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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 576, कुल 610 में से

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पृष्ठ 576

५५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [चतुर्थ
भेदस्याऽऽनन्त्ये, प्राग्लोपादिदोषात् । तामेतामूर्ध्वं धावन्तीमनवस्थामाचक्षते ।
प्रतिबन्द्या विशेषात् । यथा—धूमानुमानेऽप्युपाधिशङ्काप्रतिबन्द्यां
तर्कानुकूलत्वादिति ।
तदेषामापादनानि तर्काभासाः कथमुक्तलक्षणेन न सङ्ग्राह्याः, सत्यपि
व्याप्याद्यदोषे प्रसङ्गस्थानगतेन तेन तेन विशेषेणाऽऽभासीभूतत्वात् ।
प्रसङ्गस्थाने तावतां विशेषाणामभावेनापि लक्षणं विशेषणीयमिति चेन्न ।
भेदगत भेद की अपेक्षा नहीं होती। यदि उसकी अपेक्षा मानें, तो 'प्राग्लोप, विनि-
गमनाविरह और प्रमाणाभाव हो जायगा। पण्डित लोग इस अनवस्था को ऊपर
की ओर दौड़नेवाली अनवस्था कहते हैं।
प्रतिबन्दी भी एक पक्ष में अनुकूल तर्क रहा, तो आभास हो जाती है। जैसे 'शब्दः
अनित्यः कृतकत्वात्' यह अनुमिति [ उपाधि-शङ्का होने से मीमांसक के मत में ]
सन्दिग्धोपाधि है। यदि नैयायिक यहां 'यदि संदिग्धोपाधित्वं स्यात्तदा धूमानुमितावपि
स्यात्' इस प्रकार प्रतिबन्दी दे, तो मीमांसक कह सकता है कि धूमानुमिति में
कार्य-कारणभावरूप विशेष (तर्क) है, अतः यह प्रतिबन्दी आभास है।
इन आत्माश्रय आदि के आभासों में उक्त तर्कलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी।
'जो वस्तु है, वह स्वाश्रय नहीं है और परस्परापत्तिसिद्धिक भी नहीं है' इत्यादि व्याप्ति
होने से ये सब तर्क ही हैं", ऐसा भी नहीं कह सकते। कारण सम्बन्ध, द्वारभेद आदि
तत्-तत् विशेष से उनके आभासत्व का प्रतिपादन हम पीछे कर ही आये हैं।
समर्थन—'आभासत्व के कारण उन सभी विशेषों का जहां अभाव हो, वहाँ
आरोपित व्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है' ऐसा निवेश करने पर उक्त आभास-
स्थलों में अतिव्याप्ति नहीं होगी। खण्डन—यदि ऐसा निवेश करें, तो अन्योन्याश्रय
अथवा चक्रक में आत्माश्रय के आभासत्व का प्रयोजक सम्बन्ध, द्वारभेद ही है, उसका
१. अवश्य-क्लृप्त वस्तु के स्वीकार से ही काम चल जाने पर अक्लृप्त वस्तु का अस्वीकार
ही 'प्राग्लोप' है। एक कालमें सम्बद्ध अनेक पदार्थों के निर्वाहा-निर्वाहकभावरूप सम्बन्ध का
अनिश्चय ही यहाँ विनिगमनाविरहरूप से विवक्षित है। एक ही पदार्थ में पारस्परिक निर्वाहकत्व
संभव होने पर अनेक पदार्थों की कल्पना का अभाव प्रमाणापगम है। यह विषय प्रत्यक्षादि-
बाधोद्धार-प्रकरण में 'प्राग्लोपाविनिगम्यत्वं' इस कारिका ( १६ ) में विशेष रूप से
विवेचित है।