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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 610 में से

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पृष्ठ 487

परिच्छेद ] विषय विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४६७
विनिगन्तुमशक्यत्वात् । न ह्याकारस्ततो ज्ञानस्वरूपादन्यः, तत्र च तथोत्पन्नानि
कारणानि प्रत्येकमेव समर्थानीति कथं तेषु विशेषं विनिगमयिष्यसि ।
यद्यपि सकलसमर्थहेत्वनुविधानमस्ति, तथापि स्फुटं तावद्घटस्यानुविधान-
मिति तदेव तदाकारप्रयोजकमित्यत इति चेन्न । समस्तकारणान्तरानुविधानव-
द्घटानुविधानस्य प्रामाणिकत्वाविशेषेण किं स्फुटत्वास्फुटत्वाभ्यां स्यात् । स्फुटा-
नुविधानमादायैव विषयनिरुक्तिं कुर्म इति चेन्न । सर्वहेत्वनुविधानस्य न्यायतः
स्फुटत्वात् ।
दृश्यमानमनुविधानं यस्येति चेन्न । दत्तोत्तरत्वात् । दृश्यमानतैव च विष-
यताऽनिर्वचनान्न शक्योपदर्शना ।
ज्ञानकर्मत्वमित्यपि न ; ज्ञानेन कर्मणः सम्बन्धस्य निर्वक्तव्यत्वात् ।
तन्निरुक्तिभङ्गश्च ईश्वराभिसन्धौ ज्ञाततावादे द्रष्टव्यः ।
है, अर्थात् उसमें कोई विनिगमक नहीं है ; कारण आकार विज्ञान से भिन्न नहीं है,
किन्तु विज्ञानरूप ही है । अतः मिलित कारण ही ज्ञान के आकार के हेतु हैं । फिर उन
हेतुओं में अमुक आकार का हेतु है, इस विशेष का निश्चय कैसे करेंगे ?
समर्थन—यद्यपि ज्ञान के आकार में सभी हेतुओं का अन्वय है, तथापि घट का
अन्वय स्फुट है । अतः घट ही आकार का प्रयोजक है । एवञ्च ‘स्फुटानुविधानत्वे सति
आकारसमर्पको हेतुः’ ऐसा लक्षण कर ही सकते हैं । खण्डन—यदि सम्पूर्ण कारणों
का आकार में अन्वय प्रमाण से सिद्ध है, तो ‘अमुक कारण का अन्वय स्फुट है
और अमुक का नहीं है’ इस कथन से क्या लाभ है ? यदि कहें कि ‘स्फुट अभिधान’
इस कथन का यही प्रयोजन है कि स्फुट लक्षण होता है, तो सभी कारणों का अन्वय
एक-सा है; अतः युक्ति से सभीका अन्वय स्फुट ही है ।
समर्थन—‘जिसका अन्वय ज्ञान के आकार में प्रत्यक्ष है, वह विषय है’ ऐसा
कहेंगे । खण्डन—जब सभी कारण हैं, तो सबका अन्वय प्रत्यक्ष ही है । किञ्च—
प्रत्यक्षता भी विषयता ही है, अतः आत्माश्रय हो जायगा ।
समर्थन—‘ज्ञान का कर्म विषय है’ ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—ज्ञान के साथ
कर्म का क्या सम्बन्ध है, यह कहना होगा । किन्तु उसका निर्वाचन नहीं
कर सकते, यह बात ‘ईश्वराभिसन्धि’ नामक ग्रन्थ के ज्ञाततावाद में स्पष्ट है,
वहीं देख लेना चाहिए ! [अर्थात् ज्ञान और कर्म का सम्बन्ध संयोग नहीं हो सकता,