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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 610 में से

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पृष्ठ 466

परिच्छेद ] सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन ४५७
नियम्यस्य च स्वस्यानतिप्रसङ्गेन नियामकत्ववाचोयुक्त्यनुपपत्तेः । अति-
प्रसक्तत्वे च तस्यैव नियामकत्वादतिप्रसक्तेन नियमायोगात् ।
भूत्वा नियमकरणे च प्रागनियतत्वापत्तेः । एवमन्येनापि जन्यनियम्ये ।
अन्यदपि हि यदि पूर्वं घटादिरूपेणानियतमेव घटादि करोति, तदा पटाद्यपि
तथा कुर्यात् ।
न घटादित्वे नियन्तृत्वमन्यस्य, किन्तु घटादेः कालविशेषयोग इति चेन्न ।
भूषण ही है, दूषण नहीं । खण्डन—आप स्वरूपमात्र को सम्बन्ध अवश्य मानेंगे; अतः
नियामक पदार्थ की नियतपूर्वसत्त्वरूप निरुक्ति का घटक 'सत्त्व' ही सम्बन्ध का लक्षण
मानिये, सत्त्व से अधिक अंश व्यर्थ है ।
किञ्च--स्वरूप अनतिप्रसक्त नियम्य का नियामक नहीं हो सकता, कारण वह स्वतः
ही अनतिप्रसक्त है । उसको अतिप्रसक्ति-निवारकरूप नियामक कहना अनुपपन्न है ।
यदि नियम्य अतिप्रसक्त है तो नियामक भी वही है । अतः अतिप्रसक्त स्वरूप नियमन
नहीं कर सकता, कारण अतिप्रसङ्ग का निवारण ही नियमन है ।
किञ्च—नियम्याकार कार्य है, इसलिए यदि नियामक को उससे अभिन्न मानते
हैं तो वह भी कार्य हो गया । एवञ्च यह भी प्रश्न होगा कि वह नियामक उत्पन्न
होकर नियमन करता है या अनुत्पन्न ही ? यदि उत्पन्न होकर नियामक है, तो वह
आप ही नियम्य है और नियामक भी । अतः वह उत्पत्ति से पूर्व अनियत हो जायगा ।
यदि उसे उत्पत्ति से पूर्व अनियत मानें, तो उत्पत्ति से उत्तर भी वह अनियत हो
जायगा । इसी प्रकार अन्य कारणादि से अन्य कार्यों के नियमन में भी दोष जानने
चाहिए । देखिये—यदि अन्य दण्डादि कारण घटादिरूप कार्य से पूर्वकाल में असत्
घटादि का नियमन करते हैं, तो वे पटादि का भी नियमन क्यों न करें ?
समर्थन—दण्डादि कारण घटादि कार्यों के नियामक नहीं हैं, क्योंकि वे तो
सदा नियत ही हैं । किन्तु कालविशेष के सम्बन्ध के नियामक हैं, कारण वह अनियत
है । खण्डन—यदि दण्डादि घटादिसम्बन्धी काल के सम्बन्ध का नियमन करते
हों, तो घटादि का ही नियमन अर्थात् लब्ध हुआ । अतः पूर्वोक्त दोष हो जायगा ।