खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 580, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें५५८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थे
स्वयमपि प्रसङ्गमूलस्य व्याप्तेरिष्टतया प्रसञ्जितनिषेधे तद्व्यतिरेकप्रामाणिकत्वस्य
अवश्यमन्तव्यत्वापत्तेः ।
अत एव 'एतदन्यत्स्यादि'त्यपि न शक्यप्रसञ्जनम्, एतदन्यत्वस्य एतत्स्वरूप-
भेदमादायैव प्रतीतिपर्यवसायितया प्रसङ्गे व्याघातादेव । विपर्ययोऽप्येतद्विशेषिता-
न्यविशेषितान्यत्वविधायिनो विशेषणविशेषणताप्रविष्टमात्मानमात्मनि विधीयमानं
न क्षमते ; एतदनन्यत्वस्यैतदन्यान्यत्वस्यैतत्त्वादेव अन्यत्वावधेरात्मन उपलक्षणत्वे
चान्यत्वमात्रमुपलक्ष्यमाणमन्यस्मादपि अन्यत्वमादाय पर्यवस्येत् ।
स्वरूपत एव विलक्षणमन्यत्वविशेषमवधिरात्मोपलक्षयतीति च न घटते ;
यतोऽन्यत्वमात्रमेवावधिविशेषैरुपधीयमानं तदन्यत्वप्रत्ययव्यवहारोपपादकं
व्यतिरेक-व्याप्ति की व्यापिका होती है और विपर्यय-पर्यवसान के बिना व्यतिरेक-व्याप्ति
का ग्रह नहीं होगा ।
समर्थन—'यदि आश्रयत्व और आश्रितत्व दोनों इसमें हों, तो यह इससे अन्य
हो जायगा' इस प्रकार आत्माश्रय का आपादन करें, तो कोई हानि नहीं है । खंडन—
आपादन का यह प्रकार भी युक्त नहीं; कारण 'एतदन्यत्व' का भी एतत्-स्वरूप के
भेद में ही पर्यवसान होने से 'एतत् एतदन्यत् स्यात्' इस प्रकार के प्रसङ्ग में भी
धर्मी और आपाद्य में व्याघात पूर्ववत् ही है । इसी तरह इस प्रसंग का विपर्यय में
पर्यवसान भी नहीं बन सकता; कारण 'एतत् एतदन्यत् न' इत्याकारक प्रसंग का एतत्
में एतदन्यान्यत्व का विधान करनेवाला विपर्यय विशेषण ( एतद्विशेषितान्यत्व ) के
विशेषणरूप से प्रविष्ट स्वात्मा ( एतत्त्व ) के भी विधीयमानत्व को सह नहीं सकता ।
कारण एतदनन्यत्व और एतदन्यान्यत्व दोनों ( उद्देश्य-विधेय ) एतत्स्वरूप ही हैं ।
समर्थन—'एतत् एतदन्यत् न भवति' इस विपर्यय में अन्यत्व में एतत्त्व यदि
विशेषण होता, तब तो उक्त कथन युक्त न होता । किन्तु एतत्त्व उपलक्षण है, अतः उक्त
कथन युक्त ही है । खण्डन—यदि एतद् के अर्थ घट को अन्यत्व में उपलक्षण मानें,
तो उद्देश्य घट में पट से अन्यत्व होने से फिर भी 'एतत् अन्यत् न' इस प्रकार
विपर्यय में पर्यवसान न होगा ।
समर्थन—एतत् अन्यत्वमात्र का उपलक्षण नहीं, किन्तु अन्यत्व-विशेष अर्थात्
वस्प्रतियोगिक भेद का उपलक्षण है । एवञ्च स्वप्रतियोगिक अन्यत्व का अन्यत्व
एतत्-पदवाच्य उद्देश्य में होने से विपर्यय में पर्यवसान हो ही जायगा । खण्डन—