खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
प्रतीतिकलहानवकाशात् । भवति हि यद्यथा तत्र दृष्टम्, तत् किमेकमनेकं वेत्य-
न्युक्तो नायं विशेषो मया शङ्कितो जिज्ञासितो वा । स्वरूपमात्रन्तु प्रतीत्याह-
मुदासीनोऽभूवमित्यभिधत्त इति ।
ननु तदपि स्वरूपं भेद एव कस्मादपि, तत् कथमुक्तदोषावतार इति । मैवम्;
एवं हि ताद्रूप्येणाप्रतीताविति व्यर्थं स्यात् । प्रतीतिमात्रं लक्षणं वक्तव्यम् । यत्प्रमेयं
तत् कस्मादप्यवश्यं भिन्नमिति एकस्यैव स्वस्माद्भेदप्रसङ्गनिराकरणार्थमपि ताद्रू-
प्येणाप्रतीतावित्युक्तम्, तच्च खण्डितमिति ।
ताद्रूप्यमन्यरूपत्वं विवक्षितमिति चेन्न । तदा हि तदाऽनुपस्थापितपरामर्श-
होने पर 'इस विशेष विषय में मुझे न तो शङ्का हुई, न जिज्ञासा, केवल स्वरूप को
देखकर ही मैं उदासीन हो गया था' ऐसा उत्तर कहा जाता है ।
समर्थन—वह भी स्वरूप किसीसे भिन्न ही है, अतः लक्ष्य होने से लक्षण का
जाना भूषण ही है। खण्डन — यदि ऐसा है, तो प्रतीतिमात्र को ही लक्षण कहिये ।
ताद्रूप्य से अप्रतीति विशेषण व्यर्थ है, कारण जो प्रमेय है, वह अवश्य किसीसे भिन्न
है, अतः प्रमेयमात्र लक्ष्य ही है। स्व से स्व में भेद-व्यवहार न हो, इसीलिए
ताद्रूप्य से अप्रतीति यह विशेषण है, पर वह उक्त दोष से खण्डित ही है।
समर्थन—लक्षण-घटक ताद्रूप्य के एकदेश तद्रूपशब्द से स्वरूप-भेद से अन्य
का परामर्श होने से 'स्वरूप-भेद से अन्यत्वरूप से अप्रतीति-काल में जो प्रतीति, वह
स्वरूपरूप भेद है,' ऐसा कहेंगे। खण्डन— इस लक्षण के घटक 'अन्य' शब्द से यदि
स्वरूपभेद का ग्रहण करें, तो स्वरूप-भेद के लक्षण में स्वरूप-भेद का प्रवेश होने से
आत्माश्रय हो जायगा। जैसे अन्य शब्द से अनुपस्थापित अन्यत्व का ताद्रूप्यघटक
तद्रूपशब्द के परामर्श से आत्माश्रय होता है। लक्षणघटक अन्य स्वरूप-भेद है और
लक्ष्य अन्य है, यह भी नहीं कह सकते, कारण स्वरूप-भेदमात्र लक्ष्य है। यदि
लक्षण-घटक 'अन्य'-शब्द अन्योन्याभावपरक मानें, तो अन्योन्याभाव से स्वरूप-भेद
का और स्वरूपभेद के प्रतियोगिरूप होने से स्वरूपभेद से अन्योन्याभाव का ज्ञान
होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा।
यदि लक्षण में वैधर्म्यरूप भेद का प्रवेश करें, तो तदन्योन्याभावसमानाधि-
करण धर्म ही तद्वैधर्म्य है, अतः अन्योन्याभाव से वैधर्म्य का और वैधर्म्य