खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 483, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] विषय-विषयिभाव लक्षण का खण्डन ४६३
अस्तु असौ धर्मो विषयाभिन्न इति चेत् ; तथापि किमसौ स्वीकृतेन स्वभाव-
सम्बन्धेन सम्बद्धो न वा ? न चेत्, तद्विज्ञानं न कस्यचित्सम्बन्धि स्यात् ।
सम्बद्धश्चेत्, किं सम्बन्धान्तरेण आहो स्वभावसम्बन्धेनैवासौ ज्ञानात्मकसम्बन्ध-
सम्बन्धीयः ?
आद्ये तत्राप्येवं प्रसङ्गः, यस्या भयेन स्वभावसम्बन्धः स्वीकृतः, सा तदवस्थै-
वानवस्था । द्वितीयश्चेत्, ज्ञानात्मकसम्बन्धसम्बन्धीय इत्यत्र विशिष्टस्वरूपे ज्ञान-
रूपमपि विशेषणं प्रविष्टमिति पूर्वोक्तन्यायेन अधुनोक्तन्यायेन च ज्ञानस्यैकस्यैव
द्वयमपि स्वात्मेति वाग्भङ्गिभेदमात्रेण ज्ञानगोचरयोरभेदस्वीकार इति ।
एतेनान्यत्रापि स्वभावसम्बन्धः प्रत्याख्यातव्यः ।
ज्ञानीयफलाधारत्वं विषयत्वम्, तद्वत्त्वं च विषयित्वमित्यपि दुष्टम् ।
तथाहि—ज्ञानीयं फलं ज्ञातता वा व्यवहारो वा स्यात् ?
आद्ये अतीतानागतधीभ्रमाद्यर्थाव्याप्तिः । न च तत्रैव फलजनने किं
समर्थन—वह तदीयत्व विषय से अभिन्न ही रहे, तो हानि ही क्या है ?
खण्डन—वह तदीयत्व ज्ञान के स्वभाव-सम्बन्ध से संबद्ध है या नहीं ? संबद्ध नहीं है,
तो विज्ञान किसीका सम्बन्धी न कहलायेगा । यदि सम्बद्ध है, तो क्या अन्य सम्बन्ध
से या स्वरूप सम्बन्ध से ?
यदि प्रथम कल्प मानें, तो वह सम्बन्ध भी अन्य सम्बन्ध से ही विज्ञान के
स्वभावभूत सम्बन्ध का सम्बन्धी होगा । इस प्रकार उत्तरोत्तर सम्बन्ध का स्वीकार होने
से वही अनवस्था हो जायगी, जिसके भय से आप स्वरूप सम्बन्ध का स्वीकार करते
हैं । यदि स्वभाव सम्बन्ध से सम्बन्धी है, तो तदीयत्व का ज्ञानात्मक स्वभाव सम्बन्ध के
स्वरूपरूप सम्बन्धी में ज्ञान-विशेषण भी प्रविष्ट है, इस पूर्वोक्त रीति से तथा सम्प्रति
उक्त रीति से ज्ञान के ही घट और घटीयत्व दोनों आत्मा हुए । अतः वचन-रचना के
भेद से ज्ञान और विषय का अभेद ही सिद्ध हुआ ।
इसी प्रकार अन्यत्र याने समवाय, अभाव आदि स्थलों में भी स्वरूप-सम्बन्ध
का खण्डन जानना चाहिए ।
समर्थन—'ज्ञान का जो फल, उसका आधारत्व विषयत्व है और उस फल का
जनकत्व विषयित्व है', ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यह भी लक्षण दोषयुक्त है,
कारण ज्ञानजन्य फल ज्ञातता है या व्यवहार ?
प्रथम पक्ष में अतीत-अनागतविषयक बुद्धिस्थल में तथा भ्रमविषय में अव्याप्ति