खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] स्वप्रकाशवाद-विचार ३१
शेषासिद्ध्या सर्वसिद्धिर्वा प्रसज्येतेत्यर्थाऽसिद्धिपर्यन्तस्य व्यसनस्य दुरुत्तरत्वात् ।
सेयम् 'अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थदृष्टिः प्रसिद्ध्यती'ति ॥
घटसत्तां हि व्यवहरता प्रामाणिकेन तत्र प्रमाणसद्भावो वाच्यः । यदि
प्रमाणमनुपन्यस्य साऽस्तीत्यङ्गीक्रियते, तदा वैपरीत्यमेव वा किं न स्यात् ।
ततश्च घटसत्तायां प्रमाणसत्ता दर्शनीया । तथा च प्रमाणसत्ताऽपि तत्प्रमाण-
सत्तामन्तरेण प्रामाणिकस्य नाङ्गीकारार्हा, सर्वप्रमाणसत्तानिवृत्तेर्वस्तुसत्तानिवृत्ति-
नियतत्त्वात् । अन्यथा सप्तमरसादेरप्यापत्तेरिति व्यक्तमनवस्थादौस्थ्यमस्वप्रकाश-
वादिनः स्यात् । यदि हि विनैव प्रमाणसत्तां परोऽङ्गीकारयेत्, तदा घटसत्तामपि
तथैवाङ्गीकारयतामिति घटेऽपि वृथा प्रमाणोपन्यासः ।
अथ नाव्यवधानलग्नवित्तिद्वित्तिधाराऽभ्युपगम्यते किं नाम कदाचित्
कुतश्चित् काचित् वित्तिः प्रमीयत इति सर्वा वित्तिः प्रमाणसिद्धैवेत्यभ्युपेयत इति
चेन्न । स्यादप्येवं यदि घट इति घटं जानामीत्यतोऽधिका [ घटवित्तिद्वित्ति-
परीक्षक उपलम्भ ( ज्ञान ) का प्रत्यक्ष नहीं मानते, उनके मत में अर्थ ही सिद्ध न
होगा', धर्मकीर्ति के इस वचन का भी यही अभिप्राय है ।
घट-व्यवहार करनेवाले प्रामाणिक को घट में प्रमाण अवश्य कहना चाहिये ।
यदि प्रमाण न देकर 'घट है' ऐसा स्वीकार करें, तो उलटा 'घट नहीं है' यही
क्यों न स्वीकार किया जाय ? तस्मात् घट में प्रमाण अवश्य दिखाना चाहिए ।
तब तो प्रमाण भी प्रमाण के बिना स्वीकार-योग्य नहीं । क्योंकि सब प्रमाणों के
अभाव से वस्तु का अभाव अवश्य होता है । यदि प्रमाण न होने पर भी वस्तु की
सिद्धि हो, तो छः रसों के अतिरिक्त सातवाँ रस भी मानना पड़ेगा । इस प्रकार
ज्ञान को जो स्व-प्रकाश नहीं मानते, उनके मत में अनवस्था स्पष्ट ही है । यदि
वादी प्रमाण के बिना ही प्रमाण को स्वीकार कराना चाहें तो प्रमाण के बिना ही
घट का भी स्वीकार कराये, फिर घट में प्रमाण देना व्यर्थ ही है ।
समर्थन—अन्य विषय का ज्ञान होने के कारण धाराप्रवाह के तुल्य अव्यवधान
से ज्ञान और उस ज्ञान की ज्ञान-धारा नहीं होती । किन्तु जिज्ञासा होने पर व्यवहार
आदि कारणों से कोई-कोई वित्ति प्रतीत होती है । अतः सामान्य लक्षण से सब
वित्तियाँ प्रमाण-सिद्ध ही हैं, ऐसा माना जाता है । खंडन—'जिज्ञासा होने पर···'
इत्यादि कथन से ज्ञात होता है कि आप भी व्यवधान से उत्पन्न ज्ञान और उस
ज्ञान की धारा मानते हैं । किन्तु आप वैसा मान नहीं सकते । वैसा तभी मान पाते,