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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 510

४६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
... अथ स्वरूपमेव भेदप्रतिभासस्य विषय इति तत्त्वम्; तथापि सहप्रयोग
एवानुपपन्नः परिहीयताम्, भेदेन तु किमपराद्धम् ? सोऽपि दृश्यत इति चेत् ।
सत्यम्; नैमित्तिकस्तु स्यात्, न स्वरूपतः । न हि 'घटमानय, पटमवलोकय'
इत्यादौ भेदपदमपि प्रेक्षावानुपादत्ते । व्याख्यायान्तु मूढप्रबोधनार्थं 'घटः कुम्भः'
इतिवत् सहप्रयोगेऽपि न दोषः ।
तथापि कः परमार्थः ? यथायथं त्रयमपि । घटस्य हि घटाद्यात्मना
प्रतीतिः, अपटाद्यात्मना च प्रतीतिः, ततो वैशिष्ट्यप्रतीतिश्चेत्यनुभवसिद्धम् ।
तत्राभावस्य प्रथममात्रम्, अभावान्तरधर्मान्तराभावात् । सामान्यादिषु त्रिषु
द्वयम्, धर्मान्तराभावात् । द्रव्यादित्रिषु त्रयम्, त्रयस्यापि सम्भवात् । भवति
हि 'पटोऽयं न घटः, तन्तुमयश्चे'ति, 'गन्धोऽयं न रूपं सुरभिश्चे'ति, 'गतिरियं
नोत्क्षेपणं तिर्यक् चे'ति ।
स्वरूप से अधिकरण के अज्ञानकाल में प्रतियोगी की स्मृति अन्योन्याभाव के ग्रहण
की कारण है, इस तरह निरूपण हो ही सकता है ।
फिर, स्वरूपरूप भेद को ही भेद-ज्ञान का विषय मान लीजिये । इससे 'घटो भिन्नः'
यह सहप्रयोग अनुपपन्न होता हो, तो उसे ही त्यागिये; भेद का क्या अपराध है
कि उसका त्याग हो ? यदि कहें कि 'घटो भिन्नः' ऐसा सहप्रयोग भी देखा जाता है,
अतः उसका त्याग नहीं हो सकता; तो ठीक है । सहप्रयोग दीखता है, किन्तु स्वभाव
से नहीं, किसी निमित्त से । कारण 'घटमानय, पटमवलोकय' इत्यादि प्रयोगस्थलों में कोई
भी बुद्धिमान् 'भिन्नं घटमानय' ऐसा प्रायः नहीं कहता । कहीं-कहीं व्याख्यान-काल में
मूढ़ों को समझाने के लिए 'घटः कुम्भः' की तरह 'घटः भिन्नः' ऐसा जो सहप्रयोग
होता है, वह दोषाधायक नहीं है ।
प्रश्न—तब भी इन स्वरूपादि त्रय में मुख्यार्थ कौन है ? उत्तर—यथास्थान तीनों
ही ठीक हैं । घट की घट, मृत्कार्य आदि रूप से प्रतीति होती है, अपटादिरूप से
प्रतीति होती है तथा उस पट से वैधर्म्यरूप धर्म से भी प्रतीति होती है, यह अनुभव-
सिद्ध है । उन तीनों में से प्रथम (स्वरूपभेद) अभावमात्र में रहता है, कारण अभाव में
अन्य अभाव या गुण, जाति आदि अन्य धर्म नहीं रहते । सामान्य, विशेष और समवाय इन
तीनों में स्वरूपभेद और इतरेतराभाव दोनों रहते हैं । कारण इनमें अन्य धर्म नहीं रहते ।
द्रव्य, गुण और कर्म तीनों में तीनों अभाव रहते हैं, कारण तीनों का सम्भव है । 'यह