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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 610 में से

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पृष्ठ 531

परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०६
कारणत्वं धर्मः कोऽपीति चेन्न । तत्सद्भावे प्रमाणस्य वाच्यत्वात् ।
क्वचित्प्रत्यक्षः सः, क्वचित् दृष्टानुमेय इति चेन्न । किं हि प्रति कारणतां
प्रत्यक्षमुलिखेत् ? न तावदनिर्लुंठितकार्यम् ; अप्रतीतेः, अन्वयव्यतिरेकादे-
र्व्यञ्जकस्य च विशेषं प्रत्येव सम्भवात् ।
नापि सामान्यतो घटादि प्रति; एवं विशेषतो घटाद्यनुत्पत्त्यापत्तेः । ताव-
न्मात्रात् विशेषोत्पत्ते र्विशेषेषु विनिगमना न स्यात् ।
प्रतिविशेषं चोत्पत्तेः प्राग्वर्तमानत्वादसन्निकर्षाद्यक्षविषयतानुपपत्तेः ।
समर्थन—कारणत्व कारणवृत्ति कोई ( विशेषरूप से अनिर्वचनीय ) धर्म है ।
अर्थात् कार्यतावच्छेदक और कारणतावच्छेदक से भिन्न पदार्थान्तर है । वह कारणत्व-
रूप अखण्डोपाधि से अनुगत कारणपद का शक्यतावच्छेदक है । खण्डन—उस
कारणत्व के सद्भाव में प्रमाण कहना होगा, पर कोई प्रमाण नहीं है ।
समर्थन—दण्डादि प्रत्यक्षपदार्थनिष्ठ कारणत्व तो प्रत्यक्ष ही है और परमाणु आदि
निष्ठ कारणत्व अनुमेय है । खंडन—कारणत्व को विषय करनेवाला प्रत्यक्ष केवल
( निष्प्रतियोगिक ) कारणत्व को विषय करता है अथवा कार्यत्व से युक्त ( सप्रति-
योगिक ) कारणत्व को ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है; क्योंकि केवल ( कार्यत्व से
अयुक्त ) कारणत्व की प्रतीति नहीं होती । किञ्च—प्रत्यक्ष का सहकारी अन्वय-व्यति-
रेक भी कार्य-विशेष से युक्त कारणत्व में ही रहता है, केवल कारणत्व में नहीं ।
द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि उक्त प्रतीति सामान्यतः कार्यत्वनिरूपित
कारणत्व का उल्लेख नहीं करती । अन्यथा प्रमाण न होने से घटादि विशेष कार्य
की कारणता ही सिद्ध नहीं होगी । फिर कारण न होने से घटादि विशेष व्यक्ति उत्पन्न
भी होंगे । यदि सामान्यतः कार्यत्व से निरूपित कारण से विशेष की उत्पत्ति मानें, तो
वह उत्पत्स्यमान घटादि इसी दण्ड से जन्य है, ऐसा निश्चय नहीं होगा । अतः विशेष
घट के जननार्थ कारण-विशेष में प्रवृत्ति नहीं होगी ।
यदि कहें कि कार्य-विशेष से निरूपित कारणता का उल्लेख प्रत्यक्ष करता है,
तो यह विकल्प होता है कि उत्पत्ति से पूर्वकाल में उक्त कारणता का ज्ञान होता है
या उत्पत्ति से उत्तरकाल में ? यदि कहें कि उत्पत्ति से पूर्वकाल में, तो उस काल में
कार्य है नहीं, अतः कार्यत्वनिरूपित कारणत्वरूप विशिष्ट न होने से—विषय-सन्निकर्ष