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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 610 में से

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पृष्ठ 585

परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५६३
मन्यस्मिन्नपि तत्र तत्र दर्शनात्कथं न व्याप्तिभङ्गः । कश्च विशेषो यद्व्यतिरेको
विशेषणमुपादीयेत ।
तत्र तत्राविरोधान्नैवमिति चेत् । न ; अन्यत्र तथाभावादर्शनस्य विरोधाभ्युपगम-
मूलस्याविशेषात् । तत्र तत्र तथात्वे प्रमाणसद्भाव एव विशेष इति चेत् ;
तर्हि सर्वत्रानभ्युपगममूलं तथात्वे प्रमाणाभाव एवोपजीव्यो दूषणमिष्यताम्,
कृतमन्योन्याश्रयेण व्यभिचरितदोषत्वेनेति ।
चक्रकेऽपि 'दुःखजन्मादि'सूत्रोक्तादिषु व्यभिचारदर्शनादव्याप्तिः, विशेषव्यति-
है, अतः वहाँ अन्योन्याश्रय को आभास मानते हैं । किन्तु उक्त शब्दादि-स्थलोंमें
व्यक्ति-भेदरूप विशेष भी नहीं है । फिर क्या विशेष है, जिसके होने से अन्योन्या-
श्रय का आभासत्व तथा उस विशेष का अभाव लक्षण-घटक करके अन्योन्याश्रय के
अनाभासत्व की व्यवस्था हो ?
समर्थन—अन्त्य-उपान्त्य शब्द-स्थल में परस्पराश्रयत्व में विरोध नहीं है और
प्रतियोगी तथा भेदस्थल में परस्पराश्रयत्व में विरोध है । अतः अन्योन्याश्रय में विरोध
तथा अविरोध ही विशेष है । खण्डन—विरोध के स्वीकार ( विरोध की अदोषता )
का मूल विरोध का अदर्शन है । प्रतियोगी और भेदस्थल में भी उसमें कोई विशेष
नहीं है । अर्थात् अन्त्य-उपान्त्य शब्दस्थल में ( परस्पराश्रित प्रतीति होने से )
परस्पराश्रय में विरोध का दर्शन नहीं होता । एवञ्च वहाँ भी विरोध की अदोषता
माननी चाहिए ।
समर्थन—अन्त्य-उपान्त्य शब्दादि-स्थल में अन्योन्याश्रय को अनाभास मानने में
प्रमाण का सद्भाव ही विशेष है । खण्डन—तब तो सर्वत्र अन्योन्याश्रय को दोष
मानने का कारण प्रमाण का अभाव ही हुआ । अतः उपजीव्य होने से प्रमाणाभाव को
ही दोष मानिये; जिसमें दोषत्व व्यभिचरित है, ऐसे अन्योन्याश्रय को दोष मानना
व्यर्थ है ।
चक्रक का भी 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः'
इस न्यायसूत्रोक्त दुःखादि में व्यवधानेन परस्पर जन्यजनकभाव होने से व्यभिचार
है, अतः लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि 'अन्य जन्मव्यक्ति अन्य
दुःखव्यक्ति की जनिका है । इसी तरह व्यवधान से वह अन्य दुःखव्यक्ति से
जन्य है, अतः व्यक्तिभेद चक्रक के आभासत्व का तथा उसका अभाव चक्रक के