खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५६१
स्वभावविरुद्धोपजीविनी च विरुद्धान्तरे तद्व्याघातनिरासादेव निरस्तप्राये ।
'गौर्महिषः ततो न भवति, अगवात्मतानियता यतो महिषात्मता' इति, एष हि
तयोर्विरोधः ।
अनवस्था तु यथा—सत्तायामपि सत्तान्तरमित्यनवधौ सत्ताप्रवाहे इष्य-
माणे । तत्र कथं प्रत्यवस्थेयम् ? न तावत् 'यदि सत्तायां सत्ता स्यात्तदा न
विश्रान्तिः स्यादि'ति ; सत्तायां सत्ताभ्युपगमस्य विश्रान्त्यभावेन सह व्याप्तिसिद्धय-
सिद्धयोर्दोषग्रस्तत्वात्
प्रतिबन्दी च खण्डितैव ।
किञ्च—प्रमेयत्वाभिधेयत्वव्यवहार्यत्वसन्निकर्षवत्त्वाभावप्रतियोगित्वादीना-
मात्माश्रितत्वदर्शनात् कथमात्माश्रयताखण्डिका व्याप्तिः सव्यभिचारा न स्यात् ।
में व्याप्य-व्यापकभाव या उद्देश्य-विधेयभाव नहीं होता । एवञ्च शिथिल-मूल होने से
व्याघात भी तर्क नहीं, तर्काभास है ।
स्वभाव से ही विरुद्ध सत् और असत् का उपजीवन करनेवाले अन्य विरुद्ध तो
सत्-असत् के व्याघात के खण्डन से ही खण्डितप्राय हैं । जैसे—'गौर्महिषः' यह
व्याघात भी इसी रीति से प्रवृत्त होता है कि 'यतः अगवात्मता से नियत महिषात्मता
है, अतः गौ महिष नहीं है।' एवञ्च—'गौर्महिषः' इस व्याघात का भी 'अमहिषः
महिषः' इस सत्-असत् के व्याघात में ही पर्यवसान जानना चाहिए ।
सत्ता में सत्ता का निरवधि प्रवाह माना जाय, तो अनवस्था हो जाती है । किन्तु उसमें
भी अनिष्ट का आपादन कैसे होगा ? 'यदि सत्ता में सत्ता हो, तो कहीं विश्रान्ति नहीं
होगी' इस प्रकार आपादन तो हो नहीं सकता । कारण यदि सत्ता में सत्ता के अभ्यु-
पगमरूप आपादक और विश्रान्तिरूप आपाद्य की व्याप्ति को प्रमित मानें, तो प्रमित
होने से ही वह अनवस्था दोष नहीं है । यदि वह अप्रमित है, तो प्रमाण न होने से
उसका आपादन ही नहीं होगा ।
प्रतिबन्दी का खण्डन द्वितीय परिच्छेद में निग्रहस्थान-खण्डन के प्रसंग में ही
हो चुका है ।
किञ्च—प्रमेयत्व अभिधेयत्व ( वाच्यत्व ), व्यवहार्यत्व, सन्निकर्षवत्त्व, भेदप्रतियो-
गित्व आदि धर्म आत्माश्रित देखे जाते हैं । फिर आत्माश्रय का खण्डन करनेवाली
व्याप्ति में व्यभिचार क्यों न हो ?
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