खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] विषय विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४६१
स एवासाविति चेन्न । तदैक्यात् ज्ञानार्थसाधारणविषयप्रतीत्या- पत्तेः
संयोगप्रतिपत्तिवत् । विषयित्वं तत्र, अर्थे तु विषयत्वमन्यदिति चेन्न । सैव हि
ज्ञातता स्यात्, सा च निराकरिष्यते ।
द्वितीये च स्वात्मा घटपटव्यक्तीनामिव घटपटज्ञानव्यक्तीनां व्यावृत्त इति
तत्तद्विषयविषयितागोचरानुगतबुद्धिव्यवहारभङ्गप्रसङ्गः ।
किञ्च—तदीयता ज्ञानस्य स्वभाव इति वचनं विचारमर्हति । तदिति तावद्विषय-
परामर्शः, सम्बन्धितया छप्रत्ययस्यार्थः । तदेतद्न्योन्यविशिष्टमुभयं ज्ञानस्य स्वभाव इति
ब्रुवाणेन विषयो विज्ञानस्य स्वभाव इत्युक्तं भवतीति साधु विज्ञानवादिनिरा-
करणप्रकरणोपसंहारमकारि ।
सम्बन्ध का विचार कर रहे हैं कि वह सम्बन्ध किंरूप है ? अर्थात् उस सम्बन्ध को यदि
घटज्ञानत्वादिरूप मानें, तो उसीसे प्रतीति का वैलक्षण्य की सिद्ध हो जाने से विषय
की असिद्धि हो जायगी । अतः घटज्ञानत्वादिरूप वह सम्बन्ध नहीं है ।
समर्थन—घट तथा ज्ञान का विषयविषयिभाव ही सम्बन्ध रहे, तो हानि क्या है ?
खण्डन—विषय-विषयिभावरूप सम्बन्ध एक है, अतः संयोग-प्रतिपत्ति के तुल्य ज्ञान
और विषय दोनों परस्पर विषयी और विषय हो जायेंगे ।
समर्थन—अनुभव के अनुसार ज्ञान में विषयित्व और अर्थ में विषयत्व अन्य ही
है । खंडन—अर्थगत जो अनुगत विषयत्व है, वही मीमांसकों की 'ज्ञातता' है । उसका
आगे ही निराकरण करेंगे ।
द्वितीय पक्ष मानें, अर्थात् 'स्वमेव भावः स्वभावः' इस व्युत्पत्ति से 'स्वभाव' पद का
स्वात्मा अर्थ कहें, तो घट-पट-व्यक्तियों के तुल्य घटज्ञान, पटज्ञान व्यक्तियों के भी
होने त भिन्न-भिन्न संपूर्ण घटज्ञांन में एकाकार अनुगत प्रतीति नहीं होगी ।
किञ्च—'तदीयता ज्ञान का स्वभाव है' यह कथन भी विचारणीय है । यहाँ तद्-
शब्द से विषय का परामर्श है और सम्बन्धिता ( सम्बन्ध ) छप्रत्यय का अर्थ है । 'ये
दोनों परस्पर मिलकर अर्थात् विषय-सम्बन्ध ज्ञान के स्वभाव हैं' यह जो कहते हैं,
उससे 'विषय विज्ञान का स्वभाव है' यह भी उक्त हो जाता है । एवञ्च इस तरह
विज्ञानवाद का समर्थन हो जाने से [ 'आत्म-तत्त्व-विवेक' में किये गये ] विज्ञान-
वाद के खण्डन-प्रकरण का आपने खूब ही उपसंहार किया !