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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 578, कुल 610 में से

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पृष्ठ 578

५५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
सिते त्रयोपेयेते, तदा भेदः स्यादित्याकारेण आपादने नोक्तदोषापत्तिरिति ।
मैवम् ; एकत्र द्वयस्यापि दृष्टत्वात् ।
तदाश्रयत्वं तदाश्रितत्वं च मिथो भेदनियमितमिति चेन्न । तन्मिथः-
शब्दाभ्यां क्षारीकृतत्वात् ।
एतदाश्रयत्वादेतदाश्रितत्वाद्वा नैकत्वं स्यादिति वचनभङ्ग्या आपाद्यमिति
चेत् । मैवम्; यद्येतदेतदाश्रयादि स्यात्तदैतन्न स्यादिति हथापाद्यम्। न
चैतद्युक्तम्, धर्म्यापाद्ययोर्व्याहतत्वात् ।
की गुंजाइश हो । प्रत्युत यहाँ का आपादन-प्रकार यह है—'यह जो आश्रयत्व और
आश्रितत्व है, वह भेद में देखा गया है, यदि उसे आप विवाद-विषय में भी मानें
तो भेद हो जायगा।' इस प्रकार आत्माश्रय का आपादन करने पर उक्त दोष नहीं
होगा । खंडन—एक ही घट में रूप की अपेक्षा आश्रयत्व और भूतल की अपेक्षा
आश्रितत्व दोनों का समावेश होने से उक्त प्रकार से भी आपादन नहीं हो सकता ।
समर्थन—'तदाश्रयत्व और तदाश्रितत्व भेद से नियत हैं, अर्थात् दोनों के
अधिकरण भिन्न ही रहेंगे; अतः यदि वे विवाद-विषय में हों, तो भेद हो जायगा'
इस प्रकार आपादन करने पर उक्त घटस्थल में व्यभिचार नहीं होगा । खंडन—यह
कथन भी लक्षण में 'तत्' और 'मिथः' शब्दों का प्रवेश होने से खण्डित है । अर्थात्
आत्माश्रयस्थलीय वस्तुमात्र में अनुगतरूप कोई धर्म नहीं है, जिसके कारण वस्तुमात्र
को तद्शब्द से कहें। यदि कथञ्चित् कहें भी, तो उक्त घटस्थल में व्यभिचार तदवस्थ
ही है। यदि तद्-शब्द को एकव्यक्तिपरक मानें, तो लक्षण का अनुगम नहीं होगा ।
इसी प्रकार मिथः-शब्द को यदि परस्परमात्राभिधायक मानें, तो इष्टापत्ति होगी;
कारण हम घट-पटादि का परस्पर भेद मानते ही हैं। यदि विशेषाभिधायक मानें, तो
अननुगम हो जायगा।
समर्थन—'यदि इसमें एतदाश्रयत्व और एतदाश्रितत्व दोनों हों, तो एकत्व न
होगा' इस प्रकार आपादन करेंगे । अर्थात् 'तद्' या 'एतद्' शब्द एकव्यक्तिपरक ही
हैं और लक्ष्यभेद से लक्षण का भेद इष्ट ही है। लक्षण-भेद होने पर भी लक्ष्य-
ज्ञानरूप लक्षण का प्रयोजन सिद्ध हो ही जाता है । खंडन—इस तरह तो आपके
आपादन का आकार यह हुआ—'यदि एतत् एतदाश्रय हो, तो एतत् न होगा।'
किन्तु वह युक्त नहीं, कारण 'एतत् एतत् न होगा' इस कथन में धर्मी (एतत्) और
आपाद्य या विधेय (एतद् न) दोनों में व्याघात हो जायगा।