खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 541, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५१६
एकस्य वृक्षलक्षणस्य कार्यस्य सामग्रीभेदे स्वरूपभेदापातात् । अननुगता-
याश्च वृक्षसामग्रीत्वे पृथग्वृक्षव्यक्तेः पृथक्शिंशपाव्यक्तेरुत्पत्त्यापत्तेरित्यादि
स्वयमूहनीयम् ।
वर्तमानत्वादि-लक्षण-खण्डनम्
नियमे च प्राक्कालीनतयाऽभिधीयमाने प्रागित्यस्य व्यवच्छेद्यौ वर्तमान-
भविष्यत्कालौ प्राक्कालश्च व्यवच्छेदको विवेचनीयः । न च तद्विवेचनं शक्यम् ।
वर्तमानादिबुद्धय एव स्वविषयवैचित्ये प्रमाणमिति चेन्न । तथाहि--वर्त-
करती है, यह कैसे हो सकता है ? अन्यथा ( यदि अपेक्षा करे तो ) जैसे दण्डमात्र
चक्र की अपेक्षा करने से सामग्री नहीं है, वैसे ही उक्त सामग्री भी अपेक्षा करनेमात्र से
सामग्री न कहलायेगी ।
फिर, यदि एक ही शिंशपारूप वृक्ष की उत्पत्ति में वृक्ष-सामग्री, शिंशपा-सामग्री
दोनों परस्पर निरपेक्ष समर्थ हों, तो एक ही कार्य का स्वरूप-भेद हो जाना चाहिए ।
कारण जब वृक्ष-सामग्री से पृथक् शिंशपा-सामग्री है, तब वृक्ष से पृथक् शिंशपा की
उत्पत्ति की आपत्ति क्यों न हो ? इस प्रकार के खण्डन की स्वयं भी ऊहा कर लेनी
चाहिए ।
वर्तमानत्वादि के लक्षणों का खण्डन
किञ्च—'प्राक्कालवृत्तित्वरूप सम्बन्ध से जो कार्य का व्यापक हो, वह कारण है'
इस लक्षण में प्रविष्ट व्यवच्छेदक ( इतरनिषेधक ) प्राक्काल तथा व्यवच्छेद्य
( निषेध्य ) वर्तमान और भविष्यत् काल के लक्षणों का भी विचार करना चाहिए । किन्तु
इनके लक्षणों का निश्चय नहीं हो सकता । अतः कारणत्व अनिर्वचनीय है।
समर्थन—वर्तमान काल, अतीत काल और भविष्यत् काल की बुद्धियाँ ही अपने-
अपने विषय वर्तमान आदि कालों के भेद में प्रमाण हैं । संडन—यह युक्त नहीं,
कारण जबतक इस बात का निश्चय न हो कि इन बुद्धियों के विषय क्या हैं, तब-
तक इन बुद्धियों के प्रामाण्य का ग्रह ही नहीं होगा । अर्थात् विषय के यथार्थत्व के
अधीन ही ज्ञान का प्रामाण्य है । अतः विषय के स्वरूप के ज्ञान के बिना ज्ञान में