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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 610 में से

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पृष्ठ 553

परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५३१
न च द्वितीयः ; धर्मिस्वरूपादेरपि तद्विषयतया संशयितत्वप्रसङ्गात् । न चैवं
'न ह्ययं स्थाणुर्वा पुरुषो वे'ति संशये सति इदमा परामृश्यमानस्य ऊर्ध्वत्वशालिनो
धर्मिणः स्वरूपसत्त्वेऽपि स्वरूपमेव भवति न वेति तद्द्रष्टुरभिमानो व्यवहारो वा,
किं नाम ? तत्र स्वरूपसत्त्वमात्रांशावलम्बिनस्तस्य ज्ञानस्य निश्चयत्वमेव । ततः
किमिति चेत् , एकस्यैव ज्ञानस्य निश्चयत्वसंशयत्वजातिसङ्करः ।
स प्रामाण्याप्रामाण्यवद् भविष्यतीति चेन्न । अत एव हि तयोरपि जातित्वा-
नङ्गीकारः । किं नाम ? तथाभूतातथाभूतार्थतालक्षणोपाधिद्वयरूपताङ्गीकार एव
तयोः । यदा च संशयत्वनिश्चयत्वलक्षणजातिद्वयसम्भिन्नं तद्विज्ञानमास्थीयते तदा
कञ्चिद्विषयमपेक्ष्य संशयत्वं कञ्चिदपेक्ष्य निश्चयत्वमित्यापेक्षिकी जातिव्यव-
स्थितिरित्यपूर्वः पन्थाः । ईदृशस्य पथः पान्थेनापि भवता किं नियामकमभिधेयम्,
येन धर्मिणि तस्य निश्चयत्वं व्यवतिष्ठते, विशेषद्वये च संशयत्वम् ।
'संशय में संशयत्व जाति अनुभवसिद्ध है, उसीसे संशय में निश्चय से भेद है'
यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है । कारण संशयत्व जाति को भेदक मानें, तो धर्मी भी
उसका विषय होने से उस अंश में भी वह ज्ञान संशय हो जायगा । किन्तु धर्मी-
अंश में वह ज्ञान संशय नहीं है, कारण 'स्थाणु है या पुरुष' इस संशय-काल में 'इदम्'
शब्द से परामृष्ट ऊर्ध्वत्वशाली धर्मी के स्वरूपसत्त्व में 'स्वरूप है या नहीं' ऐसा
अभिमान या व्यवहार किसीको नहीं होता, किन्तु स्वरूप-अंश में वह ज्ञान निश्चय
ही है । यदि कहें, धर्मी-अंश में उक्त ज्ञान का निश्चय होने से क्या हुआ ? तो यह
हुआ कि एक ज्ञान में निश्चयत्व और संशयत्व दोनों जातियों का सङ्कर हो जाने से
संशयत्व जाति ही सिद्ध नहीं हुई ।
यदि कहें कि गुण-जाति में संकर-दोष नहीं होता, अतः प्रमात्व-अप्रमात्व के तुल्य
निश्चयत्व और संशयत्व दोनों का एक ही ज्ञान में संकर होने पर भी क्या हानि है, तो
वह भी ठीक नहीं । सङ्कर-दोष होने से ही प्रमात्व-अप्रमात्व को भी हम जाति नहीं मानते ।
किन्तु 'तथाभूतार्थत्व' तो प्रमात्व है और 'अतथाभूतार्थत्व' अप्रमात्वं है, ऐसा मानते
हैं । यदि एक ही ज्ञान में किसी विषय की अपेक्षा संशयत्व जाति और किसी विषय की
अपेक्षा निश्चयत्व जाति मानें, तो आपने यह आपेक्षिकी (आंशिकी) जाति-व्यवस्थारूप
अपूर्व मार्ग का स्वीकार किया । इस अपूर्व पथ के पथिक होकर भी आप किसे
नियामक कहेंगे, जिससे धर्मी-अंश में उस ज्ञान के निश्चयत्व और विशेषद्वय-अंश में
संशयत्व व्यवस्थित हो ।