खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थ
सायितर्कता निरस्येति निरस्तम् । परमार्थतो व्याप्त्यभावेऽपि पराभ्युपगम-
मादाय प्रसङ्गप्रवृत्तेरुपपत्तेः ।
कथं हि परेण व्याप्यतयाऽनुमतात्तं प्रति व्यापकानुमत्या नाऽऽपतितव्यम् ।
नहि प्रसङ्गो वास्तवत्वं व्याप्तेरवलम्बते । किं नाम ? अभ्युपगममात्रम् ।
अनभ्युपगतौ वस्तुगत्या स्थितेनापि तेनाऽऽपादनाप्रवृत्तेः । अत एव परस्य
प्रमाणेन व्याप्यानुमितिमृत्पाद्याप्यापादनं क्रियते ।
वस्तुगत्या व्याप्यत्वं तथात्वेनाभ्युपगतत्वं च द्वयमपि प्रसङ्गस्याङ्कमिति चेन्न ।
तथात्वेनाभ्युपगमस्यावश्यं प्रसङ्गाङ्गतया मन्तव्यस्य परानपेक्षस्यैव समर्थत्वे
वास्तवव्याप्तत्वस्यापि प्रवेशने प्रमाणाभावात् ।
तस्माद्यः प्रसङ्गः स्वपक्षसिद्ध्यङ्गं तस्य विपर्ययापर्यवसायिता दोषायैव
स्यात् । प्रसङ्गस्य तस्य विपर्ययपर्यवसानदार्ढ्यार्थं दण्डतयोपन्यासात् ,
पर के अभ्युपगममात्र से यदि अनिष्ट का प्रसङ्ग हो, तो उसे अलक्ष्य मानना
अयुक्त है ।
जब उक्त स्थल में पर व्याप्य का अभ्युपगम करता है, तब उसके प्रति
व्यापक का भी आपादन क्यों न हो ? कारण प्रसङ्ग व्याप्ति के वास्तवत्व की अपेक्षा
नहीं करता, किन्तु व्याप्ति के अभ्युपगममात्र की अपेक्षा करता है । यदि
व्याप्ति का अभ्युपगम न हो, तो वस्तुस्थित व्याप्ति से भी प्रसङ्ग नहीं होता । अत-
एव जहाँ वादी विशिष्ट व्याप्ति को नहीं मानता, वहाँ भी पर के प्रति व्याप्य की अनु-
मिति कराकर व्यापक का आपादन किया जाता है ।
समर्थन—वस्तुतः व्याप्ति और व्याप्ति का अभ्युपगम दोनों प्रसङ्ग के कारण
हैं। अतः जहां वस्तुतः व्याप्ति नहीं है, वहां विरोधमात्र है, प्रसङ्ग नहीं ।
खंडन—व्याप्यत्वरूपेण व्याप्य के अभ्युपगम को प्रसंग का आवश्यक अंग ( कारण )
मान लेने पर तो वह इतर की अपेक्षा के बिना भी प्रसंग-करण में समर्थ हो सकता
है । फिर वास्तव व्याप्ति को भी प्रसंग का कारण मानने में कोई प्रमाण नहीं है ।
तस्मात् जो प्रसङ्ग स्वपक्षसिद्धि का अङ्ग है, उसकी विपर्यय में अपर्यवसायिता दोष
ही होगा । कारण उसका उपन्यास विपर्यय में पर्यवसानरूप स्वपक्ष की दृढता के लिए
विपक्ष के बाधनाथं दण्डरूप से ही होता है । जैसे—बौद्धों के मत में सत्त्व में क्षणिकत्व
की व्याप्ति के साधनार्थ, 'सत्त्व रहे, पर क्षणिकत्व न रहे' यह व्यभिचार-शङ्का होने पर