खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
अथान्यः कश्चिदाधारार्थोऽस्तु प्रतीतिसिद्धत्वात्, प्रतीतेश्चैवमनन्योपपाद्यत्वात् ।
मैवम्; तदनित्यं वा स्यात् नित्यं वा ? नाद्यः; तदभावे आधारप्रतीत्यभाव-
प्रसङ्गात्, गोत्वादिनित्यत्वन्यायसाम्येऽपि अस्यानित्यत्वे तेषामप्यनित्यत्वापाताच्च ।
नापि द्वितीयः; तादृशमप्यनुगतमननुगतं वा स्यात् ? द्वितीये अनुगताधारप्रतीत्य-
सम्भवः, सङ्केतग्रहाशक्यत्वञ्च । प्रथमे सामान्यवदाश्रयापरित्यागि वा स्यात्
तत्त्यागि वा ? आद्ये यदेव तदाधारतया प्रतीत तत्दाधेयं न स्यात् । द्वितीयेऽपि
च यदि नियामक मन्तरेण तत्स्वाश्रयं भजति त्यजति च, तदा नियमानुपपत्त्या
सर्वदा तद्भजनत्यजनोचितप्रत्ययव्यवहारप्रसङ्गः ।
अथ तस्याऽऽश्रयभजनत्यजनयोर्नियामकोऽस्ति; तर्हि स वक्तव्यः । सोऽपि
समर्थन—सर्वानुभव सिद्ध 'इह' इत्याकारक प्रतीति आधार की कल्पना के बिना
अनुपपन्न होगी । अतः उक्त प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति से ही आधार की कल्पना
करेंगे । वह आधार किम्-रूप है, इसके निर्णय से हमें कुछ प्रयोजन नहीं। खंडन—
उस आधारत्व को अनित्य मानेंगे या नित्य ? प्रथम कल्प युक्त नहीं; कारण यदि अनित्य
मानें, तो कदाचित् उसका अभाव भी अवश्य मानना पड़ेगा । एवञ्च आधारत्व के
अभाव-काल में आधार की प्रतीति नहीं होगी । किन्तु आधार की प्रतीति सर्वदा होती
है। किञ्च—गोत्वादि जाति के नित्यत्व की साधक युक्तियों ( अनुगतप्रतीतिविषयत्व,
अनौपाधिकत्व या सर्वदा प्रतीयमानत्वरूप ) की तरह यहाँ भी तुल्य युक्ति होने पर भी
यदि आधारत्व को अनित्य मानें, तो गोत्वादि जातियाँ भी अनित्य हो जायँगी ।
द्वितीय कल्प में भी आधारत्व अनुगत है या अननुगत है ? यदि अननुगत है, तो
आधारमात्र में अनुगत एक धर्म न होने से अनुगत आधार की प्रतीति नहीं होगी । सिवा
संकेत ( शब्दार्थ-सम्बन्ध ) का ज्ञान भी नहीं होगा । यदि अनुगत मानें, तो वह
( आधारत्व ) सामान्य की तरह आश्रय का अपरित्यागी है या परित्यागी ? आद्य पक्ष
में जो जिस काल में आधारत्वरूप से प्रतीत होता है, वही उसी काल में आधेयत्वरूप
से प्रतीत नहीं होगा । द्वितीय पक्ष में यदि नियामक के बिना ही वह आधारत्व
आधार को त्यागता और ग्रहण भी करता है, तो सर्वदा प्राप्ति-त्याग के उचित प्रतीति
या व्यवहार होना चाहिए । अर्थात् सर्वदा 'आधारः, न आधारः' दोनों व्यवहार
या प्रतीतियाँ होने लगेंगी ।
समर्थन—उस आधारत्व के आश्रय के प्राप्ति-त्याग में नियामक है। खण्डन—तो
उन नियामक को कहिये । यदि कहें कि आधारत्व की प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति से