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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 564

५४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
अभावान्तरेऽपि सावकाशत्वात् न परस्परप्रतिषेधात्मकत्वम् । परस्परप्रति-
षेधात्मकत्वं हि भावात्यन्ताभावयोरेव ।
तत्तदसत्त्वमात्रयोर्विरोधो न तु तत्तदसत्त्वविशेषयोरिति चेन्न । विशेषस्य
तथाप्यविरोधात् कदाऽपि सहावस्थितियोग्यतापत्तेः । नियमेन तथात्वे च
विरोधव्याघातात् ।
मात्रशब्देन च यदि विशेषशून्यत्वमसत्त्वस्योच्यते तदा तदनभ्युपगम एव
प्रमाणाभावात् । नहि निर्विशेषासत्त्वमात्रसद्भावे प्रमाणमभिधातुं शक्यते ।
अथ मात्रशब्दोपादानं सत्यपि विशेषेऽसत्त्वस्य साधारणरूपपुरस्कारेण विरोध-
व्यवस्थितिप्रदर्शनार्थं तदा भावप्रध्वंसयोस्तादृगेव दोषापत्तिः । प्रध्वंसादौ विशेषे
सामान्यरूपस्यावश्याभ्युपगम्यत्वात् तदादायैव विशेषे विरोधपर्यवसानात् ।
किञ्च—घट और तत्प्रागभाव तथा घट और तत्प्रध्वंसाभाव परस्पर निषेधरूप भी
नहीं हैं; कारण घट ध्वंसाभाव का निषेधरूप भी है तथा घटप्रागभाव भी घटध्वंस
का निषेधरूप है ।
समर्थन—केवल भाव और सामान्यतः अभाव का विरोध है, भाव और विशेषरूप
से अभाव का विरोध नहीं है । खण्डन—ऐसा मानने पर विशेष प्रागभावादि के साथ
अविरोध होने से कदाचित् सह-अवस्थिति हो जायगी । यदि कहें, 'घट तत्प्रागभाव तथा
घट तत्प्रध्वंस का स्वभाव है कि वे नियम से साथ नहीं रहते, तो 'इनमें विरोध नहीं
है' इस कथन से व्याघात हो जायगा ।
किञ्च—यदि मात्रशब्दार्थ के बल पर सामान्य में विशेषशून्यत्व का प्रतिपादन
करें, तो प्रमाण न होने से सामान्य असत्त्व का अभाव हो जायगा । कारण निर्विशेष
सामान्य को असत्त्व में प्रमाण कह ही नहीं सकते ।
यदि मात्रशब्द का उपादान, विशेष के होने पर भी असत्त्व का सामान्यधर्म के
पुरस्कार से विरोध-प्रदर्शन करने के लिए है, तो भाव और प्रध्वंस का भी सामान्य-
रूपेण विरोध होने से अधिकरण का भेद हो जायगा । कारण प्रध्वंस आदि विशेषों में
सामान्यरूप अवश्य होने के कारण उसी सामान्यरूप का ग्रहण कर विशेष
(प्रध्वंसादि) में विरोध का पर्यवसान हो जायगा ।