खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 493, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद लक्षण का खण्डन ४७३
वा, धर्मान्तरं वा ? नाद्यः ; भिन्नेऽभिन्नभ्रमानुपपत्तिप्रसङ्गात् । भ्रान्त्याऽपि
धर्मिस्वरूपावगाहनात् । अन्यथा कस्याभेदं सा भ्रान्तिरुल्लिखेत् ।
ननु निःसम्बन्धित्वेन व्यवस्थितेषु तरुदारुप्रभृतिषु नानाधारोऽवयव्यन्य
एवाऽऽरोप्यते, येषु त्वारोप्यते ते भेदेनैव भान्ति । किन्तु अनारब्धावयविषु
तेष्वारब्धावयवितया विभ्रम्यते । मैवम्; तेषामनुदाहरणीयत्वात् । अतस्मिन् 'स
एवायमि'ति प्रत्यभिज्ञाभासार्थानां दृष्टान्तत्वेनेष्टत्वात् ।
तत्रापि धर्मान्तरारोपाभ्युपगमे तादात्म्याभावस्य संसर्गाभावप्रवेशापत्तेः ।
न चैवमप्येष्टव्यमेव, तथापि स्वरूपभेदग्रहे तत्राभेदस्य धर्मस्याप्यशक्यारोपत्वात् ।
स्वरूप ही भेद होने से भेदग्रह उस अभेदभ्रम का विरोधी है; भ्रम भी धर्मी के स्वरूप
को विषय करता ही है । यदि भ्रम धर्मी के स्वरूप को विषय न करे, तो किसमें अभेद
को विषय करेगा ?
समर्थन—परस्पर-सम्बन्ध-रहित ( उदासीन रूप से ) विद्यमान दूरस्थ अनेक
तरु-दारु प्रभृति में एक अवयववाले का अभेद-भ्रम नहीं होता, किन्तु नाना अवयववाले
अन्य अवयवी का ही आरोप होता है। जहाँ वह आरोपित होता है, वे
भेदरूप में ही भासते हैं । किन्तु अनारब्ध अवयवियों में आरब्धावयवित्व का
आरोप होता है । एवञ्च वह भेदग्रह का विरोधी नहीं है । खंडन—जहाँ दूरत्व दोष
से अनेक वृक्षों में एकवृक्षत्व का भ्रम होता है, उस स्थल में हमने दोष नहीं
दिया है । किन्तु जहाँ भिन्न में 'स एवायम्' ऐसा प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम होता है, उस
उदाहरण में दोष दिया है ।
समर्थन—प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम में भी तादात्म्यरूप धर्म का ही भ्रम होता है, धर्मी के
अभेद का नहीं । खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो अन्योन्याभाव का संसर्गाभाव में अन्तर्भाव
हो जायगा । कारण 'नायं चैत्रः' इस विशेष-दर्शन को यदि भेदविषयक मानें, तो इससे
धर्मारोप की निवृत्ति नहीं होगी । अतः धर्मारोपवादी उक्त विशेष-दर्शन को निश्चय ही
संसर्गाभावविषयक मानेंगे । किन्तु आप अन्योन्याभाव का अस्वीकार नहीं कर सकते,
कारण उसीके निरूपण में प्रवृत्त हैं ।
किञ्च—स्वरूप-भेद का ग्रह होने पर तादात्म्यरूप धर्म का भी आरोप नहीं हो
सकता । कारण तादात्म्य भी अभेदरूप ही है और भेदग्रह होने पर अभेद-भ्रम नहीं
हो सकता ।
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