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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 610 में से

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पृष्ठ 75

६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
न च संस्कारारूढदृढान्वयव्यतिरेकान्वयव्यतिरेकान्वयप्रतिपत्त्युत्पत्तिप्रतिबन्धः
शक्यशङ्कः । यतः—
'अत्यन्तासत्यपि ज्ञानमर्थे शब्दः करोति हि ।
अबाधात्तु प्रमामत्र स्वतःप्रामाण्यनिश्चलाम् ॥
असंसर्गाग्रहस्यापि मन्ता शंसत्यबाधिते ।
अत्यन्ताऽसदसंसर्गाग्रहं संसर्गलयमक्रम् ॥
श्रुतिज बोध के बाध के बिना अनुपपन्न है । अतः भेद की अन्यथानुपपत्ति से श्रुतिज
बोध का बाध होगा ।
उत्तर—अन्यथानुपपत्ति भी ज्ञात होकर ही उपपादक होती है तथा च
अन्यथानुपपत्ति का ज्ञान ( उसका विषय भी ) और अन्यथानुपपत्ति इन दोनों
के अभेद के बाध के बिना भी घट-पटभेद उपपन्न है । अतः वह उन दोनों के अभेद
को नहीं बाधेगा । तब श्रुति उन दोनों के अभेद में ही अवकाश प क्रम से सर्वा-
भेद का बोध करा देगी ।
अनुपपत्ति जो भेद की, ज्ञान-भेद बिनु मित्र ।
वह भी चाहत ज्ञान निज, बाधक सहि श्रुति-मित्र ॥
प्रश्न—सब मनुष्यों के बार-बार ज्ञान से स्थिर संस्कार का विषय,
अतएव दृढान्वय ( दृढपद=बाधितुमशक्य ) जो भेद, उसका जो अन्वय-व्यतिरेक
अर्थात् 'घटाद् भिन्नः पटः' अथवा 'नीलाद् अभिन्नः पटः' इत्याका उससे
जो अन्वय ( अभेद ) की प्रतिपत्ति ( अयोग्यता का ज्ञान ) उससे श्रुतिज अद्वैत-बोध
की उत्पत्ति का प्रतिबन्ध क्यों नहीं ?
उत्तर—'अङ्गुल्यग्रे करिशतं विहरति', 'मम कर्णकुहरं प्रविश्यः सिंहः क्रीडति'
इत्यादि वाक्यों से अत्यन्त असत् अर्थ का भी बोध अनुभवसिद्ध है । अतः शाब्दबोध
में न तो योग्यता का ज्ञान कारण है और न अयोग्यता-ज्ञान प्रतिबन्धक ही है । किन्तु
बाध होने के पश्चात् स्वतःप्रामाण्य का निश्चय होता है । 'एकमेवा-द्वितीयम्'
इस श्रौतस्थल में प्रत्यक्षादि-बाध का निरास तो पहले कर ही चुके हैं। अतः स्वतः-
प्रामाण्य सिद्ध हुआ । असंसर्गाग्रह के माननेवाले मीमांसक भी अबाधस्थल में संसर्ग-
का ज्ञान ही मानते हैं । प्रकृत में प्रत्यक्षादि-बाध का निरास हो चुका है,
अतः संसर्ग का ग्रह सर्वसम्मत है ।