध होत कस तात ॥
प्रश्न—पदार्थ की वैचित्री ( भेद ) का व्यवहार भी भेद के अङ्गीकार के बिना
नहीं हो सकता । अतः आप पद-पदार्थ का भेद अवश्य मानेंगे । तब तो
आप अभेदवादी को भेद और अभेद दोनों विरुद्ध धर्मों का स्वीकाररूप व्याघात हुआ ।
उत्तर—पद-पदार्थ की वैचित्री का व्यवहार अपारमार्थिक भेद से भी उपपन्न
है । अतः पारमार्थिक अभेद के साथ व्याघात नहीं होगा ।
किञ्च—व्याघात का भी आगे खण्डन करेंगे । फिर व्याघात आपाद्य है, अतः
भेदरूप आपादक कैसे होगा ? अभेदवादी के मत में आपाद्य-आपादक में अभेद
है । उसमें आत्माश्रय दोष होने से उपपाद्य-उपपादकभाव नहीं होता
और भेद तो है नहीं । फिर व्याघात कैसे होगा ?
परमारथ अद्वैत में, कैसे होवे तात ।
आपादक-आपाद्य में, भेद बिना व्याघात ॥
भेद-खण्डन का अनुवाद
यहाँ यह भी विचारना चाहिए कि जिन घट-पट आदि के भेदग्राही
प्रत्यक्ष आदि को अद्वैत-श्रुति का बाधक कहते हैं, वे प्रत्यक्षादि किस तरह के भेद को विषय
करते हैं—क्या स्वरूप भेद को ? अन्योन्याभाव को, वैधर्म्य को या इनसे अन्य
ही ( पृथक्त्व ) को ?
६