खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 527, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०५
जनकत्वं वा ? नाद्यः ; यागादेरकारणत्वप्रसङ्गात् । नोत्तरः ; तस्यैव निरूप्य-
माणत्वात् ।
नित्यसत्त्वासत्त्वयोरन्यतरप्रसक्तिनिवारकत्वमिति चेन्न । निवारकपदाव-
यवस्य प्रत्ययस्य कारणत्वनिर्वचनं विनाऽनिरूप्यमाणार्थत्वात् । अन्यतरार्थ-
स्यैकस्य च निरुक्त्यशक्तेः ।
यदनभ्युपगमे यस्य तत्पूर्वसत्त्वप्रसङ्गः, तत्तस्य कारणम् , तद्भावश्च कारणत्व-
मिति चेन्न । भावस्य विनाशित्वानभ्युपगमे तथा प्रसङ्गेनातिव्यापकत्वात् ।
तत्पूर्वस्थितत्वेन च विशेषणे सहभावनियतस्याभावेऽपि प्रसङ्गः । तथात्वो-
क्या है ? क्या व्यापार का समवाय जिसमें हो, वह विवक्षित है या व्यापार का जनक
जो हो वह ? प्रथम पक्ष में याग में अपूर्वरूप व्यापार का समवाय न होने से वह
कारण न होगा । द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि तब तो कारणत्व के लक्षण में
जनकत्व ( कारणत्व ) का प्रवेश हो गया और वह अद्यापि निरूप्य ही है।
समर्थन—‘कार्य का जो नित्य सत्त्व या नित्य असत्त्व, दोनों में एक की प्रसक्ति
का निवारक ( निवृत्तिजनक ) कारण है’ ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—यह लक्षण भी
कारण-लक्षण में कारण का प्रवेश होने से अयुक्त है। क्योंकि ‘निवारक’ पद में ल्युट्
प्रत्यय का अर्थ कर्ता ( कारणविशेष ) है, जो कारणत्व के निर्वचन के बिना अनिरूप्य
है । किञ्च—‘अन्यतर’ शब्द का अर्थ यदि अनिर्धारित प्रत्येक, यह करें तो वह भी
असंगत है । कारण अनिर्धारित से ‘निर्धारण का अभाव’ विवक्षित हो, तो अभाव के
खण्डित होने से वह सम्भव नहीं । यदि ‘दोनों से जो अन्य, उससे अन्यत्व’ यह अर्थ
करें तो भेद खण्डित होने से वह भी नहीं कह सकते ।
समर्थन—जिसके ( कारण के ) अस्वीकार करने पर स्व ( कार्य ) से पूर्वकाल
में जिसकी ( कार्य की ) सत्ता की आपत्ति हो, वह उसका कारण है’ ऐसा लक्षण
करेंगे । खण्डन—यदि ऐसा कहें, तो ‘भाव विनाशयुक्त न होता, तो स्व से पूर्वकाल
में होता’ ऐसी आपत्ति संभव होने से विनाश भी कारण हो जायगा ।
समर्थन—‘जिस पूर्ववर्ती के अनभ्युपगम में कार्य के पूर्वकाल में सत्त्व की आपत्ति
हो, वह कारण है’ ऐसा कहेंगे। अर्थात् ‘कार्यपूर्वसत्त्वे सति कार्यपूर्वसत्त्वापादकान-
भ्युपगमविषयत्वं कारणत्वम्’ यह कहेंगे । एवञ्च विनाश पूर्वभावी नहीं है, अतः वह
कारण नहीं हो सकेगा । खंडन—सहभाव से नियत रूपादि का प्रागभाव भी रस का
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